गली जहाँ से ज़माने को गुज़रे ज़माना हुआ अब भी सांस लेती है

हर तरफ़ आवाज़ें हैं, तरह-तरह की आवाज़ें ।

कुछ आवाज़ें जो बहुत अच्छी लगती हैं, कुछ जो नापसंद होती हैं, कुछ जो इस कदर आदत में शुमार हो जाती हैं कि उनका ख़ामोश हो जाना उनके होने का एहसास कराता है और कुछ आवाज़ें हैं जो इन ख़ामोशियों से जन्म लेती हैं । कल कुछ आवाज़ों के ख़ामोश हो जाने और नयी आवाजों के बुलंद होने का दिन था । कल पूरे १३ घंटे पॉवर कट रहा । भोर से बोझ ढोते-ढोते दुपहर तक सोसाइटी का जनरेटर भी प्यास से बिलखने लगा । उसके सूखे गले ने आवाज़ करने और कन्धों ने बोझ उठाने से मना कर दिया । मुँह बनाकर बोला- पहले डीज़ल दो, वरना मैं नहीं चलूँगा, हाँ   ।

सबसे पहले सबने उसके ख़ामोश हो जाने को सुना और फिर यह सन्नाटा फैलने लगा । पंखे चुप, वाशिंग मशीन चुप, कंप्यूटर चुप और सबकी चुप्पियाँ चुपचाप बातें कर रही थीं । बच्चों के स्कूल से आने का वक़्त हो गया और १७ माले की बिल्डिंग की लिफ्ट चुप । सौभाग्य से मैं 11 माले पर रहती हूँ तो इतना ही उतरना पड़ा और पहली बार मैंने सुना सीढ़ियों का संगीत । सीढ़ियों पर इतने सारे लोग, अपने-अपने बच्चों को लेने जाते लोग । कुछ घुटने पकड़कर जाते सुस्त क़दम तो कुछ धडधडाते हुए जाते क़दम । कुछ लोगों के बोलने की आवाज़ और किसी के गुनगाने की आवाज़ ।

ना जाने क्यूँ अच्छा लगा !

नीचे पहुँची तो हवा की सरसराहट की आवाज़, गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ और शिक़ायतों की आवाज़ ।

ना जाने क्यूँ अच्छा लगा !

बच्चे लौटे तो आज सीधे पार्क पहुँचे । पहली बार देखा इतने बच्चे हैं सोसाइटी में! बच्चों ने अपने बैग छोड़े और खेलना शुरू कर दिया । बहुत समय बाद देखा इतने बच्चों का हुडदंग, इतनी किलकारियाँ और इतनी बेफिक्रियाँ । यक़ीन हुआ कि आज भी बचपन वैसा ही है जैसा तीन-चार दशक पहले होता था । आज भी बचपन बोलता है अगर ख़ामोशी पसरी हो तो वरना बचपन डोरेमोन और कंप्यूटर गेम्स की आवाज़ों में ख़ामोश मज़े से तैरता है । आज भी बचपन मिलनसार है अगर उसे वर्चुअल  दोस्त न मिले तो  । आज भी बचपन खेल बना लेता है बिना खिलौने के और आज भी उसमे नए-नए खेल ईजाद करने का जज़्बा साँस लेता है ।

अच्छा लगा !

भूखे बच्चे और प्यासा जेनरेटर, इन्ही दोनों ने सारी लाइमलाइट ली हुई थी बड़ों की बातों में । धीरे-धीरे सबने चढ़ने का मन बनाया और बच्चे कूदते हुए सबसे आगे चल दिए । इस बार सीढ़ियों पर दोनों तरफ़ की आवाजाही मिली । अचानक एक आवाज़ आई “चढ़ते चलो, चढ़ते चलो” देखा तो उतरते हुए एक महिला यह चढ़ने वालों को कह रही थी । एक मुस्कान खिंच गयी चहरे पर कि अमूमन लिफ्ट में ख़ामोश रहने वाले लोग सीढीयों पर बुलंद आवाज़ हो जाते हैं ।

मशीनों की चुप्पी को तोड़ती हर तरफ़ इंसानी आवाज़ें । मशीनों के रुकने पर चलते इंसानी कदम । मशीनों के सोने से जगे इंसानी जज़्बात । ऐसा लगा हर किसी के अन्दर मशीन बन चुका हिस्सा वापस इंसान बन गया है ।

अच्छा लगा !

आवाज़ें…कितना कुछ कहती आवाज़ें ! कितने राज़ खोलती आवाज़ें ! कितनी बंदिशें तोड़ती आवाज़ें ! कितनी खिड़कियाँ खोलती आवाज़ें !

कई परदों ने कल पहली बार शायद खिड़की के बाहर कदम निकाला, शायद पहली बार कुदरती हवा में झूमे । कई बच्चों ने कल पहली बार बालकनी और कमरे को जोड़ते दरवाज़े के पास बैठकर धूप से आँखमिचोली खेली ।

ना जाने क्यूँ अच्छा लगा और अनजाने ही यह गाना मेरे होंठो पर था….

ख़ामोशियाँ आवाज़ हैं तुम सुनने तो आओ कभी

छूकर तुम्हें खिल जाएँगी घर इनको बुलाओ कभी

बेक़रार हैं बात करने को, कहने दो इनको ज़रा

ख़ामोशियाँ………लिपटी हुई ख़ामोशियाँ

एक ज़माने के बाद ऐ लाइट तेरा जाना न जाने क्यूँ अच्छा लगा !

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