पहला बहाना…पहला हमेशा ख़ास होता है

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हेल्लो!
जी कहिये.
मैं मीरा की क्लास टीचर बोल रही हूँ. उसके पेट में दर्द है. क्या आप उसे लेने आ सकती हैं?
जी, क्या मैं आपको दोबारा कॉल कर सकती हूँ, अगले ५ मिनट में?
ओके.
फ़ोन रखते ही मैंने अपने पति को फ़ोन किया और बताया कि मैं बेटी को लेने स्कूल जा रही हूँ. उन्होंने पूछा – कैसे जाओगी?
मैंने कहा – ऑटो
ठीक है. फ़िर बताना.
मैंने टीचर को कॉल किया और कहा कि अगले 30 मिनटों में मैं स्कूल पहुँच जाऊँगी. हडबडाकर तैयार हुई, पेट दर्द की दवा ली और ऑटो किया. ऑटो में बैठकर सोचा कहीं बहुत बुरी हालत हुई तो कहाँ दिखाने ले जाऊँगी? हम इस शहर में अभी नए-नए शिफ्ट हुए हैं और यहाँ के बारे में कुछ नहीं पता. तुरंत ही अपनी एक सहेली का ख्याल आया जो इसी शहर में रहती है. बिजली की तेजी से मेरा हाथ मेरे मोबाइल तक पहुँचा और मैंने उससे डॉक्टर्स के नंबर और पते मेसेज करने को कहा. कुछ ही देर में मेरे मोबाइल पर जानकारी आ गयी.
मैं बार बार टाइम देख रही थी जैसे कोई गरीब अपनी कमाई की पाई पाई का हिसाब रखता है बिल्कुल वैसे ही. हर बार टाइम देखकर खुद से कहती १ मिनट में मैं २ सोसाइटी पार कर गयी. इन आंकड़ों का कोई अर्थ नहीं है मगर आकुलता में जबरन ही दिमाग समय गिन रहा था. बीच-बीच में सोच रही थी बेटी से कैसे मिलूँगी- घबरायी हुई, मुस्कुराकर, या सवालिया नज़रों के साथ स्ट्रैट फेस लिए? घबराहट जाहिर करके मैं शायद परिस्थितियों को बदतर ही करूँगी. मेरी बेटी को इस समय सहारा चाहिए –एक मज़बूत सहारा. नहीं नहीं, घबराहट और चिंता नहीं दिखनी चाहिए मेरे चहरे पर. तो क्या स्ट्रैट फेस? मैं अमूमन अपनी बेटी से मुस्कुराकर मिलती हूँ, स्ट्रैट फेस उसकी व्यग्रता को शायद बढ़ा दे. नहीं नहीं, ऐसा कोई बदलाव लाने का यह समय नहीं है. मुझे उससे नार्मल ढंग से ही मिलना चाहिए मुस्कुराते हुए. लेकिन कहीं मेरी मुस्कुराहट उसे आहत न कर दे. असंवेदनशीलता न लगने लगे कि मेरे पेट में दर्द है और माँ मुस्कुरा रही है. तो कैसे मिलूँ उससे?
विचारों का सूत्र बार-बार फिसल कर घड़ी पर जा टिकता. और नए आकड़े इकट्ठा करता कि कितने समय में कहाँ तक पहुँच गई. नज़र घड़ी से हटती तो नयी विचार श्रंखला शुरू हो जाती. पता नहीं वो रोती हुई, आँसू बहाती हुई आयेगी या पेट पकड़कर धीरे-धीरे चलती हुई आएगी? अक्सर जब बच्चे किसी तरह की परेशानी में होते हैं तो माँ से चिपक जाते हैं. मेरी बेटी की लम्बाई अब इतनी हो गयी है कि मैं उसे आराम से गोद में नहीं ले पाती. उसे अपने पैरों से मेरी कमर को बांधना पड़ता है गोद में टिके रहने के लिए. और पेट दर्द में तो ऐसे गोद में आना और भी मुश्किल है. क्या करूँ? हाँ, मैं घुटनों के बल बैठ जाऊँगी और उसे गले लगा लूँगी. फ़िर धीरे से सोफ़े पर बिठा लूँगी.
अगर वो बहुत दर्द में होगी और मुझसे कहेगी कि – माँ बहुत दर्द हो रहा है, तो मैं कहूँगी –मैं दवा लायी हूँ, पी लो, थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा. तुरंत ही मेरे मन में संदेह आया कि पता नहीं यह दवा इस दर्द में भी काम करेगी या नहीं. पिछली बार तो इससे फ़ायदा हुआ था. चलो दर्द में फ़ायदा नहीं भी हुआ तो साइकोलॉजी को तो फ़ायदाहोगा कि दवा ली है ठीक हो जाऊँगी. और मुझे वक़्त मिल जायेगा उसे डॉक्टर के पास ले जाने का बिना उसकी बैचेनी को बढ़ाये. हाँ, यह ठीक रहेगा ऐसा ही कहूँगी मैं.
गहरी साँस लेते हुए मैंने फ़िर घड़ी को देखा और अपने पति को फ़ोन किया- मैं मीरा के स्कूल पहुँचने वाली हूँ. उन्होंने कहा- ओके. कुछ देर बाद मैं स्कूल के रिसेप्शन पर थी. मैंने अपनी घड़ी देखी, मैं बात होने के २८ मिनट बाद स्कूल पहुँची थी. अब मैं रिसेप्शन में बैचेनी से टहल रही थी और गहरी गहरी साँसे भरकर अपने आप को तैयार कर रही थी अपनी बेटी से मिलने के लिए.
तभी मेरी बेटी सामने से आती दिखी. मैं उसे देखकर हैरान हो गयी. वो बिल्कुल सामान्य ढंग से चल रही थी और एक हाथ धीरे से पेट पर रखा हुआ था. आँखों से ख़ुशी छलकने को बेकरार थी और होंठों पर एक दबी हुई मुस्कान थी. यह देखकर मेरे भी मन में ख़ुशी के लड्डू फूट रहे थे और मेरे होंठों पर भी एक दबी हुई मुस्कुराहट आ गयी थी. किसी तरह ख़ुशी को छुपाते हुए मैंने पूछा- क्या हुआ मेरी बेटी को?
पेट दर्द.
मेरी बेटी रो रही थी?
नहीं, बस ऐसे ही बैठी थी. मेरी इंग्लिश वाली टीचर बहुत गुस्सा करती हैं. मेरा थोड़ा सा वर्क रह गया था. जल्दी लिखने में हैण्ड राइटिंग खराब हो जाती है, तो मैं धीरे धीरे लिख रही थी. फिर उन्होंने पूछा चिल्लाकर कि क्या हुआ. मैंने बता दिया कि पेट में दर्द हो रहा है.
हम्म्म, तो दर्द नहीं हो रहा था?
नहीं, थोड़ा सा हो रहा था. यह कहते कहते उसने मेरी गोद में अपना चेहरा और अपनी चुगलखोर हंसी छुपा ली.
रिसेप्शन पर मैंने भी ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की और उसके बाल सहलाने लगी और कहा कि थोड़ी देर में ठीक हो जायेगा. रिसेप्शन वाली मैडम हम दोनों की तरफ ही मुख़ातिब थी तो मैंने ड्रामे में बेटी का साथ दिया और हम दोनों कुछ देर में स्कूल से चल दिए.
पूरे रास्ते ऑटो में खूब चहकती हुई वो घर आई. मैं सोच रही थी चलो अच्छा हुआ जबरन दवा नहीं खिला दी मैंने. अब यह सोचकर हंसी भी आ रही है कि मेरी बेटी को बिदके घोड़ों को नकेल पहनाना आ गया है. अपने लिए थोड़ी सी चिंता भी हुई कि न जाने कब मेरा नंबर आ जाये?
खुश हूँ यह जानकर कि खुद को बचाने का तरीका ढूँढने की काबिलियत मेरी बेटी में आ गयी है. दुखी हूँ यह जानकर कि आज भी कुछ टीचर समझते हैं कि चीखने चिल्लाने और सख्ती बरतने से बच्चे पढ़ाई में मन लगाते हैं.
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