द्रौपदी : अग्नि-स्वरुपा

क्या द्रौपदी अपने पुत्रों की जीवनधारा और भाग्यरेखा बदल सकती थी ? यह चिरस्थायी द्वन्द है । नारी स्वयं के लिए जीवन जिए या अपने नातों के लिए ?

तटस्थता का मोल

अपराधी हूँ मैं तो अब दंड से भागकर क्यूँ अपराध और गहन करूँ मैं ? उचित यही है कि इसे गरिमा से वहन करूँ मैं – पीड़ा कितनी भी हो वार यह नियति का सहन करूँ मैं ।

चरित्रहीन …७

तुम समरक्षेत्र में खड़े हो पार्थ, एक ओर तुम्हारा सत्य है जो सुधा के लिए असह्य है और दूसरी ओर सुधा के लिए तुम्हारा उत्तरदायित्व है । एक पक्ष में तुम्हारी इमानदारी और दूसरे पक्ष में तुम्हारी सुधा है । चयन तुम्हारा है पार्थ ।‘

चरित्रहीन …६

उसकी तेज़ साँसों को महसूस करना, उसके नाजुक होंठों को घुलते हुए महसूस करना, उसकी धडकनों में अपना नाम सुनना और ….. ऐसा लगता था प्यार की दहकती हुई गरमी में पिघलकर ही दिल को ठंडक पड़ेगी ।

चरित्रहीन ..५

प्रेम कभी ग़लत नहीं होता । यह तो वो अथाह जलराशि है जिसका मंथन करने पर पहले खुशियों के रत्न और मादक सुरा निकलती है और उसके बाद दर्द, बिछोह, तड़प, जलन और तिरस्कार का हलाहल । जो लोग महादेव की तरह इस हलाहल पर विजय पा लेते हैं उन्हें अंत में यह अथाह जलनिधि अमृत से पुरस्कृत करती है ।

चरित्रहीन ..४

कृष्णा दूर क्षितिज में देखते हुए दर्द से बोले, ’यदि मैं चाहता, तो क्या राधे को अपने पास रोक लेने से कोई शक्ति मुझे रोक लेती ? किन्तु यह चाहना ही मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर था पार्थ ।‘

चरित्रहीन…३

मेरी सुधा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ । हर रूप में, हर हाल में । तभी सुधा ने उलाहना दिया, ‘फिर क्यूँ उस डायन मालती के पीछे खुद को गिराते हो, वो प्यार नहीं वासना है ।’