मन मरघट पर मैं राज करूँ

मन का अँधियारा

जब अपनी सत्ता का विस्तार करे ।

फैलाये चील से डैने (पंख),

चहुँदिशी में प्रचार-प्रसार करे ।

मैं दुबक कहीं तब जाती हूँ,

यह दिग्विजयी सा हुँकार भरे ।

हर ओर त्राहि मच जाती है

एक मैं ही नहीं, सगरी (सारी) दुनिया

सहमी-सहमी सी जाती है ।।

फिर कोई निर्मोही

मेरे भीतर से उठता है ।

वो दबा, कुचला, मरा हुआ अरमान

सामने आता है ।

मन मरघट सा जग जाता है ।।

एक चिता वहाँ मैं सजाती हूँ

धूं-धूं कर अरमान जलाती हूँ ।

ऊँची-ऊँची लपटें उठती,

सब जगमग-जगमग कर जाती हैं ।

तम (अँधेरा) मारा-मारा फिरता है

कोई ठौर ठिकाना तकता है

मेरा भग्न ह्रदय,

यह दग्ध ह्रदय

जगती (धरती) का उत्सव बनता है ।

होलिका कहे कोई,

कोई दीवाली कहता है ।।

तुम छलो मुझे,

तुम वार करो ।

अरमानों का व्यापार करो ।।

मेरे छालों को मत देखो

मैं जल-जल कर रोशन होती हूँ ।

जिस राह चलूँ,

उस डग-मग में सबको उजियारा देती हूँ ।।

मैं तम से लड़ती रहती हूँ

मैं तम से लड़ती रहती हूँ ।।

image credit: https://www.jagran.com/news/national-representatives-and-police-officers-give-assurance-for-family-than-funeral-crpf-man-15635407.html

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