एक अफ़सोस!

‘मेरी प्रीपरेशन लीव चल रही है, मैंने कुछ सवाल हल किये हैं और मुझे कुछकन्फ्यूजन हैं। क्या तुम मेरी कॉपी टीचर तक पहुँचा दोगी? उनके कमेंट्स मुझे बता दोगी?’, सोनू दीदी ने मुझसे पूछा। मैं और सोनू दीदी एक ही स्कूल में पढ़ते थे। वो मुझसे दो क्लास सीनियर थीं। मैं आंठ्वीं में और वो दसवीं कक्षा में।

यू पी बोर्ड की दसवीं कक्षा का आतंक हर तरफ़ किस क़दर ग़दर मचाता है, यह हर यू पी बोर्ड का बच्चा और उसका परिवार बखूबी जानते हैं। सारी गतिविधियाँ बंद हो जाती हैंऔर जीवन पर अघोषित कर्फ्यू लग जाता है। कहीं घूमने नहीं जाना, किसी पार्टी में शिरक़त न करना, गीत संगीत से अजनबी हो जाना और केवल किताबों में मुँह दिए रहना…बच्चे की बर्बाद ज़िन्दगी का इतना ही फ़साना है। जब परीक्षा की घड़ियाँ पास आ जाएँ तो प्रीपरेशन लीव में बस पढ़ना और पढ़ने की एक्टिंग करना, इतनी ही मियाद होती है। वी आई पी स्टेटस हो जाता है कई मामलों में, ख़ासकर खाने पीने के मामले में। हर चीज़ सामने परोसी हुई मिलती है। मम्मी तो मम्मी, पापा तक शाम को अंडे उबालकर, छीलकर, नमक बुरक कर तश्तरी में स्टडी टेबल पर पहुँचाते हैं, ताकि बेकार के कामों के लिए उठना न पड़े।

अब पढ़ाई करते दौरान किसी टॉपिक पर कोई डाउट या कन्फ्यूजन हो जाये तो? भई, दोस्तों से बातचीत…मतलब साथ में कुछ फालतू की बातें भी हो ही जाएँगी…तो कैंसिल। दूसरा रास्ता… स्कूल जाओ और टीचर से बात करो। ओहो! लेकिन इसमें तो आने-जाने में कितना कीमती वक़्त ख़राब हो जायेगा… तो यह भी कैंसिल। अब क्या रास्ता बचा? हम्म..अपने स्कूल के किसी जूनियर को, जो कि आपके पड़ोस में भी रहता हो, उसको पकड़ो और कॉपी में डाउट या कन्फ्यूजन लिखकर टीचर तक पहुँचाओ और उसी जूनियर से कॉपी वापस ले आने को कहो। और इसके लिए उस जूनियर के घर भी नहीं जाना, आपके मम्मी-पापा मुस्तैदी से सुबह गेट पर तैनात रहेंगे और जैसे ही जूनियर अपने घर से स्कूल को निकला, उसको पकड़ लेंगें। मम्मी जूनियर से बात करेंगी और पापा अपने बच्चे को आवाज़ देकर बुलायेंगे। बच्चा जूनियर को जल्दी से जल्दी, कम से कम शब्दों में अपनी बात बतायेगा। ऐसे घेराव के बीच जूनियर ‘हाँ’ के सिवा और कह क्या सकता है? लो जी, टीम वर्क का कितना सुन्दर एक्ज़िक्युशन! नतीजा..कॉपी जूनियर के बैग में।

तो ऐसे ही हालातों में सोनू दीदी की कॉपी मेरे बैग में आ गयी। और मुझे काम मिल गया, दसवीं में उस सब्जेक्ट के टीचर का पता करके, उसको कॉपी देना और साथ में उनके कमेंट्स अपनी याददाश्त में रिकॉर्ड करना। रास्ते में सोचा, किससे पता करूँ..कौन टीचर है और कहीं वो टीचर खडूस टाइप हुआ तो? कहीं मुझे ही डांट दिया कि तुम्हें क्या समझ आएगा जो मैं बताऊंगा, जाओ, जिसकी कॉपी है उसको भेजो, तो? अगले साल वही टीचर मुझे भी पढ़ायेगा, अभी से एक मूर्ख वाली इमेज बन जाएगी उसकी नज़रों में मेरी। और फिर  ‘फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ द लास्ट इम्प्रैशन’, यह तो बड़ा ही जोख़िम वाला काम है। मेरी हथेलियाँ हलकी गीली सी होने लगी और मैंने गहरी साँस भरी। स्कूल आ गया था और मैं हर रोज़ की तरहअपने कार्यक्रम में व्यस्त हो गयी। दोस्तों से बातचीत, असेंबली फिर क्लास के बाद क्लास, लंच टाइम फिर क्लासेज़ और फाइनली छुट्टी। सचमुच, मैं भूल ही गयी कि दीदी का काम करना था मुझे कोई। घर लौटते हुए देखा आंटी पलक पांवड़े बिछाए मेरा रास्ता देख रहींथीं। एक माँ की चिंता थी यह कि दोपहर में अपने नियमित काम छोड़कर वो गेट पर धूप में खड़ी थीं। उन्होंने मुझे आवाज़ देकर रोका और मैं सहम गयी। घबराहट में मैंने झूठ की ढाल ली और कहा, ‘आंटी, आज टीचर ही एब्सेंट थे। कल दे दूँगी कॉपी उनको।’ जान बची मेरी तो खुद को शाबाशी भी दी… बहुत ही सही झूठ बोला मैंने।

अगले दिन फिर मैंने स्कूल में दीदी के काम के लिए कुछ नहीं करा। क्यूँ नहीं..यह पूरी तरह तो याद नहीं…पर दो वजहें पक्के तौर पर याद हैं मुझे। पहली, यह स्कूल था कॉलेज नहीं, तो क्लास एक ही कमरे में होती थी और एक टीचर के जाने से पहले ही दूसरी टीचर द्वारपाल बने खड़ी होती थी। यहाँ टॉयलेट तक जाने के लिए परमिशन लेनी होती थी। ऐसे में, किसी और की कॉपी पर कमेंट लेने जाने के लिए कैसे पूछें? कब पूछें? और दूसरी वजह यह कि शायद एक बचकाना डर मन में बैठ गया था जो कह रहा था इस जोख़िम को उठाने के चक्कर में, इस टीचर की नज़रों से भी जाओगी और जो अगले साल मिलने वाला है, उसकी नज़रों से भी। इन दो वजहों से मैंने दूसरे दिन भी काम याद होने के बावजूद कोई कदम नहीं उठाया। लौटते हुए फिर आंटी ने रोका और मैंने नया झूठ पेश किया, ‘सर ने कॉपी ले ली, कहा कि कल कमेंट्स बताएँगे’। आगे बढ़ी तो धड़कने तेज़ होने लगी, कल क्या मैं टीचर के पास जाऊँ और यह भी कहूँ कि आज ही कमेंट्स चाहिए। उस दिन मन बहुत व्यथित रहा, कभी खुद पर गुस्सा आता, कभी अपने डरपोक होने पर, कभी उन आंटी पर और दीदी पर।

अगले दिन सुबह दीदी ने रोककर कहा, ‘आज ज़रूर ले आना मेरी कॉपी, प्लीज़’। उस समय रो देने का मन हुआ मेरा। पर उनको ‘हाँ’ करके मैं चल दी स्कूल और फिर हिम्मत नहीं हुई। एक बार बहुत हिम्मत की तो इस बात में फस गयी कि इंग्लिश में परमिशन कैसे लूँ? हंसी की बात न हो जाये। कोई बहुत बड़ी बात न थी, पर, डर नए-नए पैंतरे खेल रहा था मेरे साथ। उस दिन भी मैंने कुछ न किया और लौटते हुए मैंने आंटी को फिर वही झूठ कह दिया, ‘सर ने कहा कि कल कमेंट्स बताएँगे’।

आंठ्वीं क्लास में मुझे, सच में, दसवीं के आतंक का कोई अंदाज़ा नहीं था। मेरी कल्पना से बाहर था कि वो कॉपी, कुछ डाउट और कन्फ्यूजन इतने ज्यादा इम्पोर्टेन्ट हो सकते हैं। अगले दिन स्कूल में क्लास के दौरान देखा, दीदी क्लास के बाहर खड़ी हैं और पलक झपकते परमिशन लेकर मेरे पास आयीं और अपनी कॉपी माँगी। मैंने चुपचाप कॉपी निकालकर उनको दी और सर झुका कर बैठ गयी। दीदी ने भी कुछ नहीं कहा, कभी नहीं कहा। दीदी के एग्जाम हो गए वो नए स्कूल में चली गयी और अगले बोर्ड की परीक्षा में जूझने लगीं और मैं अब नवीं-दसवीं कक्षा के जाल में फ़स गयी। जब मेरे बोर्ड एग्जाम होने वाले थे और मेरी प्रीपरेशन लीव चल रही थी, तब मुझे पहली बार उन दीदी की तकलीफ़ और व्यग्रता का एहसास हुआ। मैं माफ़ी माँगना चाहती थी पर मिलने-मिलाने का समय हम दोनों में से किसी के भी पास नहीं था। स्कूल अलग हो गए, शहर अलग हो गए और फिर देश अलग हो गए। यह मलालआज तक मेरे दिल में है कि मैं उनसे कभी माफ़ी नहीं मांग सकी। उनको फेसबुक पर ढूँढना चाहा, नहीं मिली। यह घटना मेरी ज़िन्दगी की उन घटनाओं में से जो मुझे हर बार खुद से शर्मिंदा कर जाती हैं। काश! मैं एक बार दीदी से मिल पाती! काश! एक बार!

जब भी बीती हुई ज़िन्दगी पर नज़र डालती हूँ तो खुद को आज़ाद करने की कोशिश करती हूँ। ख़ुशनसीब हूँ कि जब अपनी गलतियों की माफ़ी मांगती हूँ तो लोग माफ़ कर देते हैं और अपनी दोस्ती से भी नवाज़ते हैं। पर इस मलाल से कैसे बाहर निकलूँ..यह समझ नहीं पाती। मन में कई बार माफ़ी मांग चुकी हूँ पर मन शांत नहीं होता, शर्मिंदगी कम नहीं होती…यहाँ फ़स गयी हूँ…आज़ादी की राह नहीं सूझती।

Image credit :http://www.alliancenet.org/christward/how-not-to-ask-for-forgiveness

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