मैं हूँ ना, माँ

इतनी स्वार्थी….इतनी बीमार हो गयी मैं? मेरी बेटी स्कूल जाकर भी इस ख़याल से छूट नहीं पायी कि माँ ने उससे कहा ,’ तुम्हें पता है माँ बीमार है फिर भी तंग करती हो’ । बालमन पर यह कैसा बोझ रख दिया मैंने अनजाने में ?

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रैगिंग के वो दिन

यह मुखिया लोग जो बड़े सरकार के सामने ‘हम वो हैं, जो दो और दो पांच बना दें’ ऐसी डींगें हांक कर आये थे, उनका हमारी एक गलती ने फ़ालूदा बना दिया था । और इसके लिए हमे माफ़ी मिलना नामुमकिन था ।

कैसी ज़िद्द

कीमत में यह दर्द और ज़हर है तो
हर रोज़, हर पल पीना है मुझे
फिर क्यूँ भुला दूँ तुझे?

महकती तन्हाईयाँ

उसके अपने खून में उसका पूरा बदन, उसके कपडे तर हो रहे थे, उसके मुँह से एक दर्दनाक चीख निकली। उसने घबराकर चारों ओर नज़रें घुमाई लेकिन….

चिट्ठी

हिचकियों के बीच कुछ नाम आते जाते हैं या कुछ नामों के बीच हिचकियाँ आती जाती हैं! कहीं यह हिचकियाँ साँसों को डूबने से बचाने के लिए तो नहीं आती? हिचकियाँ आई तो अमूमन मतलब आपके प्यार को किसी ने जवाबी चिट्ठी भेजी है ।

मुजरिम हाज़िर हो

‘हाँ, जब तुम्हें पापा अच्छे लगे तो तुम इनका इंटरव्यू कर लेती । और पास होने पर शादी का डिसाइड करती वर्ना बस बॉयफ्रेंड बना लेती । किसी और का इंटरव्यू लेती और उससे शादी कर लेती ।‘

चरित्रहीन …७

तुम समरक्षेत्र में खड़े हो पार्थ, एक ओर तुम्हारा सत्य है जो सुधा के लिए असह्य है और दूसरी ओर सुधा के लिए तुम्हारा उत्तरदायित्व है । एक पक्ष में तुम्हारी इमानदारी और दूसरे पक्ष में तुम्हारी सुधा है । चयन तुम्हारा है पार्थ ।‘

चरित्रहीन …६

उसकी तेज़ साँसों को महसूस करना, उसके नाजुक होंठों को घुलते हुए महसूस करना, उसकी धडकनों में अपना नाम सुनना और ….. ऐसा लगता था प्यार की दहकती हुई गरमी में पिघलकर ही दिल को ठंडक पड़ेगी ।

चरित्रहीन ..५

प्रेम कभी ग़लत नहीं होता । यह तो वो अथाह जलराशि है जिसका मंथन करने पर पहले खुशियों के रत्न और मादक सुरा निकलती है और उसके बाद दर्द, बिछोह, तड़प, जलन और तिरस्कार का हलाहल । जो लोग महादेव की तरह इस हलाहल पर विजय पा लेते हैं उन्हें अंत में यह अथाह जलनिधि अमृत से पुरस्कृत करती है ।

चरित्रहीन ..४

कृष्णा दूर क्षितिज में देखते हुए दर्द से बोले, ’यदि मैं चाहता, तो क्या राधे को अपने पास रोक लेने से कोई शक्ति मुझे रोक लेती ? किन्तु यह चाहना ही मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर था पार्थ ।‘

चरित्रहीन…३

मेरी सुधा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ । हर रूप में, हर हाल में । तभी सुधा ने उलाहना दिया, ‘फिर क्यूँ उस डायन मालती के पीछे खुद को गिराते हो, वो प्यार नहीं वासना है ।’ 

चरित्रहीन..२

दीपक, जितना प्यार मैं तुमसे करती हूँ, तुम उतना प्यार मुझसे क्यूँ नहीं कर सकते?’ कहते-कहते अपने आंसूओं में बहती एक कमजोर नाव सी सुधा दीपक की पत्थर जैसी मजबूत छाती पे टिक गयी ।