निष्प्राण शब्द

“प्राणी अपने प्रभु से पूछे, किस विधि पाऊँ तोहे,

प्रभु कहे, तू मन को पा ले, पा जायेगा मोहे”

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आशा भोंसले की मधुर आवाज़ में काजल फिल्म का यह गाना सुनते-सुनते मैंने आज सोचा बचपन वाला करतब फिर से करूँ । ऑंखें मूँद बैठकर अपने अन्दर की काली अँधेरी सुरंग टहल आऊँ और उसके अंत में मिलने वाले प्रदीप्त, प्रखर प्रकाशपुंज को भेंट आऊँ । कैसा मनोहारी और निर्वचनीय अनुभव होगा जब यह गीत मन की लम्बी सुरंग में गूंजेगा, बिलकुल गूंगे के गुड जैसा । बर्फीली सुरमई संध्या से होते पल में उषाकाल की सी गुनगुनी धूप और ताज़गी महक उठेगी । शुभस्य शीघ्रम । हेमा ऑंखें मूंदकर बैठ गयी, खुद को स्थिर किया और अपने अन्दर झाँका । हेमा के रोंगटे खड़े हो गए । यह कैसा दैन्य ! आज अन्दर कोई सुरंग नहीं मिली । शरीर के ढांचे के अन्दर, गर्दन के नीचे से पैर के नख तक सब कुछ खोखला मिला । कोई अँधियारा नहीं था, सफ़ेद कुहरे सा धुवाँ और निर्जनता, नीरवता, रिक्तता का विस्तार । घबराकर बंद आँखों की पुतलियाँ मस्तक और कपाल के बीच खोये, टूटे न्यूरल सर्किट ढूँढने लगी । कहाँ किस न्यूरोन को किससे जोड़ दूँ कि अँधेरी सुरंग और प्रकाशपुंज उसी जगह लौट आयें जहाँ पहले हुआ करते थे । लेकिन यह क्या !! यहाँ तो कोई सर्किट है ही नहीं बस केवल ढेरों शब्द इधर उधर मंडरा रहे हैं, एक दूसरे से टकरा रहे हैं, उलझ रहे हैं और अब तो पुतलियाँ भी उनसे रगड़ रही हैं । यह सब क्या हो गया ! कहाँ गया सब कुछ ? किसने हैक कर लिया मेरा सॉफ्टवेयर ? क्या वायरस है यह ? गीत बढ़ता जा रहा है ,

“तोरा मन दर्पण कहलाये,

भले बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाये,

तोरा मन दर्पण कहलाये”

मेरा मन कहाँ है ? मैंने तो उसे हमेशा यहाँ वटवृक्ष की तरह अचल, स्थावर देखा था। मैं तो यह सोचकर आई थी कि उसकी तनिक सफाई कर दूँगी और फिर खुद को उसमे निहारूंगी । मेरा वो जुगनू सा मन जिसके चमकने से पथ चमकता और जिसके बुझने से अँधियारा हो जाता था, कहाँ है? यह किसका फैलाया उजाला है जिसने मुझे मेरे ही जुगनू से दूर कर दिया ?

“मन ही देवता, मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय,

मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय,

इस उजले दर्पण पर प्राणी धूल न जमने पाए”

मेरा वो कोटि नयनों वाला, हवा पर सवार रहने वाला, सर्प की सी चौकन्नी और विषधारी इच्छाएं रखने वाला, अति बलशाली, कभी दयालु तो कभी निष्ठुर, कभी आसक्त तो कभी निर्मोही, कभी नीम तो कभी शहद, कभी फूल तो कभी कांटा, कभी धूप तो कभी चांदनी, हज़ार रूपों वाला मेरा चंचल मन कहाँ चला गया ? वही तो मेरा भगवान् था, मेरा पथप्रदर्शक था और वही तो मेरा सबसे बड़ा प्रेमी भी था । मुझे छोड़कर मेरा भगवान् कहाँ चला गया ?

“सुख की कलियाँ, दुःख के काँटे

मन से कोई बात छुपे न, मन के नयन हज़ार

जग से चाहे भाग ले कोई, मन से भाग न पाए”

मन से भाग न पाए कोई लेकिन जो मन ही भाग जाये किसी से तो ? आह! यह बिछोह, यह रिक्तता कितनी प्राणघातक है । ऐसा लगता है साँसों से वेदना रिस रही है । मेरे भगवान् तुझ बिन ऐसे कैसे रहूँ मैं ? जब तक अनजान थी रह गयी, अब जान कर रहा नहीं जाता । लौट आ मेरे मन । दर्पणों के कौन नगर में जा बैठा तू ? मुझे अनाथ कर कैसे जा सका तू ? और मैं मूढमति ! कैसे अनजान रही इस परिवर्तन से ! कहाँ खो गयी थी मैं कि खुद की कोई सुध न रही मुझे ? लौट आ मेरे मन, देख बिन तेरे न तो नयन बरस पा रहे हैं और न मैं कुछ महसूस ही कर पा रही हूँ । केवल खोखले, रिक्त, भावशून्य शब्द जो मंडरा रहे हैं, उन्हें काग़ज पर उतार रही हूँ । विश्वास करो मेरे मन, मेरे भगवन, यह सब केवल शब्द हैं, केवल निष्प्राण शब्द । मुझे उबारो मेरे मन, इन शब्दों को मिटाओ मेरे मन, इस भावशून्यता को हटाओ मेरे मन । तुम्हें अधिकार कब मिला मेरे शरीर को छोड़, मेरे अस्तित्व से खुद को दूर करने का ? अब इतनी बड़ी दुनिया में मैं तुम्हें कहाँ ढूँढूं मेरे मन ? लौट आओ कि तुम्हारे सारे ठिकाने ढूँढते-ढूँढते अब मेरी कमर दुखने लगी है ।

“तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल

तन के कारण मन के धन को मत माटी में रौंद

मन की कदर भुलाने वाला, हीरा जन्म गवाएं”

मन तेरी कदर तो मैंने कभी न भुलाई, हमेशा यही सोचा कि जो कर रही हूँ अपने मन की ही कर रही हूँ । क्या यह भ्रम था मेरा ? यह मेरा कैसा भ्रम था ! यह भ्रम जाल बुना किसने ? मेरे भगवन तूने मेरे जीवन में कब किसको यह अधिकार हस्तांतरित कर दिया ? और ऐसा करने का अधिकार तुझे किसने दिया ? जो हुआ सो हुआ, अब लौट आ मेरे मन । मैं तुझसे कोई शिकायत नहीं करूंगी न ही तुझे इस अपराध की सजा दूँगी । तेरा स्थान रिक्त अच्छा नहीं लगता मेरे मन, मेरे भगवन, लौट आ । बिन तेरे जीवन चल रहा था या कोई सपना चल रहा था या यह कोई भीषण, अकल्पनीय षड्यंत्र है ? गीत ख़तम हो चुका और मैं गहरे चिंतन में बैठी हूँ कि किस तरह अपने प्रभु को वापस स्थापित करूँ ।

image credit : ashabhonsale..indianSinger

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