कर्ण पक्ष लेना है या पार्थ बन जाना है

जीवन एक महासमर है, कुरुक्षेत्र है
गुण अवगुण दोनों ही पक्षों में पसरे हैं
पौरुष, पराक्रम, यश के दोनों ओर डेरे हैं
फिर हे मन मेरे ! संशय कौन तुझे घेरे है
मंथन तो बस इतना
चयन तो बस इतना
पार्थ बनूँ या दुर्योधन

सुन..
अवगुण तजकर लड़ न सकेगा,
पंगु बन पग आगे धर न सकेगा
समय है अनवरत चलायमान
उसमें तू स्थावर रह न सकेगा
साँसे पूरी गिने बिना
जग को भी तज न सकेगा
रण में निष्पक्ष रह न सकेगा

न…
केवल जीत मायने नहीं रखती
लेकिन
खुद से खुद की संधि मायने रखती है

जब तक युद्ध चले
संशय न कोई मन में उबले
मन तेरी स्थिरता न टले

फिर केशव की मित्रता, सत्संग
और
‘बाल न बांका कर सके जो जग बैरी होय’
अनुभूति भी तो कुछ मायने रखती है

जय पराजय के बाद सभी को रणक्षेत्र छोड़कर जाना है
साथ कोई कुछ ले जा न सका, सब यहीं छोड़कर जाना है

मन सोच ले तुझे कर्ण पक्ष लेना है या पार्थ बन जाना है

 

image credit : https://www.templepurohit.com/the-story-of-karna-death-mahabharata/

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2 Comments Add yours

  1. Honey8 says:

    So nice poem! 👏

    Like

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