कर्ण पक्ष लेना है या पार्थ बन जाना है

केवल जीत मायने नहीं रखती
लेकिन
खुद से खुद की संधि मायने रखती है

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यह कैसा संशय !

है अगर लक्ष्य महत्त्वपूर्ण तो 
क्या साधन का मोल नहीं होता ?

माँ सरस्वती, प्लीज़ अपने कमल से मत उठिए

कभी-कभी माँ सरस्वती अपने कमल को छोड़कर जिह्वा पर आ विराजती हैं, ऐसा मत हमारी संस्कृति में प्रचलित है । इसी मत के तहत बुरी बातें कहने को अक्सर मना किया जाता है ।

मैं हूँ ना, माँ

इतनी स्वार्थी….इतनी बीमार हो गयी मैं? मेरी बेटी स्कूल जाकर भी इस ख़याल से छूट नहीं पायी कि माँ ने उससे कहा ,’ तुम्हें पता है माँ बीमार है फिर भी तंग करती हो’ । बालमन पर यह कैसा बोझ रख दिया मैंने अनजाने में ?

महकती तन्हाईयाँ

उसके अपने खून में उसका पूरा बदन, उसके कपडे तर हो रहे थे, उसके मुँह से एक दर्दनाक चीख निकली। उसने घबराकर चारों ओर नज़रें घुमाई लेकिन….

मुजरिम हाज़िर हो

‘हाँ, जब तुम्हें पापा अच्छे लगे तो तुम इनका इंटरव्यू कर लेती । और पास होने पर शादी का डिसाइड करती वर्ना बस बॉयफ्रेंड बना लेती । किसी और का इंटरव्यू लेती और उससे शादी कर लेती ।‘

चरित्रहीन …७

तुम समरक्षेत्र में खड़े हो पार्थ, एक ओर तुम्हारा सत्य है जो सुधा के लिए असह्य है और दूसरी ओर सुधा के लिए तुम्हारा उत्तरदायित्व है । एक पक्ष में तुम्हारी इमानदारी और दूसरे पक्ष में तुम्हारी सुधा है । चयन तुम्हारा है पार्थ ।‘

चरित्रहीन …६

उसकी तेज़ साँसों को महसूस करना, उसके नाजुक होंठों को घुलते हुए महसूस करना, उसकी धडकनों में अपना नाम सुनना और ….. ऐसा लगता था प्यार की दहकती हुई गरमी में पिघलकर ही दिल को ठंडक पड़ेगी ।

चरित्रहीन

कभी रुक्मिणी को बताया कि तेरा हृदय जब-तब कालिंदीकूल के कदम्ब पर टिकी अपनी राधे के पास चला जाता है ? उस वेदना की अनुभूति तो ज़रूर होती होगी जो तुम दोनों के अस्तित्व का पर्याय बन गयी । कभी रुक्मिणी से बात करते-करते उसे राधे कहने की भूल हुई ?