तटस्थता का मोल

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लगभग हर दूसरे शिविर में एक वृद्ध काया की वृहद् छाया आकुलता से चलायमान दिख रही है ।

भाल शनैः-शनैः ‘ना’ में हिलते हुए भूमिगत होने को तत्पर है ।

बीच-बीच में श्वासों का आरोह उस झुकते मस्तक को शिविर की शिखा सी छत की ओर साध देता है ।

किन्तु आँखें अब उठने का उपक्रम संभवतः नितांत आवश्यक होने पर ही करती हैं इसीलिए वो वर्षों की अभ्यस्त पलकें मस्तक उठते ही बंद हो जाती और श्वास का अवरोह मस्तक को पुनश्च अधोगत्वा कर देता ।

आँखों ने वह सब देख लिया जो अकल्पनीय था – वह निर्वस्त्र, किंकर्तव्यविमूढ़, अमानवीय और तटस्थ राज्य-सभा !!!

एकांत पाते ही वह राज्य सभा इस मानसपटल पर चित्रित हो जाती है और इनमें से हर कोई पूरी सभा में अकेला स्वयं को देखता है और अपनी तटस्था से लज्जित होता है ।

क्यूँ था मैं तटस्थ ? क्यूँ न मैंने मानवता का पक्ष लिया ? क्रूर अट्टाहास के प्रति बधिर क्यूँ हुआ ? निर्वस्त्र, अपमानित, कातर रुदन-क्रंदन से विमुख क्यूँ हुआ ?

इस प्रकार निशा की नीरवता में व्याकुलता से विह्वल अंतर्मन का विलाप सुनना, इन वृद्धों का नित्यकर्म हो गया है ।

कैसा क्रूर प्रतिफल है यह उस तटस्थता का ! हर रात्रि स्वयं पर अभियोग चलाना और अपने चरित्र की शिथिलता को निर्वस्त्र देखना !

घोर आश्चर्य कि उसपर भी मानसिक-संतुलन असंतुलित नहीं होता और दिन का कोई कर्म बाधित नहीं होता !

मानो इतना मोल कम था जो अब अपने ही प्रियजनों का संहार करना भी कर्तव्य बन गया है

आत्मघात करना इससे कहीं सहज है किन्तु एक ही जीवनकाल में कितने अपराध करूँ ?

अपराधी हूँ मैं तो अब दंड से भागकर क्यूँ अपराध और गहन करूँ मैं ? उचित यही है कि इसे गरिमा से वहन करूँ मैं – पीड़ा कितनी भी हो वार यह नियति का सहन करूँ मैं ।

Image credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/1/1f/Draupadi_Vastrapaharan.jpg

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