मैं हूँ ना, माँ

बीमारी एक ऐसी सुविधा है जो व्यस्त से व्यस्त माँ को कुछ आराम देने आती है । खुद को सबसे पीछे रखने की हम महिलाओं की जो प्राकृतिक प्रवृत्ति है उसे एक धौल जमा कर सबसे पीछे धकेल देती है । ऐसा हमेशा ही संभव है इस नतीजे पर पहुँचने से पहले क्यूँ ना एक वार्तालाप हो जाये । तो सुनिए, पिछले कुछ दिनों से मैं वायरल फ़ीवर की चपेट में हूँ और कल मेरी बेटी के जन्मदिन की सातवीं वर्षगांठ है । इस नयी जगह में शिफ्ट हुए अभी हमें कुछ ही वक़्त हुआ है तो आस पास काम की चीज़ें कहाँ मिलेंगी यह ख़याल भी एक प्रश्नचिन्ह को साथ लेकर ही आता है । फ़ीवर शारीरिक तौर पर तो आपको रोक सकता है कुछ करने से लेकिन, दिमाग़ी घोड़ों की लगाम उसके हाथ में भी नहीं होती । ऐसे मैं तीन-चार दिन लेटे-लेटे आप एक दूसरी प्राकृतिक प्रवृत्ति के चक्कर में पड़ जाते हैं जिसे ठेठ देसी भाषा में ‘कनकनाना’ कहते हैं । करे धरे कुछ है नहीं तो बस लेटे लेटे ‘कन…कन’ और ‘कन…कन’ । घरवालों को उनके अगले पीछे सारे गुनाहों की एकमुश्त सज़ा । भगवान् घर की महिला को कभी बीमार न करे और चाहे जो कर ले । लेकिन भगवान् क्यूँ हमारी गाइडलाइन फॉलो करने लगे तो हम बीमार हो गए वो भी एकदम क्रिटिकल टाइम पर ।

पतिदेव जितना कर सकते थे, कर रहे थे । बेटी भी परेशान थी कि माँ बीमार है तो माँ के साथ खेल नहीं पा रही, सो नहीं पा रही और उसकी पसंद का खानपान नहीं हो पा रहा । स्कूल में जो भी परेशानियाँ और दोस्तों से जो शिकायतें हैं वो तो हैं हीं अपनी जगह । बर्थडे पास आ रहा है तो उसका रोमांच, उत्साह भरपूर है पर यथार्थ में कुछ होते नहीं दिख रहा, यह भी उलझन कर रहा है उसको । तो मेरी बीमारी की मुझसे ज्यादा मेरी बेटी भुक्तभोगी रही । बड़े लोग अपने आप को अभिव्यक्त करने के तरीके ढूंढ लेते हैं और खुद का ध्यान भटकाने, खुद को बहलाने की कला वाला ब्रहमास्त्र तो होता ही है हमारे पास । लेकिन बच्चे मन के बड़े सच्चे होते हैं वो नहीं जानते मैनीपुलेशन करना अपने भावों का या अपनी अभिव्यक्ति का । वो अगर परेशान हैं तो आपको परेशान कर देंगे, वो अपनी चंचलता से बता देते हैं कि कुछ असहज कर रहा है उनको । मेरी बेटी ने भी यही बालसुलभ निर्णय लिया ।

जब मेरी तबियत ठीक रहती है तब भी मेरी बेटी एक बार में कभी मेरी बात शायद ही सुनती हो लेकिन तब मैं गुस्सा करने की बजाय उसके पास जाकर और तरीके इस्तेमाल करती हूँ अपनी बात सुनाने के । इस बीमारी ने मुझे बिस्तर से हटने को मना कर दिया और अब मेरे पास सिवाय आवाज़ ऊँची करने के कोई रास्ता नहीं बेटी से अपनी बात कहने का । पहले मैं कराहती हुई अपनी बात कहती हूँ, फिर थोड़ा सख्त होती हूँ, फिर और ऊँचा, और फिर आख़िरकार चिल्लमचिल्ली । अपने चिल्लाने का अफ़सोस भी होता है तो उस गिल्ट से बडबडाने लगती हूँ, ‘तुम माँ की बात क्यूँ नहीं सुनती? तुम्हें पता है माँ बीमार है फिर भी तंग करती हो’ । बेटी चुपचाप सुनती रहती है और सामने से हटते ही फिर वही बाल सुलभ लीलाएं शुरू । बचपन की वही बेफ़िक्री, वही नैसर्गिक खुशनुमा मिजाज़, वही किसी भी बात को ज्यादा देर मन में न रखने की खूबी । मेरी बेटी कोई गुनाह नहीं कर रही बस अपना बचपन जी रही है लेकिन मेरी बीमारी की वजह से बार-बार डांट और उलाहना सह रही है । मैं खुद से यह बातें करती हूँ और उसको मस्त देखकर मुस्कुरा भी देती हूँ लेकिन फिर दिमाग में चिंताओं के कुचक्र शुरू हो जाते हैं और मुझे कुछ मंगवाने के लिए मेरी बेटी को आवाज़ देनी पड़ती है और……. ।

यह पिछले तीन दिन से चल रहा है । आज मेरी बेटी स्कूल से आई और उसने मुझे एक चिट्ठी दी । ‘माँ, मैंने तुम्हारे लिए बनाया है यह कार्ड और लैटर भी’, कहकर उसने मेरे हाथ में थमा दिया । उसमें फूल बने थे, एक दुखी चेहरे वाला स्माइली और बाद में लिखा था, ‘माँ, आय ऍम अ नॉटी गर्ल प्लीज ट्रेन मी । गेट वेल सून,  टेक केयर लव -चिया’ । वो पढ़कर मेरे हाथों में कंपकपी आ गयी, फ़ीवर बढ़ गया था या अपराधबोध पता नहीं । मुझे अचानक एहसास हुआ कि मेरी बीमारी का सबसे ज्यादा खामियाज़ा मेरी मासूम बेटी भर रही है । अपने बीमार होते ही मैंने उसे इतनी एक्सपेक्टेशन में दबा दिया और उनके पूरी न होने पर चिल्लमचिल्ली! अचानक उससे बड़ों सी उम्मींदें कर बैठी मैं…दूसरे शब्दों में कहूँ तो उससे उसका बचपन माँग रही थी मैं । इतनी स्वार्थी….इतनी बीमार हो गयी मैं? मेरी बेटी स्कूल जाकर भी इस ख़याल से छूट नहीं पायी कि माँ ने उससे कहा ,’ तुम्हें पता है माँ बीमार है फिर भी तंग करती हो’ । बालमन पर यह कैसा बोझ रख दिया मैंने अनजाने में ? एक माँ को इतना अनजान होने का हक है क्या? 38 सालों में कितनी बार वायरल हुआ होगा मुझे, आज तक मुझे बीमार होने का सलीका नहीं आया? आज तक मुझे बीमारी में खुद को संभालना नहीं आया? आज तक मुझे बीमारी से लड़ना नहीं आया? अपनी नाकामियाबियों के लिए अपने घर परिवार पर चिल्लाना कितना ठीक है, वो भी एक छोटी बच्ची पर?

मेरी बेटी को चिट्ठी लिखनी पड़ी ताकि उसकी माँ दिमागी तौर पर बीमारी से बाहर आ सके । थैंक यू बेटा फॉर हेल्पिंग मी । तुम नॉटी ही रहो मेरी नटखट, चंचल और संवेंदंशील बच्ची । माँ खुद को सुधारने की कोशिश कर रही है । अपनी माँ से मायूस मत होना । हमेशा खुश रहो और मुझे यूँही सुधारती रहो ।

image credit: केयर

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