टीके का किस्सा

मैं तब लगभग 11 साल की थी.. क्लास में टीचर ने बताया, स्कूल में टीकाकरण कैंप चलेगा..सभी को आना है और हो सके तो अपने पड़ोसियों को भी लाना है… मैं बहुत उत्साहित थी…स्कूल में टीका! वाओ! ….घर जाकर ख़ुशी-ख़ुशी मुनादी पीटी, ‘सुनो सुनो सुनो! सन्डे को मेरे स्कूल में टीका लगेगा और सबको आना…

एक अफ़सोस!

और फिर ‘फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ द लास्ट इम्प्रैशन’, यह तो बड़ा ही जोख़िम वाला काम है। मेरी हथेलियाँ हलकी गीली सी होने लगी और मैंने गहरी साँस भरी। स्कूल आ गया था और मैं हर रोज़ की तरहअपने कार्यक्रम में व्यस्त हो गयी। दोस्तों से बातचीत, असेंबली…

पड़ोसी टिड्डा

इतनी ऊँचाई से एक बच्चा गिरा तो क्या-क्या नहीं हो सकता था? एक ज़ोरदार ‘धप्प’ की आवाज़ और उसके बाद तो कैसी-कैसी आवाज़ों के सिलसिले होते! मगर….

दिल ने दिल से क्या कहा

दिल किया बस यूँही सब ऐसे ही चलता रहे.. वो गाता रहे, बस, गाता रहे, लड़की सुनती रहे, सुनती रहे और सायकिल चलती रहे.. पर जनाब, सब कुछ चाहा हुआ ही हो जाए तो क्या कहने…

मचलते संगीत की संगति

किसी स्वेटर की तरह धागा-धागा खुलती जाती हूँ और अपने आप को खोती जाती हूँ। गीत ख़तम होने के कुछ देर बाद तलक खुले हुए ऊन के ढेर की सूरत में बिखरी रहती हूँ

चार्जर का तार

मैं इसे उँगलियों में लपेटकर टाइट, छोटे से स्पाइरल में समेटती हूँ और यह डसीला, हाथ से छूटते ही साँप सा छितर जाता है। अब तुम्ही बताओ, मैं क्या करूँ?

वो एक्स्ट्रा पेंसिल

एक को छड़ी पड़ी तो समझो सर का खाता खुल गया, अब तो सेंचुरी बनाकर ही थमेंगे और सभी उसकी लपेट में आयेंगे।

घड़ी के काँटे

आने वाला समय “शायद” कठिन होने वाला है और बस छपाक करके ऐसी बेचैनी फैली जैसे शांत स्विमिंग पूल में किसी बच्चे ने छलांग लगा दी हो ।