रैगिंग के वो दिन

स्कूल ऑफ़ कंप्यूटर साइंस, DAVV, इंदौर

झोलझाल है भई सब झोलझाल है….झोल-झाल…..क्या चल रहा है किसी को ठीक-ठीक समझ नहीं आ रहा है । दूर से देखने वाला यह तो कह ही सकता है कि कुछ तो झोल है लेकिन क्या……क्या पता, क्या ख़बर!!! इंस्टी, इंस्टिट्यूट का शोर्ट नाम, के बड़े से कैंपस के एक मैदान में कई नौनिहाल मिलकर कुछ वारदात को अंजाम दे रहे हैं । दूर से देखने पर नज़ारा कुछ ऐसा है कि…. दस बारह लोग खड़े हैं उनकी बॉडी लैंग्वेज ही बता रही है कि वो मुखिया टाइप के हैं । उनके सामने बैठे लगभग ४० लोग, उनकी भी बॉडी लैंग्वेज ऐलान कर रही है कि वो फरियादी टाइप के हैं । कतई दया की भीख माँगने वाले स्टाइल में बैठे हैं । जैसे वो फ़िल्मी सीन होता है ना, लुटे-पिटे हालात में फटे-चीथड़े पहने हड्डियों का ढाँचा कह रहा हो, ‘मुखिया जी, तीन बरस से पानी नहीं बरसा…लगान कैसे दें?’ लेकिन असल समां कुछ अलग है वो ऐसा है जैसे मुखिया टाइप लोग कड़क अंदाज़ में कह रहे हों, ‘बेटा, प्यार से समझा रहे हैं..समझ जाओ’ । हवा भी एक पाले से दूसरे पाले में अंगड़ाई लेकर अपनी फ़ितरत बदल रही थी, किसी को जूट तो किसी को रेशम वाली फीलिंग दे रही थी । धूप निष्पक्ष है..इस क़दर कहर ढा रही है कि किसी में आँख उठाकर सूरज से मिन्नत करने की भी हिम्मत नहीं ।

पास पहुंचे तो दिखा अरे यह तो अपने सीनियर्स हैं और दूसरे पाले में अपने बैचमेट्स… ओ तेरी!!!!..यह तो रैगिंग चल रही है! इसके पहले कि मन में भाग उठने का ख्याल भी उठे, धर लिए गए…आ जाओ बेटा…आ जाओ । अब हम भी फ़रियादी टोली में हैं । सब बैठे अपने भाग्य को दूसरे के भाग्य से तौल रहे हैं और सबके भाग्य का फ़ैसला सीनियर्स की जीभ पर बैठी सरस्वती कर रही थी । एक को उठाकर आदेश हुआ ‘इंट्रो(डकशन) दो’ लो जी..तोताराम शुरू हुए, ‘अपना इंट्रो भी रटने की चीज़ हो गयी थी’ अब रटाई में गड़बड़ हो ही जाती थी किसी न किसी से । बस गलती हो गयी, वो भी ‘बड़े सरकार’ बोले तो सुपर सीनियर्स के सामने । यह तो गदर हो गया, अब वाट लगी, उसके साथ बाकी भी लपेटे में ।

बड़े सरकार ने मुंह बनाकर मुखिया लोगों की तरफ़ लानत से देखते हुए शिक़ायती अंदाज़ में कहा, ‘क्या है यह? ठीक से ट्रेन ना हो रहे तुमसे? अभी ढक्कनों का यही ठीक नहीं हुआ…हम इनकी रैगिंग लें?’

मुखिया लोगों ने माफ़ी की गुहार लगाकर उन्हें कुछ समझाया और फिर जैसी नज़रें हमारी तरफ़ उठी उसने धूप की चिलचिलाहट का एहसास कई गुना बढ़ा दिया । यह मुखिया लोग जो बड़े सरकार के सामने ‘हम वो हैं, जो दो और दो पांच बना दें’ ऐसी डींगें हांक कर आये थे, उनका हमारी एक गलती ने फ़ालूदा बना दिया था । और इसके लिए हमे माफ़ी मिलना नामुमकिन था । कई दिनों के अथक प्रयास, अभ्यास के बाद आज पहली बार बड़े सरकार के सामने हमारी पेशगी हुई और…..

खैर, बड़े सरकार का मूड ठीक करने के लिए तुरंत दो लोगों को खड़ा करके गाने का आदेश हुआ । दोनों मशीनी ढंग से शुरू हुए,

जानेमन जानेमन, तेरे दो नयन, चोरी चोरी लेके गए देखो मेरा मन, जानेमन जानेमन जानेमन

मेरे दो नयन, चोर नहीं सजन, तुमसे ही खोया होगा कहीं तुम्हारा मन, जानेमन जानेमन जानेमन

गाना पूरा आखिर तक गाया गया, बड़े ही सुरीले अंदाज़ में । यही कुछ सुकून के पल होते थे फरियादी टोली में, जब वाकई अच्छा गाने वाले लोग कुछ मीठा सा गा देते थे । वरना वो भी कम ज़ालिम पल नहीं होते थे जब किसी बेसुरे को सज़ा के तौर पे गाने को कह दिया जाता था या फिर किसी अनाड़ी को नाचने को कह दिया जाता था । बाय गॉड, कसमसा कर रह जाते थे, मन ही मन । न तो रो सकें न हंस सके, बस बुत बने देखते रहो सुनते रहो । लेकिन चाहे गाना सुनने की ख़ुशी हो या गाना ख़तम होने की, परफॉरमेंस के बाद एप्रिशिएट करना तो बहुत जेन्युइन था । यहीं पर सीनियर्स अपने दांव खेल गए । एप्रिशिएट करने का प्रोटोकॉल बना दिया, एक प्रॉपर मैथोड़ोलोजी थी अपने भाव व्यक्त करने की । इस मैथड़ को समझने के लिए एक गाने का जिक्र बहुत ज़रूरी है तो पहले उसकी बात करते हैं ।

अब तो यह गाना एपिक हो गया है आप सभी वाक़िफ होंगे इन बोलों से,

जिसे ढूँढता हूँ मैं हर कहीं, जो कभी मिली मुझे है नहीं
मुझे जिसके प्यार पर हो यकीन, वो लड़की है कहाँ

जिसे सिर्फ मुझसे ही प्यार हो, जो ये कहने को भी तैयार हो
सुनो तुम ही मेरे दिलदार हो, वो लड़की है कहाँ

इसके बाद के संगीत लहरी पर परिंदे की तरह हाथ लहरा लहराकर और कबूतर की तरह उछल उछलकर सैफ़, सोनाली और उनकी टोली ने जो मस्त समां बाँधा उसके जबर फैन तो हम सभी हैं । यह गाना उन्हीं दिनों दुनिया में आया जब हम जूनियर्स थे और हमारे सीनियर्स को आईडिया दे गया । सीनियर्स ने शायद इस स्टेप को म्यूट करके कई बार देखा होगा और कितने दिमागी घोड़े दौड़ाने पड़े होंगे इस पर नए नायाब बोल सेट करने के लिए । बोल जो कि हंसाने की पूरी क़ाबलियत रखते हों ताकि जैसे ही कोई जूनियर हँसा इनकी जीत और उसकी …. । बहुत ही सुन्दर, सारगर्भित, सुरीले और साहित्यिक बोल चुने गए, ‘झिंगालाला हुर्र हुर्र हुर्र’ । जिन्होंने इसका अनुभव नहीं किया है, आप सब भी कभी कोशिश करके देखिएगा बड़ा ही सही सेट होते हैं यह बोल इस स्टेप पर । जीवंत तो ऐसे कि जैसे कोई स्केयरक्रो चिड़िया उड़ाते हुए एन्जॉय कर रहा हो… कूद कूद कर झिंगालाला हुर्र हुर्र हुर्र कर रहा हो । कितना मधुर सन्देश छुपा है इस कॉम्बिनेशन में, न सिर्फ़ किसानों के लिए बल्कि उनके बच्चों के लिए भी जो कि परिस्थिवश स्केयरक्रो बनाये जाते हों कभी कभी । मौलिकता और क्रिएटिविटी की हाइट पे था यह नुस्खा ।

तो हर परफॉरमेंस के बाद हम सब जूनियर्स को बैठकर कंधे उचकाते हुए हाथ लहरा लहराकर झिंगालाला हुर्र हुर्र हुर्र करना होता था । मजाल है जो कोई हंस दे और सामने सारे मुखिया बत्तीसी दिखा रहे होते थे । बहुत बड़ी चुनौती थी यह जूनियर्स के लिए या यूँ कहिये कि आत्म-संयम की शिक्षा थी । इस प्रदर्शन से बड़े सरकार निहाल हुए और मुखिया जी लोगों की इज्ज़त बहाल हुई ।

जय हो ऐसे निर्मल आनंद वाले तरीके ईज़ाद करने वाले क्रिएटिव दिमाग की ।

इमेज क्रेडिट : वो लड़की है कहाँ..दिल चाहता है

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