द्रौपदी : अग्नि-स्वरुपा

द्रौपदी अग्नि से प्रकट हुई नारी । साक्षात् अग्नि-स्वरुपा । अग्नि चाहे उदराग्नि हो, जठराग्नि हो, बड़वानल हो, प्रेमाग्नि हो या क्रोधाग्नि हो, उसमें सब कुछ लील जाने का स्वाभाविक गुण है – बिना किसी भेदभाव, बिना किसी विवेक के । कभी एक माँ के तौर पर माता द्रौपदी के बारे में विचार करती हूँ तो असहज हो जाती हूँ । यूँ तो उनके साथ जो कुछ उस कालखण्ड में हुआ वो भी मेरी कल्पनाशक्ति के बाहर का विषय है । ऐसी राजकन्या, नवविवाहिता जिसे भिक्षा के समान पांच भाईयों में बाँट दिया गया । ऐसी पत्नी जिसे उसके अति सम्मानीय पति ने संपत्ति के समान दाँव पर लगा दिया । ऐसी राजसी महिला जिसके साथ विवेकशील पुरुषों से भरी सभा में दासी से निम्नतर व्यवहार हुआ । वो अग्नि स्वयं अपने ही ताप में दग्धा, कोटि धूमकेतु स्वयं में समेटे… कैसा  विकराल, विकट और विषम अस्तित्व हो गयी होगी !

हर नारी विशिष्ट है, अनन्या है किन्तु सारी माताएँ प्रायशः एक सी प्रकृति और प्रव्रत्ति की होती हैं । इसलिए एक माँ जब द्रौपदी में एक माँ को देखती है तो सोच बैठती है…. माँ का अपने बच्चे में विश्वास उस नवजीवन के लिए संजीवनी तुल्य होता है । सामान्यतः माँ का प्रेम और मनोभाव बच्चे के मनोभाव और प्रकृति निर्धारक होते हैं । माँ प्रथम शिक्षिका होती है अपने बच्चे की और बच्चा माँ से जीवनशैली सीखता है । किन्तु जो स्वयं धधक रही हो, प्रतिशोध में भभक रही हो..उसके बच्चों के आचार-विचार और व्यवहार पर इस ज्वाला का कैसा प्रतिबिम्ब बनता होगा ! जो जन्म से प्रतिशोध, युद्ध, अपमान, क्रोध, अन्याय और हिंसा की परिकल्पना और कथानक से सिंचित किये जा रहे हों..उनका मनोविज्ञान कैसा होता होगा ?

आश्चर्य नहीं कि युद्ध में द्रौपदी के सभी पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुए । संभवतः उनके लिए यह निःशब्द भविष्यवाणी उनके जन्म के साथ ही हो गयी होगी । जिस जीवन का महाध्येय एक महायुद्ध हो… और वह महायुद्ध घटित भी हो जाये तो वह जीवन तो अपने एकमात्र ध्येय को पा गया । यदि उस महायुद्ध के पश्चात् वो जीवित रहा तो कैसा रिक्त महसूस करेगा स्वयं को । और उस अनुष्ठान के अनुकूल उसने अपनी जैसी प्रकृति बना ली थी अब उस चक्रव्यूह से वह बाहर कैसे आएगा ? उसे तो जीवन के किसी अन्य रंग, रूप और चित्र का भान ही नहीं है । वह तो एक महायज्ञ का हविष्य मात्र था, प्रयोजन सिद्ध हो जाने पर जिसका इतिहास ही शेष रह जाता है ।

क्या द्रौपदी अपने पुत्रों की जीवनधारा और भाग्यरेखा बदल सकती थी ? यह चिरस्थायी द्वन्द है । नारी स्वयं के लिए जीवन जिए या अपने नातों के लिए ? एक राह सीता ने चुनी थी , स्वयं को प्राथमिकता न देकर अपने पुत्रों को प्रथम रखकर….किन्तु अंत सीता का ह्रदय विदारक ही था । एक राह द्रौपदी ने चुनी थी, स्वयं को प्राथमिकता देकर….किन्तु अंत में द्रौपदी का दुःख क्या  कम था ? राह नारी चुनती है या दुःख नारी को चुन लेता है ? नियति का यह खेल अभी पूरी तरह समझ नहीं आया ।

इमेज क्रेडिट : http://www.ajabgjab.com/2014/09/mythological-stories-about-draupadi.html

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