द्रौपदी : अग्नि-स्वरुपा

क्या द्रौपदी अपने पुत्रों की जीवनधारा और भाग्यरेखा बदल सकती थी ? यह चिरस्थायी द्वन्द है । नारी स्वयं के लिए जीवन जिए या अपने नातों के लिए ?

एक सृष्टि दो दृष्टि

क्यूँ पुष्प वृथा तू रोता है 
अपने जीवन-रस को खोता है

यह कैसा संशय !

है अगर लक्ष्य महत्त्वपूर्ण तो 
क्या साधन का मोल नहीं होता ?

माँ सरस्वती, प्लीज़ अपने कमल से मत उठिए

कभी-कभी माँ सरस्वती अपने कमल को छोड़कर जिह्वा पर आ विराजती हैं, ऐसा मत हमारी संस्कृति में प्रचलित है । इसी मत के तहत बुरी बातें कहने को अक्सर मना किया जाता है ।

मैं हूँ ना, माँ

इतनी स्वार्थी….इतनी बीमार हो गयी मैं? मेरी बेटी स्कूल जाकर भी इस ख़याल से छूट नहीं पायी कि माँ ने उससे कहा ,’ तुम्हें पता है माँ बीमार है फिर भी तंग करती हो’ । बालमन पर यह कैसा बोझ रख दिया मैंने अनजाने में ?

महकती तन्हाईयाँ

उसके अपने खून में उसका पूरा बदन, उसके कपडे तर हो रहे थे, उसके मुँह से एक दर्दनाक चीख निकली। उसने घबराकर चारों ओर नज़रें घुमाई लेकिन….