ताक़त की दुनिया….२

पिछला भाग : ताक़त की दुनिया

इन २० सालों में हिना को अपने कहे हुए कठोर शब्दों पर जितना पछतावा हुआ वो बस हिना ही जानती है । शशि की यादें उसके जीवन का नासूर बन गयी हैं और उनसे रिसता हुआ मवाद अक्सर हिना की आँखों को भिगा जाता है । उन यादों का नमकीन खौलता पानी हिना के छिले हुए बदन को अक्सर ही लहूलुहान कर जाता है । हिना को दोस्तों से पता चला था कि शशि और प्रभास की शादी हो गयी । शादी के बाद प्रभास अपना सपना जीने चला गया और शशि अपने ससुराल में रहने लगी । हिना को जब-तब शशि की चिंता होती है । जब भी वो कोई घरेलू हिंसा से जुडी बुरी खबर पढ़ती या देखती है, उसे चुभते दर्द के साथ शशि का ही ख़याल आता है । पता नहीं कैसी होगी शशि ! खुद से बातें करते-करते हिना का स्टॉप आ गया था । वो उठी और मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलने लगी । हिना ऐसी बोझिल चाल से चल रही थी जैसे उसके पैरों में चक्के बंधे हों । बैठकर सफ़र किया, लेकिन ऐसी थकान हो रही है कि खुद को रेस्तरां तक घसीटने का सा हाल हो रखा है । जीवन में पहली बार ३० मिनट का सफ़र इतना लम्बा लगा और थकाऊ भी । किसी तरह वो रेस्तरां तक पहुँची और उसकी डरी हुई निगाहें शशि को ढूँढने लगी ।

किसी की चहकती हुई आवाज़ ने पीछे से कहा ‘ हेल्लो हिना ‘ । जब तक हिना पलटी किसी की नरम बाँहें उससे लिपट गयी । यह शशि थी । इतना सुकून मिला हिना को इस चहकती और गर्मजोशी से मिलती शशि को देखकर कि कुछ पल को तो वो रियेक्ट ही नहीं कर पायी । फिर अचकचाकर संभलती हुई बोली ‘हेल्लो शशि ! कैसी है? ‘ शशि ने भरपूर मुस्कान के साथ कहा, ‘मस्त’ । दोनों मुस्कुराती हुई एक टेबल की तरफ बढ़ गयी । हिना को शब्द नहीं मिल रहे थे या फिर अपनी ही भावनाओं का सिरा नहीं मिल पा रहा था कि बात कहाँ से शुरू करे । शशि बिल्कुल सहज और उन्मुक्त थी तो बात उसी ने शुरू की । बातों के बीच में हिना ने मौका देखकर कहा, ‘शशि, मुझे माफ़ कर दे यार । मुझे तुझसे वो सब नहीं कहना चाहिए था । मैं घबरा गयी थी शशि, बौखला गयी थी । माफ़ कर दे, प्लीज़ । तुझे इस तरह देखकर मुझे कितनी राहत हो रही है, तू नहीं समझ सकती । मैंने प्रभास को भी ग़लत समझा, मुझे माफ़ कर दे ।‘ कहते-कहते हिना के शब्द उसके गले में फसने लगे और आँखों में झीनी सी झिलमिलाहट तन गयी । शशि ने हिना को संभालते हुए कहा ,’ अरे पागल है तू । आज तक उन बातों को याद करती है ! मैंने तो कबका भुला दिया ।‘ हिना कुछ संभली और बहुत कोशिश से अपने होंठों को खींचकर गालों तक ले गयी । इतने में वेटर आया । शशि ने अपना फ़ेवरेट ‘क्लाउड 9’ पिज़्ज़ा, कोक और हिना ने ‘5 पेप्पर’ पिज़्ज़ा , लाइमसोडा आर्डर किया । शशि की ओर से पूरी तरह निश्चिंत होकर हिना की बातों का कारवां चल पड़ा । बातों के दौर चलते रहे और साथ में पिज़्ज़ा का मज़ा भी ।

लेकिन शशि जैसे मौका ढूंढ रही थी कुछ कहने का और पहला मौका मिलते ही बोली ‘वैसे तू ठीक कहती थी , मैं डरपोक हूँ, कायर हूँ और कमज़ोर हूँ । प्रभास के बारे में भी तू पूरी तरह से ग़लत नहीं थी ।‘ इतना सुनते ही हिना के हलक में पिज़्ज़ा अटक गया और उसने सहमी हुई टटोलती नज़रों से शशि के चेहरे और उसके शरीर को देखा । शशि ने मुस्कुराकर कहा, ‘कोई ज़ख्म नहीं है यार । अब प्रभास बहुत बदल गया है । हाँ, लेकिन शादी के शुरुवात के ४ साल बहुत मुश्किल थे । मैं बिलकुल अकेली पड़ गयी थी । जो भी मेरे साथ हो रहा था वो मैं किसी को बता तक नहीं पा रही थी । मैं अपने ही घर में नज़रबंद हो गयी थी । ख़तरनाक डिप्रेशन हो गया था । मन में प्रभास के प्यार को लेकर भी शक़ होने लगा था । प्यार में तो बिना कहे सामनेवाला सब समझ लेता है, सुन लेता है और देख लेता है लेकिन प्रभास तो…. ? मेरी तक़लीफें जब मेरे बीते कल के सपनों पर हंसती थी तो उन ठहाकों से मेरे कान बहरे होने लगते थे, मेरा दिल फटने लगता था । कई बार तो मैंने आत्महत्या तक सोच लिया था । पता है हिना, कितना भी गन्दा और मुश्किल दौर रहा हो मेरे मन में छुपी एक छोटी सी आस हमेशा कहती थी – बस कुछ देर और । मन के इसी चुलबुले जुगुनू ने मेरे अँधेरे से मुझे बचाया । लगता था कि अच्छे दिन दूर तो हैं पर इतने दूर भी नहीं । एक दिन सब ठीक हो जायेगा । सबको झूठा लगेगा लेकिन इसी विश्वास ने मुझे जिन्दा रखा । पहले मैंने हालातों को अपनी भूल, अपनी ग़लती का फल समझकर अपना लिया । लेकिन एक दिन अचानक लगा कि..कितनी सज़ा? कितना बड़ा गुनाह था कि सज़ा और प्राश्यचित खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे ? अब बस, और नहीं । और जब मैंने फैसला कर लिया कि मुझे जीना है तो ऊपरवाले ने भी मेरा साथ दिया और प्रभास का तबादला मुंबई हो गया । मैं कैदखाने से आज़ाद हो गयी ।‘ हिना ने एक गहरी सांस ली, इतनी देर से जैसे वो सांस लेना भी भूल गयी थी बस तेज़ धडकनों और पसीजी हथेली से शशि की आपबीती सुन रही थी । दोनों ने एक घूँट सॉफ्टड्रिंक का गटककर सूखे गले को तर किया और शशि ने अपनी बात जारी रखी ।

‘मुंबई की नमकीन, भीगी हवाओं ने मेरे घुटते जीवन और घुटती साँसों को ताज़गी से भर दिया । जीवन से हारने का ख्याल भी समुंद्र की ऊँची-ऊँची लहरें अपने साथ कहीं दूर बहा ले गयी । सच कहूं हिना, ऐसा लगा कि बहुत सालों की नींद से जागी हूँ । इतने सालों में जो कुछ भी बदल गया है उसे कौतूहल भरी नज़रों से देख रही हूँ और सबसे ख़ास बात कि जी रही हूँ । तब मैंने समझा कि मुझमे कुछ ऐसा है जिसपर प्रभास पागल हुआ था, मुझे प्रोपोज़ कर बैठा था और वो कुछ मुझमे आज भी है और वही असर आज भी रखता है प्रभास पर । यह भी समझ सकी कि कुछ ऐसा भी है मुझमे जो प्रभास को चिढ़ा देता है और वो अपनी सुध-बुध खो बैठता है ।‘ अपनी बात बीच में ही रोककर शशि खिलखिलाने लगी और बोली, ‘शादी अपने दुश्मन के साथ रहने का नाम है । ऐसा दुश्मन जो दोस्तों से भी प्यारा होता है । दिन-रात नयी रणनीति बनानी पड़ती है, कैसे-कैसे पैतरे इस्तेमाल करने पड़ते हैं ।‘ और फिर से एक उन्मुक्त हंसी रेस्तरां में गूँज उठी । शशि थोड़ी संजीदा होकर फिर से शुरू हुई, ’मैंने फ़ैसला किया कि यह समर मैं नहीं हारूँगी । साम, दाम, दण्ड, भेद सब इस्तेमाल करूंगी और जो कुछ बिगड़ गया है उसे वापस ठीक करूंगी । और कहते हैं ना-

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में,
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती ।
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।।

‘धीरे-धीरे मेरी कोशिशें रंग लाने लगी । मैं प्रभास को उसके गुस्से से अलग कर पायी और खुद को भी बदला मैंने । और जब कभी मैं थोड़ा मायूस होती थी तो तेरी डांट याद आती थी – ‘तू कायर है, डरपोक है, सच में अव्वल दर्जे की बेवकूफ है ।‘ और मैं खुद को बदलने के लिए फिर से जोश के साथ खड़ी हो जाती थी ।‘ आगे भी कुछ कहना चाहती थी शशि लेकिन हिना ने उसका हाथ दबाकर उसकी आँखों में अपनी पछतावे से भरी आँखें डालकर कहा, ‘माफ़ कर दे यार, ग़लती हो गयी थी । जानती है इतने सालों में मैं यही सोचती रही कि मैंने तुझे कायर, डरपोक क्यूँ कहा ? डरी हुई तो मैं थी, तुझसे कहीं ज्यादा । भाग तो मैं रही थी, तू तो डटकर खड़ी थी अपने विश्वास के साथ । तेरा वो फ़ैसला समझदारी वाला हो या न हो लेकिन हिम्मती था । बलि देने का ख्याल भी मज़बूत से मज़बूत लोगो को कमज़ोर कर देता है और तू इतनी धूमधाम से वो काम करने जा रही थी । तुझमे हिम्मत थी उस बलि के पार देखने की, कम से कम हौसला और विश्वास तो था कि उसके पार भी दुनिया होगी । मुझे तो वो दुनिया का आखिरी छोर समझ आया था । मैं इतने सालों डरती रही, कांपती रही और तू उस तूफ़ान से निकलकर उसे अपने पल्लू में चाभी की तरह लिए जी रही है । तूने मुझे ताक़त, हिम्मत और विश्वास का एक नया नाम, नयी पहचान दी है । तू समरसिद्धा है, साहसी है और उसपर बहुत कोमल और प्यारी भी है । मैं तुझसे एक बात कहना चाहती हूँ कभी खुद को गाली न आप देना और न किसी और को देने देना । आत्मसम्मान इंसान का सबसे सुन्दर और कीमती गहना है । इस गहने पर धूल न जमने देना ।‘ और एक बहुत गहरी,इत्मीनान की सांस भरकर हिना शशि का हाथ जोर से पकड़कर उसकी आँखों में देखती रही । शशि भी उसकी आँखों में अपनी नयी छवि देखकर अपने आप पर मुग्ध हो गयी । दोनों सहेलियां आँखों ही आँखों में एक दूसरे को सराह रही थी और एक दूसरे के भरोसे से खुद को भर रही थी ।

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