चरित्रहीन ..४

पिछला अंक चरित्रहीन…३

दीपक अपनी मुट्ठी बांधे, दर्द को अपने शरीर की हद में रखने को कोशिश करके थक गया तो दोनों हाथ फैलाकर चिल्लाने लगा, ’कैसा अपराध हुआ मुझसे जो इतनी निर्मम सज़ा ! आओ पंचभूतों पूरी तरह दण्डित करो मुझे । ऐ लहरों, मुझे रेत-रेत बहा ले जाओ । ऐ हवा, मुझे फूस-फूस उड़ा ले जाओ । ऐ गगन लील जा मुझे । आओ सर्वनाश करो मेरे इस शापित जीवन का ।‘ आवेश में दीपक आगे बढ़ने लगा और बढ़ता ही चला जा रहा था । समुंद्र भी अपने प्रेमावेश में अपना विवेक खो चुका था । उसने देखा ही नहीं कि उसकी लहरें अपने साथ एक जीवन भी ले लेने को अग्रसर हैं । या शायद खट्टे-मीठे बेरों का चयन तभी होता है जब प्रेम में वात्सल्य का अंश हो । अन्यथा तो प्रेम उस पागल नदी सा होता है जो अपने जल के साथ कंकड़-पत्थर, कूड़ा, कई जीव-जंतु लिए उफनती ही जाती है सागर के अंक में अपना अस्तित्व खो देने को । आज सागर अपना सर्वस्व लिए अपने चन्द्र से मिलने को उद्यत है । आज कोई भेद-भाव नहीं, कोई विचार नहीं बस उन्माद है, रोमांच है और समर्पण है । किन्तु कृष्णा अपने मित्र को कैसे जाने देते ? उन्होंने पीछे से आवाज़ लगायी, ‘पार्थ! पार्थ!’ मगर दीपक आत्मोसर्ग का निश्चय कर चूका है । अपने अपराधबोध, अपनी ग्लानि और अपने प्रेम का अंत कर देना चाहता है वो । कृष्णा ने सर न की मुद्रा में हिलाया और खुद से बोले, ‘इस भौतिक लोक में माया के अतिरिक्त कोई उपकरण नहीं मानव का ध्यान खींचने को ।‘ उन्होंने अपना स्वर बदला और एक बार फिर पुकारा, ‘पापा! पापा!’

दीपक की सुध-बुध लौटी और वो एक असहाय, चोट खाए बच्चे की तरह रोता हुआ दोनों हाथ फैलाये दौड़ पड़ा अपने कृष्णा की ओर । उसका हृदय उससे भी १० कदम आगे भाग रहा था । क़दम अनियंत्रित हो चले और दीपक रेत पर ओंधे मुँह गिर पड़ा । ‘कृष्णा ! कृष्णा !’ बस यही कहता जाता । गले और आँखों में एक अनदेखी सी प्रतिस्पर्धा चल रही थी, कभी आँसू आवाज़ से आगे-आगे भागते तो कभी आवाज़ आंसूओं से आगे निकल जाती । ऐसा करुण क्रदन और विलाप कि सारी सृष्टि मूक हो गयी, उसने अपने आँखें मूँद ली और दोनों हाथों से अपने कान बंद कर लिए । बस एक अकेले कृष्णा उस हृदयविदारक विलाप को सुन रहे थे । दीपक ने दोनों मुट्ठियों में रेत ली और कृष्णा से कहा, ‘उस इंसान की व्यथा जानते हो दोस्त, जो रेत को मुट्ठी में रोकने की कोशिश करता है और रेत उसकी मुट्ठी से छूटती ही जाती है । मेरी हालत उस इंसान से भी बुरी है, दोस्त । रेत को रोकने की कोशिश उस इंसान के अधिकार में है, लेकिन मैं …. मैं तो यह कोशिश भी नहीं कर सकता कृष्णा ।‘ अपने हथेली फैलाते हुए दीपक बोला, ’वो मेरे हाथों से छूट रही है और मैं मुट्ठी बाँध नहीं सकता । वो जा रही है और पैरों के होते हुए भी मैं आगे बढ़कर उसका रास्ता नहीं रोक सकता । वो दूर होती जा रही है और आवाज़ होते हुए भी मैं उसका नाम नहीं ले सकता । उसे दूर जाते नहीं देख सकता लेकिन जब तक आँखों से वो ओझल न जाये उसे देखने का लालच भी नहीं छूटता । सुधा और बेटी को सोचकर खुद को बहलाने और समझाने की बहुत कोशिश करता हूँ मगर दिल का दर्द कम नहीं होता । बहुत दर्द है कृष्णा, बहुत दर्द है, बहुत दर्द है ।‘ दीपक के दोनों हाथ पूरी ताकत से उसकी छाती पर वार कर रहे हैं । एक ही शरीर के अंग एक दूसरे से यह कैसा यूद्ध कर रहे हैं यह देखकर आँखें छलकाना ही नहीं बंद कर रही । कृष्णा ने स्नेह से दीपक के सिर पर हाथ रखा और कहा, ’मैं समझता हूँ मित्र, भली भांति समझता हूँ इस व्यथा, विवशता, प्रतिबन्ध और दर्द को ।‘ कृष्णा दूर क्षितिज में देखते हुए दर्द से बोले, ’यदि मैं चाहता, तो क्या राधे को अपने पास रोक लेने से कोई शक्ति मुझे रोक लेती ? किन्तु यह चाहना ही मेरे अधिकार क्षेत्र से बाहर था पार्थ ।‘ कृष्णा की बातों ने दीपक के जलते हुए दिल पर शीतल चन्दनलेप का काम किया । उसको एक सहारा हुआ कि कोई है जो उसकी हालत समझ सकता है । एक निराश, थके हुए, हारे हुए दुखी इंसान को यह सहारा ही बहुत होता है कि कोई उसका दुःख, उसकी थकान और उसकी हार को बिना किसी तराजू में तौले उसी तरह समझता और महसूस करता है जैसे कि वो खुद । दीपक को भी वही सहारा मिला और वो उठकर खड़ा हो गया । कृष्णा दीपक के कंधे पर हाथ रखकर बोले, ‘मित्र तुम वर्तमान हो और मैं भविष्य । सृष्टि इतनी भी नृशंस और क्रूर नहीं है मित्र । बस समय का हाथ थामे चलते रहो, तुम्हारा भविष्य तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है ।‘ दीपक ने कृष्णा से पूछा, ‘क्या मुझे एक बार उससे मिलवाओगे? बस एक बार?’ कृष्णा ने हँसते हुए कहा, ‘मिलवाऊंगा पार्थ, उस दिन मिलवाऊंगा जब तुम उस मिलन के लिए परिपक्व को जाओगे । स्वयं को तैयार करो और मुझपर विश्वास रखो ।‘ दीपक का दिल हल्का हो गया और उसके मुँह से निकला, ‘मैं जानता हूँ कि तू गैर है मगर यूँ ही’ । कृष्णा बस मुस्कुरा दिए ।

अगला अंक : चरित्रहीन ..५

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7 Comments Add yours

  1. Abhijith Padmakumar says:

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