कितनी अहिल्या? कितने पत्थर? कितने राम?

कॉलेज के दिनों से ही रीमा और सुमित बहुत अच्छे दोस्त थे । दोनों को एक दूसरे का साथ बहुत अच्छा लगता था और दोनों अलमस्त रहते थे । जब तक कॉलेज था दोनों बेफ़िक्री की नाव पर सवार बेतकल्लुफ़ बहे जा रहे थे लेकिन सालों का वक़्त कैसे लम्हों के नन्हे, नाजुक पंख लगाये उड़ान भरता फुर्र हो जाता है! पता चलता है कहीं? अब कॉलेज ख़तम होने को था और दोनों के दिल में एक अजीब सी बेचैन हलचल जन्म ले रही थी । कहने वाले ने यूँही नहीं फ़रमाया, “एक जवां लड़की और एक जवां लड़का एक दूसरे को इतना पसंद करें तो इश्क़ की क़यामत तय है” । अमूमन कोई भी लड़की या लड़का इस बात पर हामी की मुहर नहीं लगाएगा लेकिन जिसने इस दौर को तय किया वो मुकर भी नहीं सकेगा । अभी यह दोनों आने वाली कल की आशंकाओं को सोचकर परेशां हैं । न जाने हम दोनों में से कौन कहाँ जॉब पायेगा ? इस उधेड़बुन के बीच पढ़ाई भी चल रही है क्यूंकि कैम्पस से जॉब लेकर ही निकलना है । आखिर दोनों की जॉब लग गयी लेकिन दो अलग महानगरों में । अब नयी उधेड़बुन शुरू हुई, क्या सचमुच सफ़र ख़तम होने को है ? क्या सचमुच अब ऐसी मस्ती, ऐसे बेफ़िक्र लम्हें और यह बेतकल्लुफ़ सा साथ कभी नहीं होगा? यह नहीं होगा तो क्या होगा? कौन होगा?

कॉलेज फेयरवेल से दो दिन पहले रीमा ने सुमित से टहलते हुए बातों ही बातों में कहा, अब यह समय ख़तम होने को है, अब हम कैसे मिलेंगे? कब मिलेंगे? मिलेंगे न? सुमित के पास कोई जवाब नहीं था । उसने एक गहरी सांस भरकर नज़र घुमाई तो कुछ और दोस्त अपनी ओर आते दिखाई दिए और बात आई-गयी हो गयी । रीमा अपने आप को तैयार कर रही थी इस बिछोह के लिए । पगली खुद से वादा कर रही थी कि मैं सुमित से दूर रहकर साल भर देखूँगी और नहीं रह सकी तो उसे बता दूँगी कि मैं उसके लिए क्या फ़ील करती हूँ । आगे सुमित की मर्ज़ी कि वो क्या चाहता है । इधर सुमित उस सवाल के बाद से गुम सा हो गया है । चिंता के यह बादल तो उसके मन में भी थे लेकिन आज रीमा के ऐसे पूछ लेने पर सब कुछ मुखर हो गया है । सुमित बिने रुके हॉस्टल में टहलता जा रहा है और “कब मिलेंगे” “कैसे मिलेंगे” उसके अन्दर यही दो सवाल मथ रहे हैं । आशीष ने पीछे से सुमित के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “भाई, आज सारा नाप डालेगा क्या? रात के दो बज गए हैं । मामला क्या है?” आशीष- सुमित का सबसे अच्छा दोस्त । सुमित ने जब अपना सिर पूरी तरह भंजन कर डाला तो आशीष के सामने अपनी मुश्किल रखी । आशीष पहले तो खूब हँसा फिर बोला,” हम्म्म, बालक तुम्हारी समस्या बहुत विकट है लेकिन समाधान बहुत ही सहज-सुलभ है” । फिर अर्थपूर्ण नज़रों से सुमित को उसने कुछ इशारा किया और दोनों हँस पड़े ।

अगले दिन सुमित ने रीमा को प्रोपोज़ कर दिया और रीमा ने झटपट हाँ कर दी । सारी मुश्किलों के धागे अनायास ही सुलझ गए और दोनों मोहब्बत के जाल में उलझ गए । अपने दिलों में एक दूसरे के लिए बेपनाह प्यार लिए दोनों अपनी अपनी नौकरी बजाने अलग-अलग दिशाओं में निकल गए । एक दूसरे से मेल और फ़ोन पर बातें होती । ऑफिस में रीमा के कई नए दोस्त बने उनमें से एक नमन था । नमन बड़ा ही नटखट सा, खुशमिजाज़, हँसोड़ एनर्जी बार था । अक्सर ही रीमा सुमित को उसकी कोई न कोई बात बताती रहती । फिर एक दिन ऑफिस की एक पार्टी में नमन रीमा के बगल में खड़ा था, कुछ और लोग भी साथ थे, और किसी ने वो फ़ोटो खींचकर अपने FB पर पोस्ट की । पोस्ट में सबको टैग किया -एक फंडू से कैप्शन के साथ । सुमित ने वो फोटो देखी और आपे से बाहर हो गया । न जाने कौन-कौन से डर उसके मन में घुमड़े कि बदहवासी में फ़ौरन फ्लाइट लेकर रीमा के पास पहुँचा ।

रीमा की ख़ुशी कोई ठिकाना नहीं ढूँढ पा रही थी यह जानकर कि सुमित उससे मिलने आया है । सुमित की मनोदशा का उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था । होता भी कैसे ? दोनों सालों से एक-दूसरे के साथ मस्ती वाला टाइम बिताते थे और कॉलेज या हॉस्टल की हर बात एक दूसरे को बताते थे । कभी कोई बखेड़ा नहीं हुआ तो उसे लगा कि यह उनके बीच के रिश्ते की परिपक्वता है । लेकिन आज यह रिश्तों का यह सच भरम साबित होने वाला है । सुमित जल रहा है असुरक्षा में, ईर्ष्या में । जिस साथ को वो तरसता है वो किसी और पर यूँही बरसता है । सुमित रोना भी चाहता है और बरसना भी । अब आँसू और आवाज़ में जो जीत गया वही पहले फूटेगा । लड़कों को आँसू छुपाने में महारथ हासिल होती है लेकिन आवाज़ के मामले में उनका हाथ थोड़ा तंग रहता है । तो सुमित रीमा से मिला और उस पर बहुत गुस्सा हुआ और कहते-कहते यहाँ तक कह बैठा कि अब रीमा पहले वाली रीमा नहीं रही । नयी रीमा को नमन चाहिए । उसने सुमित के बदले नमन को चुन लिया है । सुमित को यूँही घुमा रही है क्यूँकि उसे दोनों हाथ में लड्डू चाहिए ।

सुमित का एक-एक शब्द गरम पिघले शीशे की तरह रीमा के कान में गिर रहा था । सुमित के अविश्वास की चोट ने रीमा को जैसे भावशून्य, संज्ञाशून्य कर दिया । उसके चरित्र पर जो दाग सुमित की बातों से लग रहे थे, उसको लगा वो उसके खून से भी साफ़ नहीं होंगे । वो अन्दर ही अन्दर दम तोड़ रही थी और बाहर से एकदम शांत थी –सन्नाटे में, एकदम पत्थर के जैसी । उस समय ऐसा लगा एक बार फिर से अहिल्या अपने चरित्र पर हुए वार और विश्वासघात से पत्थर हो गयी । अब न जाने कितने जीवन काल लगेंगे अहिल्या को वापस अहिल्या बनने में ? क्या सुमित का पछतावा और माफ़ी की गुहार वो दैवीय स्पर्श बन सकेगा जिससे रीमा एक बार फिर से जी उठे ? क्या सुमित राम बन सकेगा ?

इमेज क्रेडिट : https://www.youngisthan.in/hindi/indra-ahalya-gautam-rishi-27887/

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