लेकिन फिर भी

शर्मसार हूँ मैं ख़ुद से

इतनी लानत, इतनी ज़िल्लत

लेकिन, फिर भी, मैं ज़िंदा हूँ

क्यूँ इतना ज़ोर लगाया जीने को

जब आँसू ही हैं पीने को

याद नहीं कब खोया ख़ुद को

लेकिन, फिर भी, कुछ भूली तो नहीं हूँ

आत्मसम्मान की कोई झलक नहीं

छिः ऐसा जीवन

लेकिन, फिर भी, मैं मरी नहीं हूँ

आज अनोखा शोर मचा है

इनक़लाब घनघोर मचा है

अधमरी औरतें, उधड़े रिश्ते,

रिसते ज़ख्मों का रेला है

लेकिन, फिर भी, मैं दूर खड़ी हूँ

परिवार की मर्यादा, इज़्ज़त

अपने टूटते कन्धों पर ढोती हूँ

अपनी ही सखी सहेलियों से

ग़द्दार होने के ताने सुनती हूँ

लेकिन, फिर भी, मैं चुप रहती हूँ

मुझमें साँसें लेती है ममता

इन नन्हें पौधों के कल की ख़ातिर

अपना आज निछावर करती हूँ

रातें जागकर कटती हैं

लेकिन, फिर भी, मैं सपने बुनती हूँ

अपने नन्हे-मुन्नों में

जितनी बन सके संवेदना भरती हूँ

मीठी बातों, मासूम हँसी में

सब पीड़ा बिसराती हूँ

है चूल्हे भर आग मेरी झोली में

लेकिन, फिर भी, सूरज की आशा करती हूँ

देखो, मैं अब भी सपने बुनती हूँ

pic credit: Himalayan Travel group

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