झूठ की सीढ़ी

झूठ ने शुरुवाती गति दे दी है, हालांकि मैं जानती हूँ कि झूठ के पैर नहीं होते। लेकिन, मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही, मैं नयी राह खोज लूँगी। एक बार चलना शुरू कर दिया, तो मंजिल तक पहुँच ही जाएगी मेरी बेटी। सफ़र शुरू करना ही सबसे मुश्किल पड़ाव होता है। ऊँचाई तक पहुँच सकते हैं, यह विश्वास जगाना ही सबसे कठिन होता है। अपने लिए यह उम्मीद थामे रहती हूँ कि मेरे झूठ, भविष्य में, मेरी बेटी के सामने खुलेंगे, तो वो मुझे माफ़ कर देगी इस धोखाधड़ी के लिए।

लंगर

क्या महिलाओं को लंगर में रोटी नहीं देते? ऐसा क्या डालते होंगे रोटी में? क्या रोटी का स्वाद भी कुछ अलग होता होगा? मन में ऐसे कौतूहल उछल कूद मचाने लगे। मैंने अपने पति से कहा, मुझे एक कौर खिला दो, देखूँ तो कैसी है? वो बोले, सब्र करो, प्रसादम के चक्कर में अपराधम न कर बैठना। मैंने भी सोचा, हाँ, क्या पता किसकी भावनाएं आहत हो जाएँ? धर्म के रीति रिवाजों के मामले में अपना ज्ञान वैसे भी शून्य ही है। मैंने अपनी थाली में परोसा हुआ भोजन पूरा किया और जब उठने लगी तो देखती हूँ कि दो बहुत ही बूढ़ी महिलाओं को रोटी दी गयी। फिर से मन में हलचल मच गयी- अब यह क्या?

दो रास्ते

वहाँ पहुँचकर पुरुष पार्टी ने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया और बच्चों ने अपनी पकड़-म-पकड़ाई। ऐसे में हम सखियाँ टहलने निकल लीं कि इतना सुन्दर गार्डन घूम लिया जाये। हम घूमते हुए बाग़ की सुन्दरता में खोये जा रहे थे, जब यकायक हमें अंदेशा हुआ कि हम सचमुच ही खो गए हैं। जब भी लौटकर बच्चों की तरफ़ जाने की कोशिश करें तो किसी नयी जगह पहुँच जाएँ।

आ, मुझे छू ले

आ आ आ’ वाला अलाप शुरू हो जाता है और वो जिस तरह से ख़तम होता है, ऐसा लगता है कि कुछ लोग जो छूने की कोशिश में भाग रहे थे, वो हाँफने लगे हों।

‘प्रीटी वुमन’

क्या आज उसने मुझसे पहली बार फ़्लर्ट किया? या मुझे, पहली बार, समझ में आया कि उसने फ़्लर्ट किया?

“BYO” बोले तो, ’Bring Your Own’

जो हुआ उसका दुःख है, लेकिन सुखद है मानवीयता का लौट आना। सुखद है सीने में दिल को महसूस करना।

जाने दो ना…

जो प्रथा मुझे हमेशा से अजीब लगती है वो एक दिन मुझे यह गुरुमंत्र दे जाएगी -जाने दो ना।