एक सृष्टि दो दृष्टि

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कानन उपवन से कहता है
देख प्रकृति की अनुकम्पा
हम दोनों को दिए उसने
जी भर मल्लिका और चम्पा
नहीं तनिक भी भेद किया
हम दोनों का समभाव से श्रृंगार किया
….
कानन का पुष्प वह रोता है
प्रकृति के दोष को कहता है
वाह मेरे प्रभु ! किस कारण यह दण्ड दिया
उपवन मंजरी को माली और प्रेम अतिरेक दिया
मुझको यूँ अरण्य में निर्वासित सा छोड़ दिया
हे प्रकृति ! तूने भेद यह प्रचंड किया
….
सुमन का सुन विलाप पवन ठहरी
कहने को एक बात गहरी
क्यूँ पुष्प वृथा तू रोता है
अपने जीवन-रस को खोता है
तेरा जीवन माली का प्रेम नहीं
तेरा जीवन किसी का श्रृंगार नहीं
धरा तुझे समभाव से पोषित करती है
धारा तुझे समभाव से तोषित करती है
पवन-घन-गगन भी कमी नहीं कुछ रखते हैं
गन्ध-भ्रमर-तितली सब तुझपर मोहित रहते हैं
व्यर्थ तू तुलना कर औरों से स्वयं को संताप देता है
इस विपिन में अपनी शोभा से आप वंचित होता है

image credit : https://www.flickr.com/photos/paulhami/5806385965

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