चरित्रहीन …६

पिछला अंक :चरित्रहीन ..५

दीपक ने उलझी हुई सवालिया नज़रों से कृष्णा की ओर देखा । कृष्णा ने कहा, ‘दीपक, अगर मैं अभी तुम्हारी मालती को यहाँ ले आऊँ तो क्या करोगे ?’

दीपक ने भीगे गले से, दबी, डरी आवाज़ में कहा, ‘गले लग जाऊंगा ।‘

‘और?……’

दीपक ने आँखें बंदकर ली और चुपचाप बैठा रहा । कृष्णा पूछते रहे, ‘और….आगे….पार्थ….दीपक…’

लेकिन दीपक शायद वहाँ था ही नहीं । कृष्णा दीपक के चहरे पर सुकून की आहट देखकर मुस्कुराते हुए शांत बैठ गए । जाने कितने युग बीत गए या शायद समय भी कृष्णा की तरह दीपक को मुग्ध सा देखता रह गया, लम्बे अंतराल के बाद दीपक ने आँखें खोली और लौटकर आया । उसकी आँखों में दिनों की खोयी हुई चमक लौट आई थी । नाजुक होंठो पर मासूम हँसी सजी हुई थी । उसकी आवाज़ में खनक लौट आई थी । धड़कने और साँसे अपनी सरगम पर लौट आयी । पूरा शरीर रुई सा हल्का हो गया और पैरों में थिरकन लौट आई । इस दीपक से खुद दीपक भी बहुत दिनों बाद मिल रहा है । उसने लपककर कृष्णा को गले लगा लिया ।

‘कृष्णा, जानते हो अभी क्या हुआ? मैं मालती से मिला और उससे लिपटकर इतनी शांति इतना सुकून मिला । सब कुछ थम गया था कृष्णा । मेरी सारी इन्द्रियां बस उसे ही महसूस कर रही थी । उसके पास कितना सुकून है ! उसके पास से थोडा मैं भी ले आया ।‘

कृष्णा ने मीठी नज़रों से दीपक को देखा और छेड़कर कहा ‘और क्या-क्या किया?’

दीपक जी खोलकर हंसा, पहले इस छेड़खानी पर फिर अपने आप पर । इतने दिनों बाद दीपक इस तरह हँसा था उसके अपने कानों को वो आवाज़ बहुत अच्छी लग रही थी ।

‘कृष्णा, तुम जानते हो..अच्छी तरह जानते हो कि इसके पहले जब-जब मैंने मालती से एक बार मिल लेने की इच्छा की थी तब मैं किस मनःस्थिति में होता था । मैं क्या क्या नहीं कर लेना चाहता था –उसे झकझोर देना, उसकी तेज़ साँसों को महसूस करना, उसके नाजुक होंठों को घुलते हुए महसूस करना, उसकी धडकनों में अपना नाम सुनना और ….. ऐसा लगता था प्यार की दहकती हुई गरमी में पिघलकर ही दिल को ठंडक पड़ेगी । तुम जानते हो यह सब । मैं खुद से डरता था इसलिए कभी उसके पास ख़यालों में भी नहीं जा पाया । आज जब तुम्हारे भरोसे हिम्मत की, तो जाना कैसा पागलपन था वो मेरा ! उसके पास गया तो ऐसा कुछ भी मन में नहीं आया । उससे लिपटकर ऐसा लगा सब कुछ पा लिया मैंने …पूरा हो गया मैं । कल्पना भी नहीं सकता था कि जब मैं और मालती होंगे पास-पास तो बेचैनियों का शोर नहीं एक ठहरा हुआ सुकून होगा । न कुछ कहने की जरूरत होगी न कुछ सुनने की । दोनों इस तरह एक हो जायेंगे कि दो होने का सच ही झूठा हो जायेगा । वो पल भर का सपना युगों की हक़ीक़त से बड़ा हो जायेगा ।‘

फिर दीपक चुप हो गया और अचानक बिजली की तरह कुछ कौंधा उसके दिमाग में और वो बोला, ‘कृष्णा, यही है अमृत?’

कृष्णा ने फिर छेड़ते हुए कहा, ‘यही है सुधा’ ।

दीपक ने हंसते हुए सिर हाँ में हिलाया और कहा, ’बहुत दिनों से सुधा इस शक में खुद को जला रही है । आज मैं उसे सब सच-सच बता दूँगा । अब मुझे सच से डर नहीं लगता । अब सुधा से और झूठ नहीं बोलूँगा । मेरा दिल साफ़ हो गया है और मैं उससे यह बात ईमानदारीपूर्वक साझा करूँगा ।‘

कृष्णा ने गंभीरता से कहा, ‘यदि यही उचित लगता है तो करो दीपक ।‘

दीपक को कुछ असमंजस हुआ और उसने कहा, ‘क्या ऐसा करना ठीक नहीं है?’

आख़िरी अंक :चरित्रहीन …७

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