ख़ुशनसीब बच्चे

हेमा तब तक़रीबन १४ साल की रही होगी जब उस दिन उसके पापा ने उसको आवाज़ दी, “आओ, तुमको कुछ दिखाऊँ” । पापा के दिल में आज ख़ुशी की लहरें हिलोरें ले रही हैं क्यूँकि आज हेमा का दसवीं का रिजल्ट आया है और हेमा विथ डिस्टिंक्शन पास हुई है । पापा की गोद में एक पुराना सा फ़ोल्डर है जिसमें वो राज़ छिपा है जो आज हेमा पर खुलने वाला है । पापा की आँखें ख़ुशी से नम हैं और आवाज़ भी नम सी है । पापा ने हेमा को कसकर गले लगाया और फिर सिर पर हाथ फेरते हुए वापस फ़ोल्डर को देखने लगे । हेमा ने पूछा, “क्या है इसमे?” पापा ने मुस्कुराकर दस्तावेज़ निकाले- बड़े पुराने से पेपर थे । फिर पापा ने कहना शुरू किया, “यह मेरी दसवीं का रिजल्ट है- सेकंड क्लास पास, यह बारहवीं का- सेकंड क्लास, और यह ग्रेजुएशन का- यह भी सेकंड क्लास ।“ हेमा पापा से कई बार सुन चुकी थी कि किन मुश्किल हालातों में पापा ने पढ़ाई की और अपना गाँव छोड़कर यहाँ शहर में किस तरह अपनी दुनिया बनाई । लेकिन आज पहली बार पापा उसे बता और दिखा रहे थे कि वो दरअसल हमेशा सेकंड क्लास पास हुए । अक्सर ही पापा कहा करते, “पहली बार उन्हें अपना जीवन मुकम्मल तब लगा था जब मेरे पापा ने मुझ पर गर्व किया । दादा जी ने कहा कि यह है उन्नति..मेरा बेटा मुझसे अच्छा जीवन जिए ।“ लगभग सभी बच्चों की तरह हेमा भी इन कहानियों की अनगिनत पुनरावृत्ति से पक चुकी थी । अक्सर माँ-पापा बच्चों को प्रेरणादायक और आशाजनक नज़रिया देने की नियत से बच्चों पर यह सितम ढाते ही रहते हैं । यहाँ भी माहौल कुछ अलग नहीं था । लेकिन जब पापा ने कहा, ” दूसरी बार उन्हें अपना जीवन मुकम्मल आज लगा जब उन्हें मुझ पर गर्व हुआ ।“ पापा ने कहा, “यह है उन्नति..मेरा बेटी मुझसे दो क़दम आगे चले ।“ हेमा को यह बात झुरझुरी कर गयी । आज पहली बार उसे महसूस हुआ कि पापा उसके लिए क्या सोचते हैं और उससे कितनी उम्मीदें रखते हैं । वो अपने स्कूल के दूसरे बच्चों सी नहीं है, वो ख़ास है । पापा के हाथों में कांपते उन रिजल्ट्स को देखकर उसको अपने रिजल्ट की वैल्यू समझ आई । बहुत कुछ बदल गया उस दिन उन दोनों के बीच ।

सालों बाद आज हेमा ख़ुद एक माँ है –एक बेटी की माँ । आज के समय में भारत में इससे भयावह शायद ही कुछ और होगा । हर रोज़ के दहला देने वाले किस्से एक माँ को पलायन के लिए बार-बार उकसाते हैं । ले जाऊँ अपनी बेटी को यहाँ से बहुत दूर, जहाँ वो महफूज़ हो । जहाँ वो खुले दिलोदिमाग से जीवन जी सके । और आख़िरकार योजना बनना शुरू हुई भारत से बहुत दूर चले जाने की । कैसे-कैसे डर और आशंकाओं से मन ग्रसित होता है ? कैसे रहेंगे हम वहाँ ? नए लोग, नयी भाषा और नया कल्चर..हम इन सबसे कैसे तालमेल बिठा पायेंगे? क्या बिठा पायेंगे? शायद हाँ…शायद हाँ । आस की एक कमज़ोर सी डोर पर इतनी अशुभ संभावनाओं के कपड़े चिंता की घनी धूप में सूख रहे हैं और सूख रही है हेमा की जान । एक दिन अपनी बेटी को नयी जगह के बारे में बताते-बताते अपने आप अनायास ही हेमा ने अपने पापा की कहानी अपनी बेटी को सुनाई । और सुनाते-सुनाते वो खुद भी अपने आप में एक प्रेरणा और एक नयी उम्मींद महसूस करने लगी । आज अपने पापा का संघर्ष अचानक बहुत साफ़ ढंग से समझ पा रही है हेमा । ऐसे ही कितने अनजान से डरों को पीछे धकेलकर पापा अपने गाँव से ग्रेजुएशन की डिग्री लिए दूर शहर आ गए । शहर जहाँ की जुबान अलग, कल्चर अलग और लोग भी बिलकुल अलग । कोई जानने वाला नहीं । दिन भर नौकरी की तलाश और छोटा मोटा काम करके शाम को आधा दर्जन केले लेकर मंदिर में आ जाना और फिर रात वहीँ गुज़ारना । कितनी बार डर और नकामियाबी ने कहा होगा, “आ, अब लौट चलें” पर पापा डटे रहे और आख़िरकार छः महीने बाद एक अच्छी नौकरी मिल ही गयी । पापा ने हेमा को इस लायक तो बनाया ही है कि नयी जगह उसे कम से कम खाने-पीने के वांदे नहीं होंगे । आज पापा का कद दुनिया में सबसे बड़ा हो गया हेमा के लिए । अचानक ढेर सारी प्रेरणा, आत्मविश्वास और ताक़त आ गयी हेमा में ।

ख़ुशनसीब होते हैं वो बच्चे जिन्हें अपने घर में प्रेरणा का लौहस्तंभ मिल जाता है । ख़ुशनसीब होते हैं वो बच्चे जिन्हें उनके माता-पिता अपने संघर्ष, अपनी सफलता और अपनी असफलता के किस्से अथक रूप से सुनाते हैं क्यूँकि न जाने कब बच्चों को इस अनमोल ख़जाने की ज़रुरत पड़ जाए । यह न सोचिये कि बच्चे आपकी कहानी से पक रहे हैं या आपके सामने असहज मुखमुद्रायें बना रहे हैं । बस नयी कहानियाँ गढ़ते चलिए और सुनाते चलिए..

image credit : http://www.goodwilljobs.ca/job-search-tips/the-power-of-storytelling/

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