आनंदी और गोपाल- भाग २

यह दोनों ही अपनी-अपनी दुनिया के सेलेब्रिटी थे और इन दोनों की दुनिया में कोई तालमेल नहीं था। कैसी अजब विडम्बना थी यह कि इस विवाह से जहाँ आनंदी के मन में कोमलता बढ़ रही थी वहीँ गोपाल के मन में निर्ममता घर कर रही थी।

आनंदी और गोपाल- भाग १

नयी जवानी में कोई यह बीज डाल भर दे तो मन न जाने कितने मीठे-मीठे फलों तक जा पहुंचता है। गोपाल के मन में भी शादी के लड्डू फूटने लगे कि उसकी शादी ऐसी लड़की से होगी जो पढ़ी लिखी, ख़ूबसूरत और स्मार्ट शहरी होगी।

गोपाल लौट आया

एक पल में उसने निर्णय तो कर लिया शहीद होने का मगर यह न समझ पाया कि शहादत जान ले ले तो आसान होती है कम से कम शहीद के लिए । लेकिन ऐसी शहादत जो जान भी न ले और जीने भी न दे वो भयावह होती है । शहीद का गुणगान होता है लेकिन जो जीता जगाता शहीद हो उसका क्या गुणगान ?

उलझने..बेसब्रियाँ

अगर यह एहसास इंसान के लिए इतने ज़रूरी ही हैं तो यह ऐसे ग़ैर-ज़रूरी क्यूँ लगते हैं ? डरावने क्यूँ लगते हैं ? किसके लिए अच्छी है हार ? किसको सुहाता है दुःख ?

उड़ान की तैयारी

आज तक बेटी पर मुझसे ज्यादा अधिकार किसी का न था लेकिन अब धीरे-धीरे पतंग को आसमान बुला रहा है ।

एक चिट्ठी

प्यार हुआ तो जताना मुश्किल लगा, तड़पे तो तड़प छुपाना आसान लगा । तुम मिल गए तो लगा कि सिला मिल गया हर आँसू का । बिना मांगे तुम मिल गए अब क्या मरी भैंस की पूंछ फाड़ना ?

जय जय शिव शंकर

ओ जय जय शिव शंकर

काँटा लागे ना कंकड़

यह प्याला तेरे नाम का पिया ।

जंगली फूल

इस बार अपनी बेटी को लेकर अपने गावं गयी तो पहाड़ी रास्तों पर ठंडी हवा और खिली हुई धूप के साथ चलना बहुत सुकून दे रहा था दिल को । पहाड़ो को काटकर बनायीं गयी कच्ची सड़के गवाही दे रही थी