गिर गया झुमका, गिरने दो…३

पिछला हिस्सा : गिर गया झुमका, गिरने दो…२

छटपटाहट मालती के दिलो-दिमाग से छलांग लगाकर उसके पूरे वजूद पर छाने लगी । अब मालती के लिए अपनी हालत दुनिया से छुपाना मुश्किल होने लगा । किसी से तो कहना ज़रूरी है वरना मैं पागल हो जाऊंगी लेकिन किससे कहूँ ? कौन है जो मुझे बिना नैतिकता के तराजू में तोले मेरा दर्द सुनेगा ? कौन है वो ? कहाँ है वो ? बदहवास मालती पसीने में लथपथ कमरे में अपने हाथों से अपने सर पकड़े इधर से उधर तेज कदमों से टहल रही है । हाँ, मेरे रंग, मेरा कैनवस है , वो सुनेगा मुझे, वो समझेगा मुझे । दौड़ती हुई मालती गयी और कैनवस पर लाल रंग मलने लगी । धीरे-धीरे उसकी धड़कने वापस सामान्य हुई और उसने अपने लाल रंग से सने हाथों में कूची उठा ली । अब कूची कैनवस पर दौड़ रही थी शायद अपनी ही मरज़ी और अपनी ही चाल से । मालती भी कूची के काले जादू में रंगी कूची की हर हरकत और हर रंग में उसका साथ दे रही थी । बहत देर कैनवस पर दौड़ने के बाद कूची आखिरकार रुकी और मालती अपने होश में लौटी । कैनवस पर रंगों का ऐसा भयानक तांडव देखकर मालती सन्न हो गयी । ऐसा लगा मालती के अन्दर का सारा गुस्सा, तड़प और नकारात्मकता अपना बाँध तोड़कर कैनवस पर उभर आई हो । मालती धम्म से जमीन पर बैठ गयी और सोचने लगी की यह सब क्या हो रहा है ? मैं किससे लड़ रही हूँ और किसके लिए लड़ रही हूँ ? मैं बॉलीवुड के संवादों से लड़ रही हूँ या अपने आप से ? मैं समाज के किसी पूर्वाग्रह से लड़ रही हूँ या नैतिकता के पाश से ? क्या मुझे शर्मिन्दगी है दीपक से प्यार करने को लेकर ? नहीं, मैं शर्मिंदा नहीं हूँ और आज मैं खुद से सच बोलूँगी – हाँ, मुझे दीपक से प्यार हो गया है । अपने सच को अपनाते ही मालती के चेहरे पर जीत का रंग आ गया । दूर क्षितिज से नींद और सुकून दौड़े, दिनों की थकी हुई मालती को अपने आलिंगन में लेने । पलकें नींद ओढ़ कर ढलक गयी और सुकून होंठों पर सज गया । बहुत दिनों के बाद आज मालती बेसुध सोयी है और उसके चेहरे पर बच्चों सी निष्पाप, निष्कपट रंगत लौट आई है। एक दर्द से मालती जगी और किचन में जाकर मैगी बनाने लगी । उसे बहुत जोर की भूख लग आई थी ।

कैनवस को शांति से देखती हुई मालती मैगी और चाय का स्वाद ले रही थी । उसके होंठों पर एक मुस्कान खींचने लगी जो धीरे-धीरे खिलखिलाहट में बदल गयी । हालातों के जिस मजाक पर वो कल तक रो रही थी आज उन हालातों के साथ मिलकर खुद पर हंस रही थी । कितना हल्का महसूस कर रही थी, खुद को पूरी तरह अपनाकर, मालती । बीती बातें एक-एक करके उसके आँखों के सामने से गुज़रने लगी । किस दुनिया में जी रही थी मैं ! कितनी बार दीपक ने जताने की कोशिश की कि वो मुझसे प्यार करने लगा है और मैं हर बार उसे ‘कुछ भी, आप कुछ भी कह लेते हैं, हद है’ कहती और हँसी में उड़ा देती थी । कितनी बार दीपक ने कहा ‘मेरी मानो एक लड़का और एक लड़की सिर्फ दोस्त नहीं रह पाते’ और वह हर बार हँसती, बहस करती थी । दीपक के मज़ाकिया मिज़ाज के कारण कभी उसने दीपक की बातों को संजीदगी से लिया ही नहीं । उसे खुद से भी तो उम्मींद नहीं थी कि उसे एक बार फिर से प्यार हो जायेगा । एक गहरी साँस लेकर उसने चाय का कप अपने होंठों से लगा लिया ।

जो हुआ अच्छा ही हुआ । इस प्यार का कोई अंजाम होना ही नहीं था । दीपक अपनी पत्नी और अपनी बेटी से बहुत प्यार करता है । उसका परिवार उसकी जीवन रेखा है । अगर मालती दीपक के दिल में एहसास की तरह है तो दीपक का परिवार उस दिल की धड़कन की तरह । एहसास जताये बिना इंसान जी सकता है पर धड़कन के बिना……… ओह दीपक! तुम्हें भी कहाँ अंदाज़ा रहा  होगा कि हँसी-हँसी में हम दोनों इस मोड़ तक आ पहुँचेंगे । प्यार ही तो था मुझसे कि बीवी की नाराज़गी के बाद भी तुम मुझसे बातें करते रहे और उसे भी समझाने की कोशिश करते रहे । तुम कैसे हो दीपक ? इस ख्याल से थोड़ा बैचेन हो गयी मालती । ऑंखें मुंदी, हाथ खुद ब खुद जुड़ गए और दुआ दिल से निकलकर होंठों तक आई, ‘ऊपरवाले, दीपक को संभालना’ । अपने ही एहसासों के भंवर की उथल-पुथल में मालती सोच ही नहीं सकी कि दीपक कैसा होगा । दीपक की तकलीफ़ मालती की तकलीफ़ से कहीं ज्यादा थी । कितना मुश्किल है अपने ही परिवार की नज़रों में गुनहगार के तरह होना और कुछ न कर सकना । दीपक, दुआ करती हूँ कि तुम भी जल्दी अपने सच से सुलह कर लो और हालातों पर रोने की जगह हँसना शुरू कर दो । मुझे भुलाने की कोशिश मत करना वरना यह तड़प जीना दुश्वार कर देगी । दीपक, इश्क़ करना इंसान का इरादा नहीं होता यह तो कुदरत का फ़ैसला है जिसके बाद कोई और फ़ैसला नहीं होता । कुदरत ख़ुद चुन लेती है उन मज़बूत लोगों को, इस तोहफे से नवाज़ने के लिए, जो दिल में तूफ़ान समेटना जानते हैं । जो ग़म के बादलों को हँसी की धूप से भेद लेना जानते हैं । जो सूरज की तरह हर पल खौलते हैं, धधकते हैं, आग-आग हो जाये चाहे पूरा वजूद मगर फिर भी दुनिया को रोशन कर जाते हैं, जीवन दे जाते हैं । इश्क़ कब दुनिया के साँचे में खरा उतर पाया है ? इश्क़ तो नाम है बग़ावत का, इबादत का, जूनून का और वहशत का । इसलिए मैं दुआ करती हूँ कि तुम अपने प्यार पर खुद को शर्मिन्दा महसूस मत करना ।

मुझे तुम याद करना और मुझको याद आना तुम

अगर दिल छटपटाए तो खुलके खिलखिलाना तुम

दुआ करती हूँ कि तुम्हारे परिवार में फिर से वही खुशियाँ, तसल्लियाँ और भरोसा लौट आये, जो इश्क की क़यामत आने से पहले हुआ करते थे । लेकिन हाँ, तुम्हारी पत्नी के लिए इस इश्क़ को समझना शायद कभी मुमकिन नहीं होगा क्यूंकि इश्क़ का रुतबा इश्क़ ही जाने । यह समझदारों की दुनिया नहीं आग से खेलनेवाले बददिमाग, बदनाम, बदहवास दीवानों की दुनिया है । मालती ने एक नया गीत छेड़ा इश्क़ का रुतबा इश्क़ ही जाने…

पाठकों, आप भी सुनिये फिल्म कारतूस का बेहद खूबसूरत गीत जिसे गाया है नुसरत फ़तेह अली खान ने…  इश्क़ का रुतबा..नुसरत साहेब

 

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