लागी छूटे ना

मालती को कब दीपक की बातों की लत लग गयी उसे पता ही नहीं चला। दीपक का काम ऐसा था कि सोशल होना उसकी पसंद और मजबूरी दोनों था। मालती गिने चुने लोगों में खुश थी। सोशल होना न उसकी पसंद था और न ही मजबूरी। एक दिन दीपक से उसकी मुलाक़ात सोशल मीडिया पर हुई और पहचान धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गयी। एक दूसरे की बातों पर हँसना, कभी अपने परिवार के बारे में बात करना, कभी किसी पेंटर की कलाकृति पर समीक्षा करना, कभी अपने बचपन की कोई याद बाँटना, और भी न जाने कितनी ही बातें थी जो वो दोनों किया करते थे। शायद ही कोई दिन होता हो जब वो दोनों बात न करते हों। जिस दिन बात नहीं होती थी, उस दिन मालती को बेचैनी सी महसूस होती। एक इंतज़ार बार-बार उसे उसका मोबाइल अनलॉक करने को मजबूर कर देता था। वो बेसब्री से फेसबुक मैसेंजर में दीपक के नाम के साथ जुड़े स्टेटस बताने वाले छोटे से हरे गोले का इंतज़ार करती थी।

एक बार मालती को किसी काम से दस दिन के लिये कहीं बाहर जाना पड़ा और वहाँ इंटरनेट की सुविधा नहीं थी। नयी जगह थी, नया काम था और मन में यह तसल्ली भी थी कि बस दस दिन की तो बात है। मालती ने सोचा था कि दीपक उसके लौटते ही उससे बात करेगा। मालती को लौटे दो दिन हो गए थे और दीपक ने कोई बात नहीं की। लड़की होने के नाते मालती ने भी पहल नहीं की, हालाँकि उसे दुःख हुआ कि दीपक ने उसकी ग़ैर मौज़ूदगी महसूस नहीं की। फिर सोचा शायद दीपक कहीं बिज़ी होगा। चलो, मैं ही पहल कर लेती हूँ।

मालती का मैसेज पाते ही दीपक ने पूछा- ‘कब लौटी?’ और फिर गुस्सा हो गया- ‘बताया क्यूँ नहीं?’ मालती ने कहा कि जाने से पहले तो बताया था। दीपक ने कहा कि वो भूल गया था। थोड़े मनमुटाव और मान मनुहार के बाद दोनों फिर से सामान्य ढ़ंग से बातें करने लगे। एक दिन दीपक की बातों से मालती को लगा कि दीपक की पत्नी उन दोनों की दोस्ती से परेशान है। मालती को दीपक की बातों से लगा कि दीपक संभाल लेगा। दीपक ने बातचीत कम कर दी, तब मालती को लगा कि दीपक सब ठीक करने के लिए समय ले रहा है। मालती का इंतज़ार पूरा हुआ और दीपक से फ़िर से बात शुरू हुई। लेकिन अब बातें इतनी बेबाकी से नहीं हो पाती थी। कुछ था जो उन दोनों की दोस्ती के दरमियान पसर रहा था। शायद दीपक की पत्नी की असहजता? धीरे-धीरे फ़ासले बढ़ते गए और आख़िरकार दो साल के साथ के बाद दीपक और मालती अलग हो गए।

“कितने पास था उसके और कितना अपना सा था दीपक” यही सोचते-सोचते मालती की उँगलियाँ उसके कानों तक पहुँच गयी। वो मुस्कुराई यह सोचकर कि दीपक को उसने झुमके की तरह कानों में पहन रखा था। दीपक की बातों की मिठास झुमके की रुनझुन जैसी ही तो थी। या तो मालती इतनी जल्दी उस दुःख को महसूस करने से मुकर रही थी या उसे ठीक से अंदाज़ा लग नहीं पाया था अपने नुकसान का। ख़ुद को धोखा देते हुए ख़ुद से बोली- ‘गिर गया झुमका, गिरने दो। चुभ गया काँटा, चुभने दो।’

लेकिन धोखा कब देती ख़ुद को? समय के साथ दुःख पूरी तरह मालती पर छा गया। मालती ख़ुद को बहलाने की पूरी ईमानदार कोशिशें कर रही थी। मगर काँटा ऐसा चुभा था कि चुभन कम ही नहीं हो रही थी। कभी मालती सिर झुका कर आँसू बहाने लगती, लेकिन हालत में बदलाव नहीं आता था। अपने आँसुओं में वो ख़ुद ही न बह जाये, इस डर से वो हड़बड़ी में आँसू पोंछ लेती थी। किसी भी तरह न बहला सके ख़ुद को, तो बहरा कर देने वाली आवाज़ में गाना सुनती-

‘ओ रे पिया रे, घिस गए सारे दर्द भरे नगमे
अब रैप-वैप सा रॉक-वॉक सा बजता रग-रग में
पिया मूव ऑन, मूव ऑन, मूव ऑन’

गाना रिपीट मोड में चलता जाता। मालती पहले कूद-कूद कर नाचती, फ़िर चिल्ला चिल्लाकर गाती और फ़िर डबडबायी आँखों और क़दमों की थमती थिरकन के साथ ख़ुद को हारा हुआ महसूस करती। ख़ुद को भटकाने की लाख कोशिशें करती, लेकिन वो भी सूरदास हो गयी थी –

‘मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥’

हिंदी सिनेमा के वो सारे घिसे पिटे संवाद जो बार-बार कहते हैं- “एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।” इन सबको जलाकर राख कर देना चाहती थी वो। इनको इतिहास से हमेशा के लिए साफ़ कर देना चाहती थी वो। इन्हीं घटिया किस्म के संवादों और सोच की वजह से दीपक की बीवी ने उससे दीपक छीन लिया। “मुझे वही झुमका वापस चाहिए” उसका मन बार-बार चीख़ कर यही कहता था। ख़ुद से जूझती, लड़ती मालती अब थकने लगी थी। मायूस और थकी हुई मालती को अपने रंगों की याद आई। उसके रंगों से प्यार ने उसे हमेशा उसके एहसासों को बाहर निकालने की, कुछ नया रचने की और सुकून महसूस करने की सहूलियत दी थी। उसके क़दम अपने कैनवस और रंगों की तरफ बढ़ गए और उसने फैसला किया कि आज वो कैनवस को गंदे भद्दे रंगों से भर देगी। लेकिन हाय!! जैसे ही कैनवस याद आया झुमका भी याद आ गया। दीपक से मुलाक़ात ऑनलाइन आर्ट प्रतियोगिता में ही तो हुई थी। दीपक बहुत अच्छा चित्रकार था। दीपक ने उसकी कितनी तारीफ़ की थी- ‘तुम तो गज्ज़बे हो, यार। मैं तो तुम्हारा जबरा फैन हो गया।’ उफ़्फ़! कहाँ जाये वो? अब तो रंगों की दुनिया भी अकेले उसकी नहीं रही। हाथों में कूची उठाई तो, मगर हाथ कांपने लगे और कूची हाथों से छूट गयी। डर गयी मालती कि न जाने कूची अपने आप क्या बना देगी। शायद कुछ ऐसा जिससे मालती नज़र चुराने की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी।

ख़ुद से कई बार बहस करती मालती कि यह फ़िल्मी बातें बकवास हैं, कचरा हैं। दीपक ने जब एक बार उससे कहा था- ‘एक लड़के और एक लड़की के बीच “दोस्ताना प्यार” जैसा कुछ नहीं होता’ तो मालती ने कितनी बहस की थी। बेबाकी और आत्मविश्वास से उसने दीपक से कहा था- ‘मैं तुमसे प्यार करती हूँ, लेकिन वो प्यार जो एक दोस्त के लिए होता है।’ अब वो यही बात ख़ुद से कह रही थी तो आत्मविश्वास साथ नहीं दे रहा। कभी मालती सोचती कि जब सालों पहले उसकी सबसे अच्छी सहेली उससे छूट गयी थी तो मालती कितना रोई थी। महीनों दुआ मांगी थी कि सहेली लौट आये और सब कुछ पहले जैसा हो जाये। अगर मालती आज दीपक के लिये दुखी है, तो यह उलझन क्यूँ है? शर्मिंदगी क्यूँ है? यह दुःख कुछ अलग क्यूँ है? दीपक की याद तो बहुत आती, लेकिन यह दुआ करने में उसके होंठ कांपते थे कि दीपक लौट आये। दीपक के लौट आने के ख़याल से मालती डर क्यूँ रही थी?

कभी गुस्से में धधकती मालती सोचती कि एक बार दीपक उसे कहीं मिल जाये तो यह सारा गुस्सा, दर्द और बेबसी वो दीपक के गाल पर तमाचे की तरह दे मारे। मालती उसका कॉलर खींचकर उसे झकझोरकर पूछे- ‘मुझे गलत साबित करने के लिए ही तुम मेरी ज़िन्दगी में आये थे। मैं नफ़रत करती हूँ तुमसे। मैं एक शादीशुदा लड़के से प्यार नहीं कर सकती। मैं किसी का घर नहीं तोड़ सकती। मैं दीपक से प्यार नहीं करती। नहीं करती।’ यह बडबडाते हुए गुस्से में मालती ने अपनी पूरी ताक़त से अपने कानों को अपनी मुट्ठी में कसकर भींच लिया और एक तीखा दर्द उसकी आँखों से रिसने लगा। छटपटाहट मालती के दिल-ओ-दिमाग से छलांग लगाकर उसके पूरे वजूद पर छाने लगी। किसी से तो कहना ज़रूरी है वरना मैं पागल हो जाऊंगी। किससे कहूँ? कौन है, जो मुझे बिना नैतिकता के तराजू में तोले मेरा दर्द सुनेगा? कहाँ है वो? पसीने में लथपथ बदहवास मालती अपने हाथों में अपना सिर पकड़े कमरे में इधर से उधर तेज कदमों से टहल रही थी। हाँ, मेरे रंग। मेरा कैनवस। वो सुनेगा मुझे, वो समझेगा मुझे।

मालती दौड़ती हुई गयी और कैनवस पर हाथों से लाल रंग मलने लगी। फिर उसने अपने लाल रंग से सने हाथों में कूची उठा ली। अब कूची कैनवस पर दौड़ रही थी, शायद अपनी ही मरज़ी और अपनी ही चाल से। मालती भी कूची के काले जादू में रंगी कूची की हर हरकत और हर रंग में उसका साथ दे रही थी। बहुत देर कैनवस पर दौड़ने के बाद कूची रुकी और मालती अपने होश में लौटी। कैनवस पर रंगों का ऐसा भयानक तांडव देखकर मालती सन्न हो गयी। ऐसा लगा मालती के अन्दर का सारा गुस्सा, तड़प और प्यार अपना बाँध तोड़कर कैनवस पर उभर आया हो। मालती धम्म से ज़मीन पर बैठ गयी और सोचने लगी कि यह सब क्या हो रहा है? मैं किससे लड़ रही हूँ? बॉलीवुड के संवादों से या अपने आप से? समाज के किसी पूर्वाग्रह से या नैतिकता के पाश से? क्यूँ मैं ख़ुद से सच नहीं बोल पा रही हूँ? रंगों ने एक बार फिर अपनी दोस्ती निभाई और मालती को उसका सच कैनवस पर दिखा दिया। रंगों ने बता दिया कि दीपक की बीवी ग़लत नहीं थी। अब मालती सोच रही थी कि क्या दीपक को भी मुझ से प्यार हो गया था? यह जानते हुए भी यह सब सोचने और जानने से कुछ नहीं बदलने वाला है, मालती एक बार दीपक से सुनना चाहती थी कि वो भी उसे प्यार करता था। वो बैठी यही गुनगुना रही थी-

तुम तो ना कहो हम, ख़ुद ही से खेले
डूबे नहीं हम ही यूँ, नशे में अकेले
शीशे में आपको भी उतारे चले गये।

दिनों की थकी हुई मालती को अपने आलिंगन में लेने दूर क्षितिज से नींद और सुकून दौड़े आये। पलकें नींद ओढ़ कर ढलक गयी और सुकून होंठों पर सज गया। बहुत दिनों के बाद मालती बेसुध सोयी और उसके चेहरे पर बच्चों सी निष्पाप, निष्कपट रंगत लौट आई। एक दर्द से मालती जगी और किचन में जाकर मैगी बनाने लगी। उसे बहुत जोर की भूख लग आई थी।

कैनवस को शांति से देखती हुई मालती मैगी और चाय का स्वाद ले रही थी। उसके होंठों पर एक मुस्कान खिंचने लगी जो धीरे-धीरे खिलखिलाहट में बदल गयी। हालातों के जिस मज़ाक पर वो कल तक रो रही थी, अब उन हालातों के साथ मिलकर ख़ुद पर हँस रही थी। ख़ुद को पूरी तरह अपनाकर मालती कितना हल्का महसूस कर रही थी। बीती बातें एक-एक करके उसके आँखों के सामने से गुज़रने लगी। प्यार हो गया, तो हो गया। इश्क़ कब सही ग़लत के साँचे में खरा उतर पाया है? एक गहरी साँस लेकर उसने चाय का कप अपने होंठों से लगा लिया।

जब तक सच से मुँह चुरा रही थी, तो सच डरा रहा था। आज सच को अपना लिया और ख़ुद को अपना लिया, तो अपने आप से शर्मसार नहीं मालती। आज अपराधबोध के शिकंजे से आज़ाद हो गयी मालती और उसने एक महकता गीत गाना शुरू किया-

इश्क़ का रुतबा इश्क़ ही जाने

Pic Credit: Malik Mahrooz

2 Comments Add yours

  1. Bahut bahut bahut khoob. . Resonated very deeply. Some songs with time are best sung alone. Some canvases best created for oneself. ❤️

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      I am so happy that you liked it. Thank you for reading and leaving your feedback. 🙏❤️

      Like

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