जय उज्जैन! जय महाकाल! जय दाल बाटी! -१

 

जब कोई किशोर या किशोरी घर से हॉस्टल जाने के लिए अपने कदम बढ़ाता है तभी अनजाने में ही उसकी घुमक्कड़ी के महाव्रत की दीक्षा शुरू हो जाती है । यह बिलकुल वैसा ही है जैसे चिड़िया का बच्चा घोंसले से बाहर निकल खुले आसमान की तरफ़ बढ़ चला हो । कभी न ख़तम होने वाली परवाज़ शुरू हो जाती है उसकी । मम्मी पापा के कड़े अनुशासन और प्रतिबंधों से छूटते ही वो शायराना हो जाता है और उसका फ़ेवरेट शेर होता है-

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहाँ?

जिंदगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ?

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हॉस्टल में जगह-जगह के लोग होते हैं और वो लोग अपने साथ अपनी जगहों के स्वाद, बोलचाल और किस्से लाते हैं । अब किस्से सुनकर भला किसने गंध महसूस की है? किसने उत्साह को उमड़ते देखा है? किसने स्वाद को चखा है? किस्से तो बस जिज्ञासा, बेसब्री और तेज़ इच्छा पैदा करते हैं उस जगह पहुँच जाने की । और यहीं से घुमक्कड़ी यज्ञ में आहुतियाँ शुरू हो जाती हैं । पढ़ाई-लिखाई तो चलती ही रहती है, अब कॉलेज बंक करने की शुभ घड़ी आई है । मन में जोश, उत्साह की लहरें और किस्से की हक़ीक़त से रूबरू होने का ज़ज़्बा तुरंत ही सारे घुमक्कड़ों को एक साथ इकठ्ठा कर देता है, हॉस्टल के एक कमरे में ।

‘अच्छा! तो सच में इतनी भीड़ होती है?’

‘फिर……. मजाक समझा है क्या? महाकाल की सवारी होती है ।’

‘चलें…देखने’

‘आओ न यार, मैं तो कब से कह रही हूँ । घर पे अपन सब ऐश करेंगे, उज्जैन घूमेंगे । मस्त नॉनवेज बनेगा ।‘ थोड़ा और जोर देकर नीति ने कहा, ‘देख घर पे रुकने का है तो जेब भी चेक नहीं करनी, फ्रीफंड का जलवा । तब भी तुम लोगों के नखरे ।‘

ओहो! इतने आकर्षक प्रलोभनों के बाद भी जिस-जिस ने यह ऑफर ठुकराया और पर्यटन की अवहेलना की, उसके साथ जो फन मिस करने का अफ़सोस है वो बिल्कुल ठीक है । जैसी करनी वैसी भरनी ।

वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को
जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।

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भई हम तो दलबल के साथ तैयार हो गए और कूच की उज्जैन की ओर । हॉस्टल में रहने वालों के प्रति बड़ा ही सहानुभूति वाला और प्रेमपूर्ण व्यवहार होता है घर वालों का और उनके लिए सारी सीमाएं थोड़ी सी बढ़ा दी जाती हैं, जैसे थोड़ी ज्यादा देर सो लो, थोड़ी ज्यादा बकबक कर लो, थोड़ी ज्यादा बेशर्मी कर लो वगेरह, वगेरह । सहानुभूति फूटती है इस विचार से कि यह बेचारे मेस का बेस्वाद खाना खाने वाले, घर वालों के नितप्रेम से वंचित, छोटे से कमरे में ठस-ठस कर रहने वाले, जाने कैसी-कैसी मुश्किलों में जीने वाले निरीह प्राणी हैं । सबका दिल DDLJ के अमरीश पुरी की तरह कातर हो जाता है और कह उठता है, ‘जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी ।‘ और फैला दे जितना रायता फैला सकती है एकदम बिंदास ।

नीति के घरवालों ने ऐसा स्वागत किया जैसे उनकी एक बेटी नहीं कई बेटियाँ हॉस्टल से आईं हैं । बहुत ही सरल लोग और सादगी उनका भूषण । इतने प्रेम से मिले सब लोग कि कुछ देर को हम सब भी आल्हादित हो गए और घरवालों की याद आने लगी । कैसा व्यंग है मानव भावनाओं का कि किसी बात की कमी पूरी करने के लिए पहले कमी का एहसास भरपूर करना होता है । हम सबने सोख्ता कागज़ की तरह उनसे मिलने वाले पूरे प्रेम को बूँद बूँद सोख लिया । लेकिन खाली प्रेम से न तो हॉस्टलर्स का पूरा पड़ता है और न ही घर वालों का । हमारे लिए लज़ीज़ खाने की व्यवस्था की गयी थी और खाने से पहले पापड़ की ।

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पापड़ हमारे सामने बहुत करीने से रखे गए यह सोचकर कि जब तक खाना आता है इससे टाइमपास करो । लेकिन वो सीधे सरल लोग यह आंकलन नहीं कर पाए कि हॉस्टल वालों की अपनी ही सभ्यता होती है । कहते हैं ना ‘अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता’ तो जब हॉस्टलर्स अपने घर जाते हैं, अकेले, तो घर जाते ही घर के रंग-ढंग में आ जाते हैं और घर वालों को उनकी सभ्यता परिवर्तन का पता ही नहीं चलता । लेकिन, जहाँ एक गुट बना हॉस्टल वालों का, वो अपनी सभ्यता को सर्वोपरि रखते हुए बाकि सभी सभ्यताओं की धज्जियाँ उड़ा देते हैं । हम सब भी ऐसे गदगद हुए पापड़ देखकर कि टूट पड़े और शायद मिनट भर में सारे पापड़ हम लोगों के पेट में आड़े तिरछे सेट हो गए । सामने खाली चमचमाती प्लेटें, जिनमें पापड़ रखे होने का कोई सुबूत ही नहीं था, हम भूखों के हमले की दास्तां सुना रहीं थीं । हमारी भूखी नज़रें अचानक नीति की छोटी बहन से टकरा गयीं और हम सबकी नज़रें शर्म से झुक गयीं । वो बेचारी मुँह खोले, हक्की-बक्की हम लोगों को ऐसे देख रही थी जैसे हम अजूबे हों । उसकी आँखें फैल-फैलकर हम सबको स्कैन कर रही थी । हमारी ऐसी परफॉरमेंस ने उन सभ्य बच्चों के दिल में हमारे लिए और भी ज्यादा दया भाव को जगा दिया होगा और दिल ही दिल में उन्होंने कहा होगा, ‘बेचारे! भूखे!’ अंकल आंटी और भी मुस्तैदी से खाना लगाने में जुट गए कि बड़े दिनों के भूखे ब्राह्मण पधारे हैं । पापड़ों की दूसरी खेप पेश की गयी और इस बार हमने बड़ी एतियात से पापड़ के स्वाद को सराहते हुए धीरे-धीरे छोटा-छोटा सा चुगना शुरू किया । हम सबने ध्यान रखा कि खाना ख़तम होने से पहले पापड़ ख़तम न हो ।

खाने में इतनी स्वादिष्ट और पूरी तरह से घी में डूबी हुई दाल बाटी थी कि आज तक जीभ में स्वाद और चिकनाई महसूस हो जाती है । इतनी स्वादिष्ट दाल बाटी न मैंने जीवन में पहले कभी खायी थी और न उसके बाद । अद्वितीय, अतुलनीय, अनन्य…आहा! शब्द मंजूषा में कोई शब्द नहीं जो पूरी तरह बखान कर सके उस स्वाद का । अगर मेरी मृत्यु शैय्या पर मेरी अंतिम इच्छा पूछी जाये तो मैं यही कहूँगी, ‘वही दालबाटी फिर से एक बार खिला दे।‘

जय नीति के घरवाले! जय दाल बाटी!

क्रमशः…

image credit : google images

 

 

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