चरित्रहीन …७

पिछला अंक :चरित्रहीन …६

कृष्णा ने कहा, ‘देखो मित्र, ऐसा करने में मात्र तुम्हारा स्वार्थ निहित है । तुम ऐसा करके अपना दिल हल्का करना चाहते हो । अपनी इमानदारी और सत्यनिष्ठा के ढोल पीटना चाहते हो । इस विचार में सुधा कहाँ है? सुधा के लिए तुम्हारा सत्य कपास सा हल्का होगा या शिला सा भारी होगा ? इस शिला  को उसके ह्रदय पर रखने के बाद उसमे स्पंदन रहेगा या नहीं ? जिस सत्य की कल्पनामात्र उसे इतना व्यथित और शोकाकुल कर रही है यदि उसका पुष्टिकरण मिल जाये तो उसकी स्थिति की कल्पना कर सकते हो पार्थ? मैं जानता हूँ सुधा स्वयं को सिर्फ तुम्हारी पत्नी ही नहीं स्वामिनी भी समझती है । तुमने उसे इतना प्रेम किया और सहर्ष उसकी सत्ता स्वीकार की तो क्यूँ न वो तुमको पति और सम्पत्ति समझे ? वो अभिमानी है लेकिन उस अभिमान के दर्पण में भी तुम्हारा ही प्रतिबिम्ब देखती है । उसे तुमसे और उस प्रतिबिंब दोनों से एक सा प्रेम है । किसी एक के भी टूटने से उसे पीड़ा एक समान ही होगी । क्या तुम उस पीड़ा के आंसूओं से तर और टूटी हुई सुधा को संभाल सकोगे ? बोलो दीपक..है इतना साहस और इतना सामर्थ्य ? अभी सुधा ऐसे संधिबिंदु पर है जहाँ से दोनों पक्षों में से किसी भी तरफ ले जाने का सामर्थ्य तुममे है पार्थ । सोचकर निर्धारित करो कि किस ओर ले जाना चाहते हो अपनी सुधा को । ‘सत्यम् ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, मा ब्रूयात सत्यम् अप्रियम’ जो सत्य सुनने वाले के लिए सुन्दर न हो, शिव न हो उसे न बोलना ही उचित होता है पार्थ । राधे को अपनी प्रेमिका, अपनी प्रेयसी के रूप में रुक्मिणी से न मिलवाओ पार्थ, उसका परिचय बाल सखा ही रहने दो । राधे इसका बुरा कभी नहीं मानेगी । जब प्रेम परिणय के सम्बंध में बंध जाता है तो उसमे उत्तरदायित्व और मर्यादा भी जुड़ जाती है पार्थ । सुधा तुम्हारी सहचारिणी, अर्धांगिनी है, एक बड़ा उत्तरदायित्व है तुम्हारा । तुम समरक्षेत्र में खड़े हो पार्थ, एक ओर तुम्हारा सत्य है जो सुधा के लिए असह्य है और दूसरी ओर सुधा के लिए तुम्हारा उत्तरदायित्व है । एक पक्ष में तुम्हारी इमानदारी और दूसरे पक्ष में तुम्हारी सुधा है । चयन तुम्हारा है पार्थ ।‘

अपना माथा अपनी हथेली से रगड़ते हुए दीपक ने पूछा, ‘क्या सुधा मेरे सत्य पर विश्वास नहीं करेगी? क्या सुधा नहीं समझ सकेगी? अब तो मेरे मन में कोई मैल न रहा । अब तो मैं मालती से प्रेम में ऐसी जगह आ पहुँचा हूँ जहाँ शारीरिक आकर्षण का कोई स्थान नहीं है । एक सच्चा, निश्चल, धवल प्रेम है ।‘

कृष्णा ने पूछा, ‘पार्थ क्या तुम समझ सकते थे इस प्रेम को यदि तुम स्वयं इसके भुक्तभोगी न होते? क्या तुम अपने किसी मित्र के विवाहोत्तर प्रेम-सम्बन्ध को आज से पहले आदर के योग्य मानते थे?’

दीपक ने एक लम्बी साँस छोड़ी और अपनी हथेली पर अपनी ठुड्डी टिका ली । ‘मैं बिना ग्लानि भाव के आज भी अपने सखा के प्राणरक्षा के लिए बादलों से मिलकर षड्यंत्र रच सकता हूँ । उसे अभय दान देने के लिए अपना व्रत छोड़ सुदर्शन चक्र उठा सकता हूँ । एक बड़े हित के लिए किसी सत्यनिष्ठ धर्मराज को असत्य का आश्रय लेने के लिए उद्ध्यत कर सकता हूँ । इन प्रकरणों में मुझे ढूँढने और समझने का यत्न करो मित्र । संभवतः तुम अपना मार्ग ढूंढ सकोगे ।‘ कृष्णा ने कहा ।

दीपक सोच में डूबा हुआ है और ऐसा लगता है कृष्णा जाने की तैयारी में हैं । लेकिन कुछ और भी कहना है उन्हें अभी इसलिए दीपक की ओर स्नेह से देखे जा रहे हैं । मुंह से एक लम्बी साँस छोड़कर, आँखें बंद किये कुर्सी पर पीछे सिर टिकाते हुए दीपक कुर्सी पर लगभग लेट सा गया है । किसी असहजता से तुरंत खुद को कुर्सी पर व्यवस्थित किया और कृष्णा की ओर देखा और कहा, ‘तुम बताओ दोस्त, जो कहोगे वही करूँगा ।‘ कृष्णा ने हंस कर कहा, ‘मैं मात्र सारथी हूँ पार्थ, योद्धा तो तुम्ही हो । तुम्हारे निर्णय तुम्हें ही लेने होंगे । मैं तो अब चलने की अनुमति चाहता हूँ । हाँ, चलते-चलते तुमसे एक आश्वासन की अपेक्षा करता हूँ ।‘ दीपक ने तुरंत थोडा सा शर्मिंदा होते हुए कहा, ‘कहो दोस्त, वादा रहा जो कहोगे पूरी तरह निभाऊंगा ।’

‘दीपक भविष्य में यदि सुधा को किसी और से प्रेम हो जाये तो उसके कृष्णा, उसके मित्र बनोगे ? क्यूंकि वह मुझे नहीं बुलाएगी । इस समाज में नर चाहे तो स्वयं को राम में ढूंढ ले, कृष्णा में ढूंढ ले या रावण में ढूंढ ले, उसे आश्रय की कोई कमी नहीं । किन्तु एक नारी, वो जिधर जाती है उसे सीता, राधा, रुक्मिणी, मंदोदरी, अहिल्या, सती, ऐसी विभूतियाँ मिलती हैं । उसके प्रेम के लिए कहीं कोई आश्रय नहीं । सुधा का अपराधबोध तुमसे कहीं बढ़कर होगा दीपक । तुम तो सहायता के लिए मुझे बुला सके वो अपने इस दावानल में खुद की मौन आहुति दे देगी । नैतिकता के बंधन उसके हाथ पैर बाँध लेंगे, सतीत्व और जौहर की कथाएं उसकी जिह्वा को बांध लेंगे, सीता और मंदोदरी जैसी विभूतियाँ उसके विवेक को प्रताड़ित करेंगी । उसकी स्थिति की कल्पना भी अति भयावह है पार्थ । तुम प्रेमी हो, प्रेम को जीते और जानते हो । समाज में कोई और प्रेमी को चाहे न आश्रय दे किन्तु दो प्रेमी एक दूसरे के आश्रय तो हो सकते हैं पार्थ । बोलो मित्र, क्या मेरी सुधा के सखा बनोगे, मार्गदर्शक बनोगे ? उसे संभाल लोगे यह आश्वासन दे सकते हो मित्र? ’

दीपक की आँखों से आँसू बह रहे हैं और उसका प्रेमी दिल हर उस लड़की के लिए दुःख रहा है जो असहाय है, समाज की मानसिक वर्जनाओं की बंदी है । उसने अपने आँसू गटकते हुए पूछा, ‘कृष्णा मेरी मालती …….’ आगे के शब्द गले में ही रह गए ।

कृष्णा ने पूछा, ‘ मित्र, देते हो आश्वासन?’ दीपक ने हाँ में सर हिलाया और फूट-फूटकर रोने लगा ।

कृष्णा ठिठक गए और कहा, ‘मालती कुशल से है पार्थ । नारी ह्रदय की गहराई, उसमे जलती आग, उसमे उठती भवंर, उसमे जागती-सोती लहरों के थाह कौन ले सका है? मालती को यदि कोई आदर्श न मिला तो वह स्वयं आदर्श बनने को प्रस्तुत हो जाएगी । वो रात्रि के अन्धकार में जी भरकर उसकी कालिमा बाँट लेती है, खुद रजनी बन जगती है, ओस बन भीगती है और उषाकाल में किरण-किरण होकर चमक उठती है । मालती एक सुदृढ़ नारी है, शक्तिपुंज है पार्थ, उसकी चिंता न करो । वो अपनी पीड़ा तुमपर भी व्यक्त नहीं करेगी पार्थ । जब भी उससे मिलो सहानभूति से न मिलना मित्र, मिलना तो सच्चे प्रेम से । उसे बस इतना ही अपेक्षित है ।‘

दीपक को मालती की और से निश्चिंत कर और सुधा का उत्तरदायित्व देकर कृष्णा चले गए और दीपक ने अपना मोबाइल निकला और एक कॉल की । फ़ोन के उठते ही बोला, ‘सुधा, आय लव यू।‘ जवाब में एक हंसी फ़ोन पर गा उठी ।

समाप्त

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