ताक़त की दुनिया….२

कितनी सज़ा? कितना बड़ा गुनाह था कि सज़ा और प्राश्यचित खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे ? अब बस, और नहीं ।

ताक़त की दुनिया

पता है कुछ लोग अपने जीवन की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं- न जीने की और न मरने की । उन्हें जीने के लिए दूसरों का सहारा चाहिए होता है और अपनी खुदखुशी का इल्ज़ाम भी वो दूसरों पर थोप जाते हैं । तू उन लोगों में से है ।

गोपाल लौट आया

एक पल में उसने निर्णय तो कर लिया शहीद होने का मगर यह न समझ पाया कि शहादत जान ले ले तो आसान होती है कम से कम शहीद के लिए । लेकिन ऐसी शहादत जो जान भी न ले और जीने भी न दे वो भयावह होती है । शहीद का गुणगान होता है लेकिन जो जीता जगाता शहीद हो उसका क्या गुणगान ?