बस्ती का विद्रोही पक्षी..अंक १

क्यूँ हूँ मैं सबसे अलग ? क्या मैं ऊपरवाले का बनाया हुआ कोई डिफेक्टिव पीस हूँ ? क्यूँ नहीं हूँ मैं अपने पापा जैसा..अपने भाई जैसा या फिर अपने दोस्त जैसा ? चारों ओर जिधर देखूँ कैदी तोते दिखाई देते हैं । प्यार, परिवार और समाज के पिंजरे में कैद तोते । क्या इनका मन नहीं होता खुले आसमान को नापने का ! या आदी हो गए हैं यह सब सलाखों से छनकर आती रोशनी में आसमान देखने के । क्यूँ है यह बस्ती इतनी संकुचित कि इसमें न पेड़ पर घोंसला बनाने वाले पक्षी की कोई जगह है और न ख़ानाबदोश पक्षी की और न ही किसी मुंडेर पर दो तिनके रख कुछ दिनों को ठहरने वाले पक्षी की ? इस बस्ती में पैदा होना मुझ जैसे आज़ाद परवाज़ की इच्छा रखने वाले के लिए अभिशाप है । पर जन्मस्थली चुनने का अधिकार कब किसी को मिला है !

बचपन में जब यह सलाखें मज़बूत नहीं मालूम होती थी तो माँ-पापा ने उड़ने नहीं दिया, यह कहकर कि अभी तुम न आसमान की समझ रखते हो और न हवा की । आज जब मैं जवान हो चुका हूँ तो इनकी बढती उम्र, कमज़ोर शरीर और निरीह प्रेम-स्नेह सलाखें तोड़ने नहीं देता । मुझे याद है टीनएज से ही मुझे समर को देख कर हैरत होती थी कि वो खुश कैसे रह पाता है ! माँ पापा की इकलौती संतान होना उसे घुटन का एहसास कैसे नहीं कराता ? उसे देखकर खुद को ख़ुशनसीब मानता था कि मेरे माँ-पापा का ध्यान बँटाने को मेरे दूसरे भाई बहन हैं । यह प्यार आज़ादी का दुश्मन क्यूँ होता है ? क्यूँ प्यार पूरी तरह अधिकार कर लेने का दूसरा नाम है ?

नहीं करना चाहता था ….बहुत समय तक टाला भी लेकिन आखिरकार सुमन से शादी करनी ही पड़ी । कोई वजह भी तो नहीं दे सका मैं … जबरन सुमन में ऐब निकालना भी तो गलत होता । दोनों के परिवारवाले चाहते थे यह शादी हो और इस बस्ती का नियम भी यही कहता है एक उम्र के बाद शादी सांस लेने से भी ज्यादा ज़रूरी है । थक चुका था बहाने बनाकर । अनचाहे पिंजरे में एक और सलाख जुड़ गयी । शादी के साथ सेक्स जीवन में आया तो मन आज़ादी से कुछ देर को हटा पर अब यह प्रेगनेंसी ….. सोचकर घबराहट बढती ही जा रही है कि कहाँ धँसता जा रहा हूँ मैं ? मन दुःख से भारी होता जा रहा है कि अब कभी आज़ाद न हो सकूँगा मैं । यह प्रेगनेंसी मेरी आज़ादी के ताबूत पर जड़ी आख़िरी कील है जिसके बाद सब ख़तम । किसी को कह भी नहीं सकता कि कैसी घुटन हो रही है मुझे । अब तो सेक्स का खिलौना भी छिन गया, कैसे समझौता करूँ इस क्रूर बंदिश से ? कहाँ बहलाऊँ इस दिल को ?

ऑफिस से लौटते हुए मयंक यही सोचता चला रहा है गहरी बैचेन साँसें लेता हुआ, न रस्ते की कोई खबर है न आस पास किसी चीज पर उसकी निग़ाह टिकती है । ‘एक्स्कूज़ मी, आय ऍम सॉरी टू डिस्टर्ब…कैन यू प्लीज हेल्प मी व्हिच वे टू टेक टू हीरानंदानी ?’ किसी की अनजान आवाज़ ने मयंक की तन्द्रा तोड़ी और उसने अचकचा कर देखा सामने एक भोली सी, छोटी सी लड़की गले में किसी कंपनी का आई डी कार्ड डाले कंफ्यूज सी उसे देख रही है । ‘चलो, मैं भी उधर ही जा रहा हूँ , साथ चलते हैं’ मयंक को खुद पे हैरानी हुई कि उसने ऐसा क्यूँ कहा !

Image Credit  : कैदी

क्रमशः…

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