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ज़रूरत है ज़रूरत है ज़रूरत है

इक आसरे की जो

इक बूँद रंग में समंदर रंगा -१

कैसा होता है ना प्यार में!! राधा कान्हा बन जाती है और श्याम राधिका…. आज भी वही हो रहा है… पराग हिना हो गया और हिना पराग.

द्रौपदी : अग्नि-स्वरुपा

क्या द्रौपदी अपने पुत्रों की जीवनधारा और भाग्यरेखा बदल सकती थी ? यह चिरस्थायी द्वन्द है । नारी स्वयं के लिए जीवन जिए या अपने नातों के लिए ?

बोलती आँखें और तस्वीर

एक बार किसी ने पूछ लिया ‘उसकी तो मूँछें हैं ना?’ मेरे पास कोई जवाब न था । बहुत ज़ोर देने पर भी ध्यान ही नहीं आता था कि मूँछ है कि नहीं ।

सब दिन होत न एक समान

मुझे घोर आश्चर्य हुआ – ऐसे कैसे ! जैसे-तैसे तो मैंने नयी परिस्थितियों से सामंजस्य साधा था, एक नैराश्य को स्वीकृति देकर आशा की चुटीली चुटकियों से स्वयं को मुक्त किया था ।

तटस्थता का मोल

अपराधी हूँ मैं तो अब दंड से भागकर क्यूँ अपराध और गहन करूँ मैं ? उचित यही है कि इसे गरिमा से वहन करूँ मैं – पीड़ा कितनी भी हो वार यह नियति का सहन करूँ मैं ।

निष्प्राण शब्द

यह सब क्या हो गया ! कहाँ गया सब कुछ ? किसने हैक कर लिया मेरा सॉफ्टवेयर ? क्या वायरस है यह ? गीत बढ़ता जा रहा है