चिट्ठी

हिचकियों के बीच कुछ नाम आते जाते हैं या कुछ नामों के बीच हिचकियाँ आती जाती हैं! कहीं यह हिचकियाँ साँसों को डूबने से बचाने के लिए तो नहीं आती? हिचकियाँ आई तो अमूमन मतलब आपके प्यार को किसी ने जवाबी चिट्ठी भेजी है या आपके नाम सवाली ख़त। हमारी संस्कृति में तो अटूट सम्बंध है हिचकियों और यादों का । यादें उन मजबूत रस्सियों की तरह हैं जो हमे अकेलेपन की अँधेरी, गहरी खाई में गिरने से रोके रखती हैं । यादें उन चिरागों की तरह हैं जो दुःख की काली रातों में रोशनी से हमारा नाता जोड़े रखती हैं । यूँ तो यादें किसी साकार, किसी मूर्त की मोहताज नहीं हैं , दिलोदिमाग में बसे ढेरों ख़यालों और ज़ज्बातों में ही यादों का कारवां धूम मचाये रहता है । लेकिन अगर किसी की बहुत याद आ रही हो और उसकी लिखी कोई चिट्ठी आपके पास हो, तो..कैसा हो?  उस चिट्ठी से प्यार की महकती ख़ुशबू, उसमे लिखे अल्फाज़ों की छुवन अगर मिल सके, तो….कैसा हो? हर मौसम को धत्ता बताकर अपना ही मौसम बना लेने वाली बातें मिल जायें, तो..कैसा हो? भद्दे रंगों को मुँह चिढ़ाकर खुशनुमा रंग बिखेर देने वाली मीठी शिक़ायत मिल जाये, तो…कैसा हो? मायूसी से भरे दिल को डपटकर फिर से जूझने को कहने वाली सख्त झिड़की मिल जाये, तो..कैसा हो?

तो? तो क्या ….. जैकपॉट है भैय्या । जैकपॉट ।

यूँ तो तो आजकल इलेक्ट्रोनिक साधनों, उपकरणों और सुविधाओं के चलते हमें यादों के बरसाती मौसम में चाय और भजिये का स्वाद अपने फ़ोन पर बखूबी मिल जाता है । फेसबुक ने इसमे जीतनी अहम् भूमिका निभाई है हम सब उसके ऋणी हैं । अपने किसी पोस्ट के रिस्पांस में ‘लाल दिल’ आ जाये तो हाय ! वो किसी लव लैटर से कम नहीं लगता । उसके कमेंट्स मीठी नोक-झोंक वाले एहसास गुदगुदा जाते हैं । और इनबॉक्स में उसके मैसेज, ओह! उसका तो कहना ही क्या? लेकिन जब शिद्दत से किसी की याद आ रही हो तो ज़रा उस कोफ़्त के बारे में सोचिये कि आप किसी एक ख़ास दोस्त के मैसेज, कमेंट्स, लाइक्स और रिस्पांस देखने के चक्कर में सारे लोगों की भीड़ को चीरते हैं । मुझे व्यक्तिगत तौर पर यह अनुभव ऐसा लगता है जैसे किसी प्रीतिभोज समारोह में, बुफ्फे सिस्टम से अपनी थाली लेकर बाहर निकलना । रायते का फैलना और अचार का सब्जी में मिक्स होना लाज़मी है । वो एहसास कहाँ है कि बस एक आप हों और एक वो हो ? और उस पर अगर किसी लड़ाई-झगड़े के चलते उसने आपको ‘ब्लॉक’ कर दिया तो आप कहीं के न रहे । आपका सारा खज़ाना ऐसे ग़ायब हो जायेगा जैसे आप किसी रेगिस्तान में खड़े हों मुट्ठी भर रेत लिए और एक ज़बदस्त अंधड़ आ जाये, अब कहाँ और कैसे ढूंढिएगा अपने हिस्से की रेत! अब उन चिट्ठियों के बारे में सोचिये जो आपके किसी क़रीबी ने आपको लिखी हों । चाहे ज़माने की आबोहवा बदल जाये, चाहे आपका क़रीबी बेगाना हो जाये लेकिन आपका खज़ाना आपका है, केवल आपका । उसे आपसे कोई छीन ही नही सकता । आपकी मर्जी है चाहे उन खतों को दिल से लगाकर रखें या बंद कमरे में गुस्से से, मजबूरी में जला दें । चाहे तो अधजले ख़त अपने उंगलियाँ जलाकर बचा लें या पूरी तरह जलाकर उसकी राख को काजल की डिबिया में संभाल लें । वो चिट्ठियां, वो संदेश, वो ख़त पूरी तरह आपके हैं हमेशा आपके साथ ।

तो क्यूँ ना आज एक चिट्ठी लिखें…अपने बचपन के दोस्तों को, हॉस्टल से अपने मम्मी पापा को, शहर से अपने गाँव को, परदेश से अपने देश को, अपने किसी ख़ास को । क्यूँ न आज की ख़ुशबू, हवा, बादल, बारिश, धूप, प्यार, नाराज़गी, चिंता, हिदायतें इन सबको एक कागज़ में शब्दों से बाँध दें और भेज दें उसे, जो इस ख़ज़ाने का हक़दार है । मेरा अनुभव कहता है पहल तो करिये ज़वाबी चिट्ठी ज़रूर आयेगी । सबके चेहरों पर मुस्कान ज़रूर सजेगी । कोई आपके ख़त को लेकर झूमकर गायेगा….

संदेसे आते हैं, हमे तड़पाते हैं कि घर कब आओगे?

लिखो कब आओगे?

कि तुम बिन यह घर सूना-सूना है ।

image credit : हाथों से लिखी चिट्ठी

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s