संस्मरण : 15 वर्ष में सुलझी, थी वो ऐसी गुत्थी

मेरे पड़ोस में एक छोटी सी दुकान थी जिसमे बच्चों के लिए टॉफ़ी, बिस्कुट और पापा लोगों के लिए बीडी, माचिस और मम्मी लोगों के लिए नमक, चीनी, तेल होता था । दुकान बहुत छोटी सी थी तो सामान भी थोड़ा थोड़ा ही था ।

दुकान पड़ोस में रहने वाले चाचा जी की थी, जिनका पूरे मोहल्ले से दुकानदार नहीं दोस्त का नाता था । जैसे हम लोग उनके घर जाते थे और उनका परिवार हमारे घर आता था । चाचा चाची और उनके बच्चे सभी बहुत अच्छे थे, एकदम अपने से ।

एक दिन दुपहर में स्कूल से लौटते हुए मेरे मन में आया कि एक टॉफ़ी ले लूँ, उस दिन मेरे पास १० पैसे थे । मैंने चाचा को आवाज़ लगायी और टॉफ़ी की तरफ इशारा कर कहा कि ‘यह वाली एक टॉफ़ी चाहिए’ ।

चाचा ने बड़े प्यार से कहा, ‘यह तो बहुत बार खायी है, आज नयी टॉफ़ी लो’ ।

मैंने पूछा, ‘कौन सी?’

चाचा ने कहा, ‘आज ही आई है, अभी पैकेट नहीं खुला, अन्दर आके देख लो’ ।

मैं उत्सुकता में छोटी सी दुकान में घुस गयी और मेरी आँखें पैकेट ढूँढने लगी । तभी न जाने चाचा को अचानक क्या हुआ.. उनका पूरा शरीर कांपने लगा और मुझे पता चल गया क्यूंकि उनके कांपते हुए दोनों हाथों ने पीछे से मेरे कंधे पर सहारा लिया हुआ था ।

मुझे अचानक घबराहट हुई कि यह क्या हुआ चाचा को !

मैंने उनकी तरफ़ तेजी से पलटकर देखा तो उनके चेहरे पर कुछ अलग सा ही भाव था जो तबियत में हुई किसी गड़बड़ जैसा नहीं लग रहा था । मुझे बहुत ही अजीब लगा और वो जिस तरह मुझे देख रहे थे उससे एक अनजाना सा डर भी लगा ।

उनके हाथ तो कांप ही रहे थे, तो मैं तेजी से उनका हाथ झटक कर दुकान से भाग आई ।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि चाचा को अचानक क्या हुआ? यह कौन सी बीमारी होती है? और उनके कांपते हाथ सोचकर अजीब सा डर भी लगता रहा । लेकिन मैंने किसी से कुछ कहा नहीं और दिमाग में यह बस एक अबूझ पहेली की तरह बैठ गया, बस एक पहेली ।

समय और जीवन अपनी चाल से चलता रहा और एक दिन मैं ऐसे पड़ाव पर आ पहुंची जब एक दिन यूँ ही वो गुत्थी मेरी समझ में आ गयी । लगभग ६ साल बाद मैंने उस पहेली को बूझ लिया ।

अब उन कांपते हाथों को याद कर मुझे घृणा महसूस होने लगी । उनका चेहरा और वो भाव याद करके घनघोर वितृष्णा महसूस होने लगी ।

अब वो चेहरा चाचा नहीं रहा, मैं नासमझ और अबोध नहीं रही ।

और विडम्बना यह कि, जिस शोषण की कोशिश ६ साल पहले हुई थी और नाकाम रही वो आज कामियाब हो गयी ।

इस पड़ाव पर मेरा शोषण शुरू हुआ और शोषण कर रहा था मेरा अपना दिमाग, मेरी अपनी बढती समझ ।

आश्चर्य!! घोर आश्चर्य!! जिस दिमाग और समझ को मेरी मदद करनी चाहिए थी, वो मेरे ख़िलाफ़ काम कर रहे थे ।

जब अबूझ थी तो किसी को नहीं सुनाई पहेली और जब बूझ चुकी तो घृणित बात न कही जाये यह सोचकर चुप रही ।

मैं संकुचित हो गयी, अपने आप में सिकुड़ गयी ।

अब समझ के अगले पड़ाव तक पहुँचने का सफ़र मेरे शोषण का सफर है, मेरे ही द्वारा मेरा शोषण ।

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इस सफ़र में आस पास बहुत कुछ होता रहा, कई ख़ुशी के पल आये, कई उपलब्धियां आई और इनके अधबीच दिमागी शोषण चलता रहा । और मैं समझ के एक नए पड़ाव पर आ पहुंची, पहेली से पहली मुलाक़ात के लगभग तेरह साल बाद यानि असल शोषण के सात साल बाद ।

इस पड़ाव पर मेरे दिमाग में पूछा, ‘क्यूँ है यह शोषण? कौन है इसका जिम्मेदार? भरोसा करना गुनाह है या भरोसा तोड़ना? सज़ा भरोसा करने की मिलनी चाहिए या भरोसा तोड़ने की? यदि सज़ा मिलती है तो? न्याय क्या है? यदि न्याय है तो?’

इन सवालों के साथ साथ इस पड़ाव पर मेरे अन्दर का संकोच ख़तम हुआ और एक बार फिर से एक नयी तरह से मैंने उस पहेली को देखा ।

चाचा अब गुनेहगार बन गया, मैं फरियादी, वकील और जज बन गयी ।

समझ के अगले पड़ाव तक यह समीकरण ऐसा ही रहेगा, हर बार कोर्ट सजेगा और हर बार मैं उसमे जिरह करूंगी, हर बार गुनेहगार को सजा-ऐ- मौत मिलेगी और हर बार मन में कुछ कचोटेगा ।

 

अगला पड़ाव बहुत दूर नहीं था, साल भर में मैं अगले पड़ाव पर थी, यानि पहेली से पहली मुलाक़ात के लगभग चौदह साल बाद और असल शोषण के सात साल बाद और प्रतिशोध के एक साल बाद । इस पड़ाव पर एक बात बहुत बुरी लगने लगी- अपना फरियादी होना, अपने आप के लिए दया भाव होना, अपने आप के लिए अफ़सोस महसूस करना ।

‘हाय! मेरे साथ ऐसा हो गया!’ यह गुहार और सोच बोरियत और गुस्सा दिलाने लगी ।

अब नए सवाल उठ खड़े हुए, ‘कब तक? कब तक लड़ोगी? कब तक रोती रहोगी? तुम तो बच निकली थी फिर इतनी हाय तौबा क्यूँ?  जिस दुकान से चौदह साल पहले निकल आई थी, दिल और दिमाग को वहां से क्यूँ नहीं निकालती? जो बीत गया सो बीत गया, और जो नहीं भी बीता उस संभावना को कब तक जीती रहोगी?’

अपने चारों तरफ देखा तो सब सामान्य ही चल रहा है तो दिमाग में आया, ‘समाज जैसा था वैसा ही रहेगा या शायद और बदतर हो जायेगा… जीना तो इसी में है..या तो जीना छोड़ दो या जीना सीख लो..कब तक अनाड़ी का खेल खेलोगी? या तो विश्वास करना छोड़ दो या हर विश्वास के साथ विश्वासघात होगा इस आशंका को अपना लो….’

मन कह रहा था, “ दिमाग, तूने तो मुझे दो विरोधी ध्रुव बता दिए, एक जहां ‘जिंदगी प्यार का नगमा है’ और दूसरा जहां ‘जिंदगी हर कदम एक नयी जंग है’ बीच का कोई तो रास्ता होगा? ध्रुवों पर तो पोलर बीअर और पेंगुइने ही रह सकते हैं, इंसान को तो इक्वेटर लाइन के आस पास ही सम्भावनायें ढूँढनी होंगी ।“

सफ़र चलता जा रहा है अपने सवाल और उन सवालों के जवाब ढूँढते हुए ।

चाचा अब सिर्फ़ गुनेहगार नहीं अपरिचित दुकानदार भी बन गया, मैं कचहरी छोड़ नए ठिकाने ढूँढने लगी ।

एक दिन यूँ ही गुनगुना रही थी, ‘यह जिंदगी है एक जुआ’ और इस गीत ने मुझे अगले पड़ाव पर पहुंचा दिया, मुझे मेरी ‘इक्वेटर लाइन’ मिल गयी । पहेली से पहली मुलाक़ात के लगभग पंद्रह साल बाद और असल शोषण के आठ साल बाद और प्रतिशोध के दो साल बाद और खोज के लगभग एक साल के बाद । इस पड़ाव पर मेरे दिल और दिमाग ने मेरे अतीत से सुलह कर ली ।

मुझे समझ आया कि कुछ ही लोगों पर विश्वास करना चाहिए और यदि वो उसे तोड़ दें तो यह ज़रूर नियति का कोई प्रयोग है जिसका उपकरण मैं हूँ और साधन मेरा दिमाग…फिर एक नयी यात्रा की शुरुवात होगी वो ।

मुझे समझ आया कि बुरे अनुभवों को बार बार दोहरा कर हम अपने साथ सबसे बड़ा अन्याय और अत्याचार करते हैं ।

मुझे समझ आया कि हर इंसान में गलतियों, कमजोरियों की संभावना उसकी अच्छाईयों से कुछ कम है, वो दुकानदार ३ साल मेरे साथ अच्छा रहा और कुछ पलों के लिए बुरा ।

मुझे समझ आया कि, ‘अरे! मैं तो गज्ज़ब हूँ’ । पहली बार उस घटना को याद करके मेरे चेहरे पर मुस्कान खिंची….मैं जीत गयी ।

गुत्थी सुलझ गयी । मैं अतीत के हाथों से निकल नए आसमान की तरफ बढ़ चली ।

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