गिर गया झुमका, गिरने दो…२

पहला  भाग : गिर गया झुमका …गिरने दो

मालती खुद को बहलाने की बहुत कोशिशें कर रही थी- पूरी ईमानदार कोशिश । मगर काँटा ऐसा चुभा था कि चुभन कम ही नहीं हो रही थी । कभी मालती को लगता कि वो दर्द को आँखों के रास्ते बह जाने दे तो शायद बेहतर लगेगा और वो सर झुका कर आँसू बहाने लगती लेकिन हालत में बदलाव नहीं आता था ।अपने आंसूओं में वो खुद ही न बह जाये इस डर से वो हडबडाकर आँसू पोछ लेती । फिर कुछ अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ती और उससे भी न बहला सके खुद को, तो बहरा कर देने वाली आवाज़ में गाना सुनती

‘ओ रे पिया रे, घिस गए सारे दर्द भरे नगमे
अब रैप-वैप सा रॉक-वोक सा बजता रग-रग मे
पिया मूव ऑन, मूव ऑन, मूव ऑन
ओ पिया मूव ऑन, मूव ऑन, मूव ऑन’

गाना रिपीट मोड में चलता जाता, मालती पहले कूद-कूद कर नाचती, फ़िर चिल्ला चिल्लाकर गाती और आख़िरकार डबडबायी आँखों और क़दमों की थमती थिरकन के आगे खुद को हारा हुआ महसूस करती । खुद को भटकाने की लाख कोशिशें करती लेकिन वो भी सूरदास हो गयी थी –

‘ मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥ ‘

पता नहीं मालती क्या सोचने और महसूस करने से डर रही थी ! करन जौहर, शाहरुख़ खान और हिंदी सिनेमा के वो सारे घिसे  पिटे संवाद जो बार-बार कहते हैं ‘एक लड़का और एक लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते’ इस सबको जलाकर राख कर देना चाहती थी वो । इनको इतिहास के पन्नो से हमेशा के लिए साफ़ कर देना चाहती थी वो । इन्हीं घटिया किस्म के संवादों और सोच की वजह से उसने अपना झुमका खो दिया । ‘मुझे वही झुमका वापस चाहिए’ उसका मन बार-बार चीख़ कर यही कहता था । उसके गीत भी बदल गए –‘ ढूँढो ढूँढो रे साजना मेरे कान का बाला, मेरा बाला चंदा के जैसा हाला रे..’ खुद से जूझती, लड़ती मालती अब थकने लगी थी ।

उसे अपने रंगों की याद आई । उसके रंगों से प्यार ने उसे हमेशा एक दरवाज़ा दिया उसके एहसासों को बाहर निकालने का, कुछ नया रचने का और सुकून महसूस करने का । उसके क़दम अपने कैन्वस और रंगों की तरफ बढ़ गए और उसने फैसला किया कि आज वो कैन्वस को गंदे भद्दे रंगों से भर देगी । लेकिन हाय!! जैसे ही कैन्वस याद आया झुमका भी याद आ गया । उन दोनों की मुलाक़ात ऑनलाइन आर्ट प्रतियोगिता में ही तो हुई थी । दीपक बहुत अच्छा चित्रकार भी था और मालती अभी सीख ही रही थी । मालती ने जब दीपक को अपने चित्र दिखाए तो दीपक ने खुले दिल से उसकी तारीफ़ की थी । उफ़्फ़! कहाँ जाये वो ? अब तो रंगों की दुनिया भी अकेले उसकी नहीं रही । हाथों में कूची उठाई तो मगर हाथ कांपने लगे । डर गयी मालती कि न जाने कूची अपने आप क्या बना देगी । शायद कुछ ऐसा जिससे मालती नज़र चुराने की हर मुमकिन कोशिश कर रही है । कूची हाथों से छूट गयी और मालती वहीँ बैठ गयी – खुद से नाराज़ मालती ।

खुद से कई बार बहस करती मालती कि यह फ़िल्मी बातें बकवास हैं, कचरा हैं । दीपक ने जब एक बार उससे कहा था कि एक लडके और एक लड़की के बीच प्लेटोनिक लव जैसा कुछ नहीं होता, तो उसने कितनी बहस की थी । बेबाकी और आत्मविश्वास से उसने दीपक से कहा था- मैं तुमसे प्यार करती हूँ लेकिन वो प्यार जो एक दोस्त के लिए होता है,  यह लड़का लड़की वाला प्यार आलरेडी मेरे जीवन में है । अब जब वो यही बात खुद से कह रही थी तो वो आत्मविश्वास साथ क्यूँ नहीं दे रहा ? चलो मान लिया कि फ़िल्मी बातें, फ़लसफ़े सही हैं तो शाहरुख़ खान ने कहा है- ‘हम एक बार जीते हैं, एक बार मरते हैं और प्यार भी एक बार ही करते हैं’ तो…….??????……. वो एक बार प्यार कर चुकी है दीपक से पहले किसी और को । यह वाला संवाद ज्यादा सटीक है…उसे दीपक से प्यार नहीं है….मतलब प्यार है लेकिन दोस्ती वाला ।

कभी मालती खुद से बातें करती कि जब सालों पहले उसकी सबसे अच्छी सहेली उससे छूट गयी थी तो मालती कितना रोई थी । महीनों दुआ मांगी थी कि सहेली लौट आये और सब कुछ पहले जैसा हो जाये। खुद से वादा भी किया कि दोबारा वैसा कुछ नहीं करूंगी कि वो नाराज़ हो जाये । तो अगर मालती आज दुखी है तो यह उलझन क्यूँ है ? यह कुछ अलग क्यूँ है ? मालती बस दीपक का नाम लेकर रोना चाहती है । दीपक की याद तो बहुत आती है लेकिन यह दुआ करने में उसके होंठ कांपते हैं कि दीपक लौट आये । क्यूँ लगता है कि कुछ भी पहले जैसा नहीं होगा ? आखिर दीपक के लौट आने के ख़याल से मालती डर क्यूँ रही है ? और इतना सब कुछ गड़बड़ है तो मन के एक कोने में क्यूँ चाह छुपी है कि दीपक लौट आये ?

कभी गुस्से में धधकती मालती सोचती है कि एक बार बस एक आखिरी बार दीपक उसे कहीं मिल जाये तो यह सारा गुस्सा, दर्द और यह बेबसी वो दीपक के मुहं पर तमाचे की तरह दे मारे । ऐसा बेरहम तमाचा जो उसके सारे ज़ज्बातों को बिना किसी नरमी की गुंजाइश के दीपक के चेहरे पर उतार दे । और मालती उसका कॉलर खींचकर उसे झकझोरकर कहे, इतनी बातें करते थे कम से कम इतना कहा होता कि होने लगा मुझसे प्यार है । क्यूँ दूसरे यह बताते हैं मुझे ? क्यूँ ? या तो कह दो यह झूठ है या कह दो कि मुझे गलत साबित करने के लिए ही तुम मेरी ज़िन्दगी में आये थे । मुझे गलत साबित करने का कैसा जूनून था यह कि तुम्हें दोस्ती का भी ख्याल नहीं आया । तुम दोस्ती के लायक नहीं थे । मैं नफ़रत करती हूँ तुमसे । या मेरा हाथ पकड़कर मुझे समझा दो कि यह झूठ है । एक बार बस एक आखिरी बार मिल जाओ मुझे, सोचते-सोचते गुस्से में मालती ने अपनी पूरी ताक़त से अपनी मुट्ठी में अपने कानों को कसकर भींच लिया और एक तीखा दर्द उसकी आँखों से रिसने लगा । रोते हुए मालती गाने लगी ‘ गिर गया झुमका, गिरने दो… चुभ गया काँटा, चुभने दो’ लेकिन आज अंदाज़ ऐसा था जैसे खुद पर फिकरा कस रही हो ।

अंतिम भाग : गिर गया झुमका, गिरने दो…३

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