चरित्रहीन ..४

कृष्णा दूर क्षितिज में देखते हुए दर्द से बोले, ’यदि मैं चाहता, तो क्या राधे को अपने पास रोक लेने से कोई शक्ति मुझे रोक लेती ? किन्तु यह चाहना ही मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर था पार्थ ।‘

चरित्रहीन…३

मेरी सुधा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ । हर रूप में, हर हाल में । तभी सुधा ने उलाहना दिया, ‘फिर क्यूँ उस डायन मालती के पीछे खुद को गिराते हो, वो प्यार नहीं वासना है ।’ 

चरित्रहीन..२

दीपक, जितना प्यार मैं तुमसे करती हूँ, तुम उतना प्यार मुझसे क्यूँ नहीं कर सकते?’ कहते-कहते अपने आंसूओं में बहती एक कमजोर नाव सी सुधा दीपक की पत्थर जैसी मजबूत छाती पे टिक गयी ।

चरित्रहीन

कभी रुक्मिणी को बताया कि तेरा हृदय जब-तब कालिंदीकूल के कदम्ब पर टिकी अपनी राधे के पास चला जाता है ? उस वेदना की अनुभूति तो ज़रूर होती होगी जो तुम दोनों के अस्तित्व का पर्याय बन गयी । कभी रुक्मिणी से बात करते-करते उसे राधे कहने की भूल हुई ?

ताक़त की दुनिया

पता है कुछ लोग अपने जीवन की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं- न जीने की और न मरने की । उन्हें जीने के लिए दूसरों का सहारा चाहिए होता है और अपनी खुदखुशी का इल्ज़ाम भी वो दूसरों पर थोप जाते हैं । तू उन लोगों में से है ।

एक चिट्ठी

प्यार हुआ तो जताना मुश्किल लगा, तड़पे तो तड़प छुपाना आसान लगा । तुम मिल गए तो लगा कि सिला मिल गया हर आँसू का । बिना मांगे तुम मिल गए अब क्या मरी भैंस की पूंछ फाड़ना ?

साहिर लुधियानवी

ऐसा कुछ कर जाएँ, यादों में बस जाएँ, सदियों जहान में हो चर्चा हमारा ।
दिल करदा ओ यारा दिलदारा मेरा दिल करदा ।।

जय जय शिव शंकर

ओ जय जय शिव शंकर

काँटा लागे ना कंकड़

यह प्याला तेरे नाम का पिया ।