वो एक्स्ट्रा पेंसिल

बात है, सन 1987 की और जगह है, नवाबों की नगरी, लखनऊ । तब हवा में ताज़गी आज से ज्यादा होती थी और आबादी कम होने के कारण खुला-खुला सा लगता था । तब 2 किलोमीटर की दूरी भी बड़े इत्मिनान में, पैदल चलते हुए, कट जाती थी । कभी-कभी ही सुनाई देने के कारण गाड़ियों की चिल्ल-पों बड़ी नायाब और कौतूहल का विषय होती थी । चिड़ियों की चीं-चीं और सायकिल की ट्रिन-ट्रिन का संगीत रोजमर्रा की ख़ुराक होता था । तब मैं थर्ड क्लास में पढ़ती थी – ओह! कहीं मैंने मेरी उम्र का खुलासा तो नहीं कर दिया । खैर, तो मैं बता रही थी कि मैं तब तीसरी कक्षा में पढ़ती थी और मेरा स्कूल घर से लगभग 2 किलोमीटर दूर था । मेरी क्लास एक बड़े स्कूल में पहली मंजिल पर होती थी । यह दरअसल तीसरी क्लास का प्रमोशन स्टेटस था, सेकेंड क्लास में हम ग्राउंड फ्लोर पर थे और उसके पहले उसी स्कूल की छोटे बच्चों वाली बिल्डिंग में थे । हर क्लास के साथ हमें हमारे बड़े होने का सज्ञान और पारितोषिक देने का यह स्कूल का अपना ही निराला सा ढंग था । ऐसा नहीं कि टीचर्स ने कोई कसर छोड़ रखी हो- डोंट अंडरएस्टीमेट द इश्टाइल ऑफ़ द टीचर्स । हर नयी क्लास के साथ टीचर्स नए तरह के खडूस, और ज्यादा सख्त और बेरहम किस्म के तरीक़े इंट्रोड्यूस करते थे ।

हमारे एक मैथ्स के सर थे, जो गलत पहाड़ा सुनाने पर हम नन्हे-मुन्ने 7 साल के बच्चों को गोद में उठाकर क्लास की खिड़की से लटका देते थे और पूछते थे, “फेंक दूँ नीचे?” अब आप ही कहिये इसका क्या जवाब हो सकता है ? सभी बच्चे दहाड़ें मार-मार कर “नहीं’नहीं” चिल्लाते थे । अगला सवाल होता था- “अब याद करके आओगे?” इतने टॉर्चर के बाद किसकी मजाल जो अपना “नहीं-नहीं” वाला जवाब दोहरा सके ! तो अगला जवाब होता था, “एस सर” । इस तरह हमारे सर एक-एक पत्थर को तराश कर हीरा बना रहे थे । उनके पास एक छड़ी हमेशा होती थी- परमार्थ के हेतु । कोई कॉपी भूल गया- छड़ी उसकी, कोई पेंसिल नहीं लाया- छड़ी उसकी, कोई होमवर्क बिन किये आया- छड़ी उसकी और हाँ, क्लास में गलत आंसर दे दिया फिर तो कहने ही क्या । अच्छा, एक को छड़ी पड़ी तो समझो सर का खाता खुल गया, अब तो सेंचुरी बनाकर ही थमेंगे और सभी उसकी लपेट में आयेंगे। ऐसे में क्लास में कुछ लड़के ऐसे होते हैं जो छड़ी पड़ते ही उँगलियाँ छितराये कलाई को सुपरसोनिक गति से झटकते हुए दोहरे हो जाते थे, तुरंत ही उनकी लम्बाई आधी हो जाती थी । गिट्टक भर के तो पहले ही थे अब अद्धे गिट्टक रह गए । सर को यह बात बिलकुल पसंद नहीं थी । वो चिल्लाकर कहते, “हाथ खोलो” और उस सिंह गर्जना से पूरी क्लास दहल जाती थी और सर के सिर का तापमान बढ़ जाता था । नतीजा- और पिटाई । जब अपनी बारी आती थी तो उन लड़कों पर बहुत गुस्सा आता था, “ओवरएक्टिंग की दुकान कहीं के, इतनी जोर भी नहीं मार रहे हैं सर, बिना वजह इतना डराया और सर का गुस्सा भी बढ़ाया” । और अपनी बारी निपट जाने के बाद सब निश्चिंत हो जाते थे कि आज का कोटा पूरा । उनकी क्लास में कोई चूं भी नहीं करता था । उनकी क्लास ने हम सभी बच्चों को एकता और मिलजुल कर रहने का पाठ बखूबी सिखाया । मिसाल के तौर पर अगर कोई पेंसिल भूल आया है तो पूरे क्लास में हलचल मच जाती थी कि कौन २ पेंसिल लाया है । उस समय पेंसिल बॉक्स में एक पेंसिल, एक रबड़, एक कटर, एक स्केल इतना ही राशन होता था । और पेंसिल छोटी हो जाने पर उसके पीछे किसी पेन का कैप लगाकर इस्तेमाल करना बड़ा ही नार्मल सा काम था । पता नहीं परचेजिंग पॉवर कम थी, कन्ज्युमरिज़म कम था या शो ऑफ कम था पर हाल लगभग सभी का यही था । इसलिए किसी के बॉक्स में २ पेंसिल होना बड़ी बात थी । और जिसके पास दिव्यप्रसाद की तरह २ पेंसिल निकल आती थी तो वह यह नहीं देखता सोचता था कि जो नहीं लाया है वो दोस्त है या नहीं है- अरे दे दो, जो भी हो दे दो, खाता खुलने से बचा लो वरना कोई नहीं बचेगा । ‘अनेकता में एकता’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का इससे अच्छा उदहारण, कम से कम, मेरे पास तो नहीं है ।

आज जब अपनी 7 साल की बेटी और उसके दोस्तों के पेंसिल बॉक्स देखती हूँ तो यह सब बातें मुझे याद आती हैं । अब तो बच्चों के पेंसिल बॉक्स भी किसी गैजेट से कम नहीं होते । दो मुख्य द्वार और कम से कम दो खिड़कियाँ तो होती ही हैं । एक खिड़की से इरेज़र तो दूसरी से शार्पनर झाँकता है और किसी-किसी में तो एक छोटा सा लैंप भी होता है ! बताइये । और बॉक्स खोलेंगे तो पेंसिलें ही पेंसिलें । लेकिन इनमें से कोई पेंसिल ऐसी नहीं जो इन नन्हें-मुन्ने नौनिहालों को शेयरिंग सिखाती हो । यह सब फ्लौंट करने के लिए हैं । यह सब “एक्स्ट्रा” हैं, यूज़लेस हैं । कितना बदल गया बचपन ? लेकिन इसमें बच्चों का और उनके बचपन का कोई दोष नहीं है । बहते-बहते समय के दरिया में हम जहाँ आ पहुँचे हैं वहाँ केंद्र में बस “सेल्फ़” है “कम्युनिटी” कब दरकिनार हो गई पता ही नहीं चला । और समय के दरिया में उलटे कैसे चलें इसका भी कोई रास्ता नहीं सूझता ।

image credit: www.snapdeal.com/product/saamarth-impex-pencil-box-with/654180180715

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2 Comments Add yours

  1. Anmol says:

    Shandar lekhan …. Ek science ke hamare sir bhi kuchh ese hi dangerous the …aakho ke samne unke period ka visual aa gaya… Bachpan to humne jiya hai dost aaj ke bache ye anubhav kaha se layenge

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    1. hemasha says:

      ha ha ha … sach me pahale ke teachers bade hi khurrat hote the.. 😀 thank you dropping the comment dear. ❤

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