चरित्रहीन …६

उसकी तेज़ साँसों को महसूस करना, उसके नाजुक होंठों को घुलते हुए महसूस करना, उसकी धडकनों में अपना नाम सुनना और ….. ऐसा लगता था प्यार की दहकती हुई गरमी में पिघलकर ही दिल को ठंडक पड़ेगी ।

चरित्रहीन ..५

प्रेम कभी ग़लत नहीं होता । यह तो वो अथाह जलराशि है जिसका मंथन करने पर पहले खुशियों के रत्न और मादक सुरा निकलती है और उसके बाद दर्द, बिछोह, तड़प, जलन और तिरस्कार का हलाहल । जो लोग महादेव की तरह इस हलाहल पर विजय पा लेते हैं उन्हें अंत में यह अथाह जलनिधि अमृत से पुरस्कृत करती है ।

चरित्रहीन ..४

कृष्णा दूर क्षितिज में देखते हुए दर्द से बोले, ’यदि मैं चाहता, तो क्या राधे को अपने पास रोक लेने से कोई शक्ति मुझे रोक लेती ? किन्तु यह चाहना ही मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर था पार्थ ।‘

चरित्रहीन…३

मेरी सुधा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ । हर रूप में, हर हाल में । तभी सुधा ने उलाहना दिया, ‘फिर क्यूँ उस डायन मालती के पीछे खुद को गिराते हो, वो प्यार नहीं वासना है ।’ 

चरित्रहीन..२

दीपक, जितना प्यार मैं तुमसे करती हूँ, तुम उतना प्यार मुझसे क्यूँ नहीं कर सकते?’ कहते-कहते अपने आंसूओं में बहती एक कमजोर नाव सी सुधा दीपक की पत्थर जैसी मजबूत छाती पे टिक गयी ।

चरित्रहीन

कभी रुक्मिणी को बताया कि तेरा हृदय जब-तब कालिंदीकूल के कदम्ब पर टिकी अपनी राधे के पास चला जाता है ? उस वेदना की अनुभूति तो ज़रूर होती होगी जो तुम दोनों के अस्तित्व का पर्याय बन गयी । कभी रुक्मिणी से बात करते-करते उसे राधे कहने की भूल हुई ?

ताक़त की दुनिया….२

कितनी सज़ा? कितना बड़ा गुनाह था कि सज़ा और प्राश्यचित खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे ? अब बस, और नहीं ।

ताक़त की दुनिया

पता है कुछ लोग अपने जीवन की जिम्मेदारी नहीं उठा सकते हैं- न जीने की और न मरने की । उन्हें जीने के लिए दूसरों का सहारा चाहिए होता है और अपनी खुदखुशी का इल्ज़ाम भी वो दूसरों पर थोप जाते हैं । तू उन लोगों में से है ।