चरित्रहीन…३

पिछला अंक : चरित्रहीन..२

दीपक रजनी के रजत प्रकाश में क्षितिज की ओर एकटक आँखें गढ़ाये खड़ा है। ह्रदय में भावों का आन्दोलन मचा हुआ है, विद्रोह का जुलूस निकल रहा है । आसमान में चन्द्र अपने पूरे यौवन पर है, आज पूर्णमासी है । अपने चन्द्र से मिलने को समुन्द्र भी उन्मत्त हो रहा है । उसकी लहरें भी भरपूर वेग से उफनती हुई असमान में अपने प्रेमी चन्द्र से मिल जाने को उत्सुक हैं । भीषण कोलाहल है लहरों के कौतुहल का । उस पर पवन भी रोज से तेज चाल में है ऐसा लगता है लपक-लपक कर लहरों को आसमान तक पहुंचा देना चाहता है । शायद आज मित्रता निभाने की रात है । लहरों का झुण्ड बार-बार पूरे वेग से दीपक से टकरा रहा है और पवन भी लहरों के इस अवरोध को हटाने की पूरी कोशिश कर रही है । दीपक अपनी पूरी शक्ति से इन दोनों से लड़ रहा है । लेकिन इस प्रणय की रात में दीपक की आँखें ढूँढ क्या रही हैं ? ह्रदय में मालती मालती का शोर मचा हुआ है । मन बीती बातों में ही बार बार भटक रहा है ।  ओह मालती! क्या सचमुच तुम्हें कभी नहीं लगा कि मैं तुमसे प्यार करने लगा हूँ ! तब भी नहीं जब मैंने तुमसे कहा, ‘ मैं तुम्हारा जबरा फेन हो गया हूँ क्यूंकि तुम बहुते क्यूट हो । तुम कैसी निर्मोही हो ? हर बार जब-जब मैंने बताना चाहा, तुम हँसी में टाल देती । तुम्हारे लिए मैं बस एक जोकर था! जो हर बात तुम्हें हंसाने को कहता था । और मैं तुम्हारी उस हंसी पर ही मिटता रहा । तुम्हारा वो मुझे ‘आय लव यू’ कहना और आगे जोड़ देना ‘लेकिन दोस्ती वाला’ । मालती, मैंने आगे की बात कभी सुनी ही नहीं । मैं तो बस ‘आय लव यू’ ही सुनना चाहता था और वही सुनता था । जानता हूँ, अगर आज भी तुमसे यह सब कहूँगा तो फिर तुम कहोगी ‘आप कुछ भी कह लेते हैं , हद है’ और हंस-हंस कर लोटपोट हो जाओगी । ओह मालती! अगर मैं तुमसे तुम्हारी हंसी ही छीन लूं तो? फिर….फिर कैसे रियेक्ट करोगी मेरी इस बात पर ? क्या कहोगी मेरी प्यारी मालती, मेरी हसोड़ मालती ? सोचते सोचते दीपक की धड़कने तेज होने लगी, साँसे दौड़ने लगी और पूरे शरीर में कंपकपी हो गयी । दर्द महसूस होगा न एक ज़ोरदार झटके के साथ ? शायद बिखरकर मेरी बाहों में आ जाओगी और …….. लेकिन …. एक गहरी सांस छोड़ते हुए दीपक ने आँखें बंदकर सर झुका लिया फिर सिर को झटके से  दूसरी तरफ घुमा लिया । मालती, तुम क्यूँ आई मेरी जिंदगी में? सब मजे में चल रहा था यार, तुम क्यूँ आई? मुझे बर्बाद करने को आई थी ? तो फिर पूरी तरह बर्बाद क्यूँ न कर दिया अपने दीपक को, मालती? क्यूँ मझधार में इस तरह फडफडाने को छोड़ दिया? हर बार तो बातचीत की पहल करती थी इस बार चुप क्यूँ हो गयी हो मालती ? बोलो मालती..मेरे कान, मेरी आँखें, मेरी आत्मा तुम्हारी पहल का इंतज़ार कर रही है । मालती..मालती…दीपक के अन्दर का शोर बढ़ता ही जा रहा था । उसकी नसें तन गयी थी । मुट्ठी भींचे, आँखों में लालिमा भरे दीपक घूरता चला जा रहा है दूर क्षितिज को जहां से लहरें शुरू होती दिख रही हैं ।

तभी अँधेरे में सुधा का चेहरा उभर आया । देखते ही देखते सुधा का खूबसूरत चेहरा चुड़ैल की शक्ल लेने लगा । वो चुड़ैल जिसकी जान दीपक नाम के तोते में बसती है । वो चेहरा धीरे-धीरे भयानक होता जा रहा है और तोते को अपनी गिरफ़्त में लेने के लिए दीपक की ओर बढ़ता चला आ रहा है । उसके लम्बे-लम्बे नाखून निकल आये हैं और वो दीपक के लिए पिंजरा बनने को बेचैन हैं । चुड़ैल कभी उपहास करती, ताना मारती ‘तुम कितने गिरे हुए हो दीपक! छिः! शादीशुदा हो, एक बेटी है तुम्हारी और तुम ? कभी चुड़ैल रोने लगती ‘दीपक मैं तुमसे तुमतक हूँ, इससे ज्यादा कोई वजूद नहीं है मेरा । दीपक मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी।‘  दीपक वहीँ जमीन में गडा हुआ है डर और सदमे से । उसे नफ़रत हो रही है इस दोगलेपन से । एक तरफ कहती है प्यार करती है मुझसे और दूसरी तरफ मेरी ख़ुशी देखी नहीं जाती इससे। पास आते-आते चेहरा फिर से ख़ूबसूरत सुधा में बदल गया । उस चेहरे पर पुरानी यादों के चित्र एक-एक कर उभरने लगे । पहली बार सुधा से शादी के लिए मिलना । कितनी सुन्दर लग रही थी हरे रंग की साडी में! पहली बार सुधा को छूना । इतनी कोमल! इतनी सौम्य! पहली बार सुधा से बात होना । कैसे खुशियों से नाच रहा था मेरा दिल! पहली बार सुधा का मेरे घर आना और हमेशा के लिए मेरी हो जाना । हमारी बेटी को अपने गर्भ में लिए सुधा । बेटी को गोद में लिए सुधा । किसी बात पर दिल खोलकर हंसती सुधा । नींद में सोई निष्कपट सुधा । गीले बालों को तौलिये में लिपटाये सुधा । अधीर होती सुधा । चंचल सी सुधा । मेरी सुधा । मेरी सुधा मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ । हर रूप में, हर हाल में । तभी सुधा ने उलाहना दिया, ‘फिर क्यूँ उस डायन मालती के पीछे खुद को गिराते हो, वो प्यार नहीं वासना है ।’

प्यार के नाम को गाली सुनते ही एक और चेहरा उभर आया, मालती का । मालती सुधा से बोली ‘ऐसा क्यूँ कह रही हो? प्यार तो प्यार होता है, शादी से पहले हो या शादी के बाद । प्यार तो एक एहसास है उसे नियम नहीं बाँध सकते । नियम इंसान के क्रियाकलाप को बांधने के लिए होते हैं । तुमने शादी के नियम का इस्तेमाल करके दीपक को बाँध लिया, पर महसूस करने से रोकना तुम्हारे किसी नियम के बस में नहीं । और यकीन मानो तुम ऐसा न भी करती तो भी दीपक उस लक्षमण् रेखा को कभी न लांघता ।‘ मालती की बातें सुनकर दीपक को तसल्ली हुई कि कम से कम मालती तो उसे समझती है । लेकिन यह सुनकर सुधा के चेहरे ने विकराल रूप ले लिया और वो गरजकर बोली ‘चुप। आगे एक शब्द नहीं । पति मेरा, समस्या मेरी, बीच में ज्ञान देने वाली तू कौन? मेरे और दीपक के बीच बोलने वाली तू कौन? अभी वो समय नहीं आया कि सुधा और दीपक के बीच किसी वक़ील और उसकी वक़ालत की कोई जगह हो ।‘ उन शब्दों में एक आक्रोश था, वेदना थी, टूटे हुए घमंड की छवि थी और एक आदेश था । उस आदेश पर मालती का चेहरा वहां से गायब हो गया और धीरे-धीरे सुधा का चेहरा भी । दीपक एक बार फिर से अकेला, लहरों के शोर से अपने अन्दर के शोर को दबाने की कोशिश कर रहा था।

चौथा अंक : चरित्रहीन ..४

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