चरित्रहीन

कृष्णा तूने रुक्मिणी से विवाह क्यूँ किया ? लगा कि राधे से धोखा कर दिया तूने ? तू तो राधा के प्रेम में मगन रहने वाला सुदर्शन मुरलीधर था । राधे के बिछोह में अपनी मुरली तज देने वाले, क्या विवाह के बाद राधे कभी याद आई ? अगर आई तो क्या ग्लानि हुई ? लगा कि रुक्मिणी से विश्वासघात कर दिया तूने ? क्या कभी रुक्मिणी को वैसे ही प्यार किया तूने ? कभी रुक्मिणी को बताया कि तेरा हृदय जब-तब कालिंदीकूल के कदम्ब पर टिकी अपनी राधे के पास चला जाता है ? उस वेदना की अनुभूति तो ज़रूर होती होगी जो तुम दोनों के अस्तित्व का पर्याय बन गयी । कभी रुक्मिणी से बात करते-करते उसे राधे कहने की भूल हुई ? ह्रदय में राधे और रुक्मिणी दोनों का एक ही स्थान हो पाया कभी ? नहीं हो पाया तो अपराधबोध हुआ या रुक्मिणी पर करुणा जागी ? दोनों का ही अपराधी पाया होगा खुद को तूने । किन्तु खुद को दण्डित करने का कभी साहस न आया होगा । आता भी कैसे और कहाँ से, उन दो दुखियारियों को और दुःख देने का साहस । तेरी पीर पर तड़प जाने वाली प्रेयसियों पर कैसे प्रकट करता तू अपने ह्रदय के धधकते अलाव ! कैसी स्थिति थी तेरी ! इतनी पीड़ा, धमनियों में दौड़ता अपराधबोध का विष फिर कैसे विवेकशील रह पाया तू !! उखड़ती, आर्त्त साँसों को कैसे संयत कर पाया तू !! दर्द इतना था फिर कैसे मुस्कुराता था तू !! सचमुच प्रेमी ही था या मात्र रसिक था तू ? कमरे में अपनी कुर्सी पर हिलते हुए दीपक अपनी बेचैन उँगलियों को चटकाता, कभी हाथों में सर पकड़ लेता और कसकर ऑंखें मूंदकर बडबडाता जा रहा था । आज दीपक बहुत परेशान है, रह-रह कर मालती की यादों की आँधी उसके सुख चैन को उड़ा कर उसे उलाहना दे रही हैं । दीपक मालती से इतनी दूर निकल आया कि वो रास्ते भी खो गए जिन पर चलकर मालती उस तक पहुँच सके । जैसे एक एकमात्र पुल वाला भवसागर जिसे दीपक ने पार किया और पार पहुंचकर पुल ही तोड़ दिया । आह! कैसी विवशता थी वो ! कैसा दुराग्रह था दुर्भाग्य का ! वो व्यथित सा अपने आप को ढूंढ रहा है साहित्य में, प्रेमियों में, पौराणिक पात्रों में । कोई तो होगा जिसने यह सब सहा होगा जो वो सह रहा है । कहीं तो मार्गदर्शन मिलेगा । क्या करूँ ? जितना ही खुद को लोभ देता हूँ एक खुशहाल शादी का, अपनी प्रतिष्ठा का, उतना ही ह्रदय और विद्रोही होता जाता है, उतना ही अपराधबोध बढ़ता जाता है । कौन सा प्रलोभन , कौन सा प्रयोजन दूँ इसे कि शांति से बैठ जाये यह ?

दीपक अपने कमरे में अकेला है तभी नेपथ्य से एक स्वर उभरता है, पार्थ ! दीपक हतबुद्धि सा घबराया हुआ चारों ओर देखता है और फिर वही स्वर, पार्थ ! दीपक अपना सर सामने की मेज पर मार कर कहता है, ‘केमिकल लोचा ! यह तो बी आर चोपड़ा के नितीश भारद्वाज की आवाज़ है । मैं पागल हो गया हूँ , मैं पागल हो गया हूँ ।‘  एक मधुर सा हास्य प्रत्युत्तर में उभरता है और वही आवाज़ कहना शुरू करती है, ‘ तुमने मुझे जिस रूप और आवाज़ में सबसे पहली बार जाना है पार्थ, मैं उसी को माध्यम बनाकर तुमसे मिलने आया हूँ । अब माध्यम में ही उलझे रहोगे या मुझे, अपने सखा को, अपने साथ बैठने के लिए आमंत्रित भी करोगे दीपक ।‘  दीपक कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं है । वो बस हडबडाकर चुपचाप खड़ा हो जाता है । फिर आवाज़ कहती है, ‘तुम भी बैठो सखा’ दीपक यंत्रवत बैठ जाता है । ‘हाँ, तो मित्र तुम मुझे रसिक कह रहे थे, कुछ समय पहले ।‘ यह सुनकर पसीना दीपक के माथे को चूमने लगता है फिर एक बाल सुलभ, प्रेमपूर्ण उन्मुक्त हास्य दीपक के कानों को गरम कर गया और वो खुद को संभालता हुआ हाथ जोड़े, आँखें मूंदे मेज पर अपना सर टिका लेता है । कृष्णा बोलना शुरू करते हैं, ‘पार्थ, मैं प्रेमी ही हूँ । किन्तु प्रेमी और पीड़ामुक्त एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं । मेरा ह्रदय वो विशाल भूखंड है पार्थ, जिसमें राधे, रुक्मिणी, मीरा और असंख्य गोपियाँ अपने पूर्ण समर्पण के साथ महिमामंडित हैं । अनायास ही इन रमणियों के प्रेम का बीज इस भूखंड पर आ गिरा । उनकी इस अनुकम्पा को मैं नकार न सका । स्वयं अपने हाथों से मैंने अपने ह्रदय पर कुदालें चलायी और एक-एक बीज को रोपित किया । अपने स्नेह जल से सींचा, प्रतिपल अपने ह्रदय-अंश (खनिज-लवण) से उनको पोषित किया और तब यह बीज अंकुरित हुए फिर पल्लवित हुए । इस भूखंड को इनके प्रेम और समर्पण ने उपवन में बदल दिया । हर पुष्प अपनी विशिष्ट सुगन्ध, सौन्दर्य और अस्तित्व से मेरे इस उपवन को सुरभित, पुलकित और शोभायमान करता है । अपनी पीड़ा और उस पीड़ा के परिणाम को देखकर दर्द में भी मुस्कुरा लेता हूँ, पार्थ । इस उपवन की आत्मीयता और प्रेम है जो पीड़ा में भी विवेक को थामे रहते हैं ।‘ दीपक आँखें मूंदे सब सुन रहा है और उसे अपने कमरे में आंधी, अशांति की जगह एक विशेष सुगंध और शांति का एहसास होने लगा है । ‘पापा! पापा! दरवाजा खोलो’ दीपक की नन्ही सी बेटी दरवाज़े के दूसरी तरफ से आवाज़ लगा रही है । इस आवाज़ पर दीपक की आँखें खुली और खुद को संभालकर एक सुकून के साथ उसने दरवाज़ा खोला । अपनी बेटी को प्यार से गोद में लेकर दीपक उससे बात करने लगा और कान्हा वहीँ कुर्सी पर बैठे मुस्कुरा रहे हैं । आज वो दीपक के सवाल अनुत्तरित छोड़कर नहीं जाने वाले ।

अगला अंक : चरित्रहीन..२

image credit : कुछ कुछ होता है

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