पेरेंटिंग ज्ञान

अक्सर पढ़ने में आता है कि माँ-पापा बच्चे के आदर्श होते हैं । बच्चे उनके आचरण से सीखते हैं ना कि उनके मुहँ से निकले ज्ञान वचनों से । मैं एक छः वर्षीया कन्या की माँ हूँ और अपने अनुभव से आपको सचेत करना चाहती हूँ कि इन बातों में कदापि ना आयें ।

मेरे राज और सिमरन

तुमसे बढ़के दुनिया में ना देखा कोई और जुबान पर आज दिल की बात आ गयी ।
अगर कोई आशिक़ यह गीतअपनी महबूबा को नज़र कर दे तो उस महबूबा की ख़ुशी, नाज़ और शर्म का कोई किनारा आपको ढूंढें नहीं मिलेगा ।

कैसे कहूं ‘जय गणतंत्र’ ?

बचपन में त्योहारों का अपना अलग ही महत्तव और उत्साह होता था चाहे वह धार्मिक आस्था से जुड़े त्यौहार हों या फिर राष्ट्रप्रेम से जुड़े हुए त्यौहार हों । मेरे लिए बचपन में 26 जनवरी का मतलब था- सुबह स्कूल पहुंचकर ध्वजारोहण और कुछ सांस्कृतिक कार्यकर्मो के बाद मिठाई का आनंद ।

भों भों

मुझे कभी समझ नहीं आया कि घरवालों को स्कूटर इतना पसंद क्यूँ था ? मुझे कोई भी गाड़ी चलेगी लेकिन स्कूटर ! आई हेट स्कूटर ।

लेख की गगरिया और कमेंट्स की कंकड़िया – हाय ! फोड़ डाली !

आज के समय में आधुनिक माध्यम (सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) ने हर व्यक्ति को इतना सक्षम बना दिया है कि वो जब चाहे अपने विचार एक बहुत बड़े समूह में साझा कर सकता है । बहुत से लोगों के लिए कम शब्दों में अपनी बात कह पाना संभव नहीं होता तो वो तरह तरह…

ओके मम्मा, नाउ ट्यून चेंज..कायिला ग्लास

धनुष के कोलावेरी कोलावेरी डी गाने में तब मेरे लिए बहुत ही रोमांच आ जाता है जब “ओके मम्मा, नाउ ट्यून चेंज..कायिला ग्लास, ओनली इंग्लिश” वाली पंक्ति आती है | अहा !, मन किलकारियाँ मारते हुए, हिरनी की तरह कुलाँचे भरते समय में सोलह साल पीछे चला जाता है | आज से सोलह साल पहले…

चिया और सिनेमाघर

कल एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण दिन था, हमारे घर के लिए | मेरी छः वर्षीया बेटी को सिनेमाघर में फ़िल्में देखने का कोई शौक नहीं बल्कि अगर यह कहूँ कि उसे ऐसा करना सख्त नापसंद है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | जब मेरी बेटी छोटी थी तो तेज़ आवाज़, घने अँधेरे में इतने बड़े…

मैं आभार कहाँ से लाऊँ?

आज सुबह की ठंड में कुछ ठिठुरन के साथ सिहरन भी है, अनमने से ह्रदय में चुभते कुछ सवालों के दंश भी हैं। मन में अंतर्दव्न्द छिड़ा हुआ है । एक “क्यूँ” बन्दर की तरह उत्पात मचा कर हर डाली को झिंझोर रहा है और सारे फलों को जूठन कर फेंक रहा है । मन में एक उलझन…

भिक्षाम्देही भिक्षाम्देही

कल एक बालक देखा किसी ट्रेफिक सिग्नल पे । कितना मस्त था अपने आप में । उसे कोई आभास नहीं था खुदके उस सड़क पे होने का और दूसरों के गाड़ी में होने का । उसे कोई दुःख नहीं था,