चरित्रहीन ..५

पिछला अंक :चरित्रहीन ..४

सुबह दीपक की नींद आज जल्दी खुल गयी है । सुधा और उसकी बेटी दोनों चैन से सो रही हैं । एक मुस्कान दीपक के चेहरे पर आ गयी, कितनी प्यारी लग रही हैं दोनों । उन दोनों को सोती छोड़कर दीपक बाहर आ गया । आज मैं सुधा को सुबह की चाय के साथ उठाऊँगा । खुश हो जाएगी वो, रात में कितना रोई है । मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ सुधा और चाहता हूँ तुम्हें खुश रख सकूं । तुम और हमारी बेटी तुम दोनों ही तो हो मेरे जीने की वजह, जीने का मकसद, मेरी ज़िंदगी । तुम दोनों की हंसी-ख़ुशी मेरे लिए जीने का खुशनुमा मौसम हैं । उसके विचार टहलते-टहलते रात को देखे सपने तक आ पहुंचे और वो सिहर गया । उफ़्फ़! मैं ऐसा सपने में भी कैसे सोच सकता हूँ ? आत्महत्या ? यह पाप मैं तुम दोनों के साथ कैसे कर सकता हूँ? उफ़्फ़! नहीं, कभी नहीं । मालती, तुम हो… मेरे सर्वनाश का बीज । तुम्हारे ख़यालों में ऐसे बहकने लगता हूँ जैसे लड़कपन की ऋतु आ गयी हो। प्यार अँधा होता है लेकिन क्या इतना अँधा होता है कि इतना बड़ा अपराध कर बैठे ? खुद से हैरान और खिन्न दीपक किचन में चाय बनाने लगा । चाय चूल्हे पर उबल रही है और ग्लानि दीपक के मन में । पत्नी से धोखा, दूसरी लड़की को प्रेम करना और अपने स्वार्थ में अपनी नन्ही सी बेटी और प्यारे से परिवार को अनदेखा कर ख़ुद्खुशी की सोचना, अपनी कमज़ोरियों पर दीपक को अपने आप से नफ़रत सी होने लगी । ‘खुद से घृणा और अप्रीती करना भी आत्मघात जैसा ही है मित्र’ । दीपक मुस्कुरा दिया और बोला, ’कान्हा, अभी समय नहीं है फिर बात करूंगा तुमसे । अभी सुधा को जगाने जा रहा हूँ ।‘ और दीपक चाय छानकर अपनी सुधा की ओर चल पड़ा ।

‘गुड मोर्निंग!’ कहकर सुधा के माथे पर अपना चेहरा टिका दिया दीपक ने ।

सुधा ने उसके गले में बाँहें डालकर मीठी सी आवाज़ में कहा, ‘बड़े फ्रेश लग रहे हो! कब के जगे हुए हो?’

‘चाय बनने में जितना टाइम लगता है बस उतनी ही देर पहले’ कहकर दीपक ने चाय की तरफ़ इशारा किया ।

‘अरे वाह! बेड टी!’ खुश होकर सुधा ने कसकर एक लम्बी किस ईनाम में देते हुए कहा, ‘आय लव यू’ ।

पहली चुस्की के साथ सुधा बोली, ’आज तो चाय बहुत गज़ब बनी है ।’

‘क़यामत को जगाना था तो गज़ब उबालना पड़ा‘, हँसते हुए दीपक ने शरारत से कहा ।

बड़े दिनों में आज दोनों ऐसे खुश हैं और साथ हंस रहे हैं। दोनों ने साथ चाय पी और दिनचर्या के अनुसार अपने नियत समय पर दीपक ऑफिस के लिए चला गया । दीपक के मन को कुछ संतुष्टि है आज । उसे ऐसा लग रहा है कि मालती की यादों और इच्छाओं पर जीत पा ली है उसने । लेकिन उस ऑफिस डेस्क, फ़ोन और केबिन का वो क्या करे जो अब भी उन्ही यादों को दोहरा रहे हैं ? कहाँ झाड़ दे उस खुशबू को जो उसकी सीट को लपेटे बैठी है ? यह खुशबू सीट पर बैठते ही उसके होश चुरा लेती है, सब कुछ भुला देती है और बहुत कुछ याद दिला देती है । अपने ही केबिन में चोरों की तरह डरा, सहमा घुस रहा है दीपक । पैर जैसे दरवाज़े पर ही जम गए हैं, सीट के पास जाने की हिम्मत नहीं होती । खुद को समेटे सुधा सुधा करते हुए सीट की तरफ दीपक खुद को घसीट रहा है । सीट छूते ही लड़खड़ा गया, घबराकर कृष्णा को याद किया दीपक ने । ‘नहीं, नहीं’ करते हुए कांपते हाथों से सीट खींचकर दीपक उसपर बैठ गया । यह वही सीट है जिसपर बैठकर दीपक ने मालती से न जाने कितनी बातें की हैं । कितने हंसते-हंसाते पलों को अपने फैब्रिक में बुन चुकी है यह ! और जब से दोनों अलग हुए हैं कितने आंसूओं, कितनी तड़प और बेबसी को अपने अन्दर समेटे लिए जा रही है यह ! यादों के अलाव तपना शुरू हुए और जलते दिल से उठते बैचैनी के धुएं में दीपक का दम घुटने लगा । उसने अपनी टाई खींचकर नीचे की और सीट पीछे धकेलकर दोनों हाथ जेबों में भरकर ऐसे खड़ा हो गया जैसे यादें हाथ खींचकर वापस बिठा लेंगी । फिर केबिन में इधर उधर तेज़ कदमों से चलने लगा । बिना मकसद मेज की दराज़ खोलकर तकने लगा । ‘नहीं जीत सकता मैं तुमसे और इन यादों से’, आत्मसमर्पण करते हुए दीपक ने खुद को एक बार फिर से उसी कुर्सी के हवाले कर दिया जिससे कुछ देर पहले उसने अपनी जान बचायी थी । दरवाज़े पर एक दस्तक हुई दीपक ने अपना सर कंप्यूटर स्क्रीन में ऐसे घुसा लिया जैसे काम में तल्लीन हो । बिना देखे ही बोला, ‘आ जाओ’ । ‘अरे लगता है फिर मैं गलत समय पर आ गया’, अर्थपूर्ण नज़रों से दीपक की तरफ देखते हुए किसी ने कहा । उस आवाज़ को सुनकर दीपक ने आँखें बंद कर ली और दो मोती आँखों से निर्वासित हो गए । ‘बताओ कृष्णा, कैसे? कैसे?’ एक लम्बा मौन केबिन में पसर रहा और बड़ी-बड़ी आँखें निकाले कभी कृष्णा को देखता कभी दीपक को ।

कृष्णा दीपक के पास आये और पूछा, ‘तुम्हारी परेशानी क्या है मित्र?’

दीपक ने झल्लाहट और गुस्से से सर झुका लिया और थोड़ा रूककर कहा, ‘मैं मालती को नहीं भुला पा रहा हूँ’ ।

‘क्यूँ भुलाना चाहते हो?’

‘क्यूंकि यह ग़लत है । यह प्यार ग़लत है ।‘

‘प्रेम ग़लत या सही नहीं होता मित्र, प्रेम मात्र प्रेम होता है ।‘

‘जिस प्रेम के लिए सारी दुनिया मेरी थू-थू करे वो ग़लत कैसे नहीं है? जो प्रेम मेरी सुधा को दुःख दे वो ग़लत कैसे नहीं है? तुम नहीं समझोगे कृष्णा, कभी किसी ने तुम्हारे प्रेम को पाप नहीं कहा ।’

‘मित्र, प्रेम कभी ग़लत नहीं होता । यह तो वो अथाह जलराशि है जिसका मंथन करने पर पहले खुशियों के रत्न और मादक सुरा निकलती है और उसके बाद दर्द, बिछोह, तड़प, जलन और तिरस्कार का हलाहल । जो लोग महादेव की तरह इस हलाहल पर विजय पा लेते हैं उन्हें अंत में यह अथाह जलनिधि अमृत से पुरस्कृत करती है । अपनी पात्रता प्रमाणित करो मित्र और ले जाओ इस अमृत कुंभ से अपना हिस्सा ।‘

दीपक कुछ समझ पाया और कुछ उलझ गया ।

अगला अंक :चरित्रहीन …६

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