चरित्रहीन..२

पहला अंक : चरित्रहीन

दीपक अपनी बेटी और अपनी पत्नी सुधा के साथ बिस्तर पर लेटा है । उसकी बेटी सो गयी है लेकिन सुधा और दीपक दोनों की आँखों में नींद की कोई जगह ही नहीं है । दोनों चुपचाप लेटे हुए हैं अपने ही विचारों के बवंडर में खुद को संभालते हुए । आख़िरकार दीपक धीरे से उठा और बाहर जाने को हुआ तो सुधा भी उसके पीछे हो ली ।

‘सोते क्यूँ नहीं? क्या अब भी उसे ही याद कर रहे हो?’ सुधा ने आहत और तीखे स्वर में कहा ।

‘सुधा, यार तुम हर बात पर उसे क्यूँ खींच लाती हो ? तुम्हारे शक़ का मेरे पास कोई इलाज नहीं ।‘ चिढ़ता हुआ दीपक खुद को बचाने की कोशिश करता हुआ बोला ।

‘दीपक, मैं ऐसी भी बेवकूफ़ नहीं हूँ, सब समझती हूँ और देखती हूँ । जब से उस मालती से मिले हो तौर तरीके ही बदल गए हैं तुम्हारे । चलना छोड़ थिरकते फिर रहे थे । हंसी ही नहीं थमती थी तुम्हारी । हर समय, हर बात पर खुश-खुश रहा करते थे । और जब मैंने तुम्हें नींद में उसका नाम बडबडाते हुए सुन लिया तो तुम्हारी चोरों सी ऑंखें आज भी मुझे अच्छे से याद हैं । और मेरे कहने पर जब से उसे खुद से दूर किया है तुमने, यह देवदास जैसी सूरत लिए फिर रहे हो । और उस पर कहते हो कि मेरा शक़ बेबुनियाद है ।’ गुस्से से सुधा हांफने लगी और आँखों में तिरस्कार भरकर बोली, ‘ तुम कितने गिरे हुए हो दीपक! छिः! शादीशुदा हो, एक बेटी है तुम्हारी और तुम ? क्या कमी है मेरे प्यार में? कहाँ गलती हो गयी मुझसे ? तुम्हारी उस मालती से तो सुन्दर ही हूँ देखने में । ऐसा क्या जादू है उसमे ? ऐसे चुप मत हो दीपक, बोलो’ बोलते बोलते सुधा रुआंसी हो गयी और भरे गले से बोली ‘मैं अपनी गलती सुधारने को तैयार हूँ, जैसी कहो वैसी बनने को तैयार हूँ । दीपक मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ । मैं तुम्हें बंटते हुए नहीं देख सकती । दीपक, मैं तुमसे तुमतक हूँ, इससे ज्यादा कोई वजूद नहीं है मेरा । दीपक मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी । दीपक, जितना प्यार मैं तुमसे करती हूँ, तुम उतना प्यार मुझसे क्यूँ नहीं कर सकते?’ कहते-कहते अपने आंसूओं में बहती एक कमजोर नाव सी सुधा दीपक की पत्थर जैसी मजबूत छाती पे टिक गयी । ‘दीपक, दीपक’ कहती जाती और उसका रोना बढ़ता ही जाता ।

दीपक ने कसकर सुधा को अपनी बाहों में भर लिया और उसके आंसूओं से भीगे हुए चेहरे को चूमने लगा । फिर कसकर सुधा से लिपटकर गहरी सांस छोड़ते हुए रूंधी आवाज़ में बोला, ‘सुधा, मेरी जान, मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ । तुम में कोई कमी नहीं है । कोई गलती नहीं की तुमने । तुम जैसी हो बहुत बहुत बहुत अच्छी और प्यारी हो । तुम्हें बदलने की कोई जरूरत नहीं । मैं हमारी शादी में, हमारे परिवार में खुश हूँ यार । ऐसे रोया मत करो जान, मैं भी रो दूँगा ।‘ कहते-कहते दीपक भी असहाय सा रोने लगा । दोनों एक दूसरे से लिपटे रो रहे थे । कौन किसको संभाले थे कहना मुश्किल है । कौन किसको चुप कराये और कौन किसको समझाए ! रात भी चुपचाप दोनों की दुविधा, दोनों का संघर्ष और दोनों के दुखों पर रोती रही ।

बीच रात में दीपक का अलार्म बजा और दोनों भागे बेडरूम की तरफ । सुधा आँसू पोछकर बेटी के एक तरफ सोने का अभिनय करने लगी और दीपक बेटी को गोद में उठाकर बाथरूम की तरफ जाने लगा । यह अलार्म दीपक को हर रात उसकी छोटी सी बेटी को एक बार बाथरूम ले जाने के लिए बजता है । जिस दिन चूके समझो बिस्तर की वेटक्लीनिंग पक्की ।

बाथरूम से लौटकर दीपक सुधा के पास ही लेट गया और सुधा उससे लिपटकर कुछ देर बाद सो गयी । दीपक के कानो में एक ही बात बार बार गूँज रही है ‘तुम कितने गिरे हुए हो दीपक! शादीशुदा हो, छिः! एक बेटी है तुम्हारी और तुम ?’ ओह सुधा ! तुम्हारे दिल की बात तो सारी क़ायनात जानती है लेकिन मेरे दिल की खबर तो बस मुझे ही है ।  मालती भी नहीं जानती कि मैं पागल हो गया था उसके लिए । कैसे बताता वो भी तो यही कहती ‘तुम कितने गिरे हुए हो दीपक! छिः! शादीशुदा हो, एक बेटी है तुम्हारी और तुम ?’ तुम दोनों ही अपनी जगह ठीक हो पर मेरी जगह क्या है ? काश कोई बस इतना बता दे । सब मुझे चरित्रहीन कह-कह कर मेरी आत्मा को छेद रहे हैं । अपने दुर्भाग्य के भंवर में बेसहारा गोल-गोल घूमता दीपक भी न जाने कब चक्कर खाकर सो गया । नींद से जागा तो खुद को एक निर्जन लेकिन शोर से भरे समुंद्र के किनारे खड़ा पाया ।

तीसरा अंक : चरित्रहीन…३

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