आनंदी और गोपाल- भाग २

गोपाल के ग्रेजुएट होते ही भाई और माता पिता दोनों ने अपनी अपनी पसंद गोपाल के सामने रखी। माँ ने गोपाल के बड़े भाई से  कहा “ मुझसे अकेले इतनी खेतीबाड़ी नहीं संभलती। तू तो अपनी बीवी को साथ लिए घूमता है। मुझे छोटी बहू ऐसी चाहिए जो घरबार संभाल सके।” गोपाल बहुत अच्छी तरह जानता था कि उसके माँ पापा ने कितने प्रयासों से उसकी पढाई जारी रखी थी। माँ ने अपने गहने गिरवी रखे थे और हर महीने पापा लकड़ी काटकर मिले रुपये उसके हॉस्टल देने आते थे… मीलों पैदल चलकर। बड़े कष्ट उठाये थे उन दोनों ने गोपाल के लिए। तो क्या गोपाल से मदद की उमींद करना ग़लत था उनका ? परिवार में सभी एक दूसरे का आश्रय होते हैं और ऐसी अपेक्षा करना ग़लत तो नहीं है। यह सब सोचकर गोपाल ने निर्ममता से अपने कोमल रंगीन सपने कुचल डाले और आनंदी से शादी के लिए बिना उसे देखे ही हाँ कर दी। दोनों पक्ष के घर वाले इस बात से बहुत खुश हुए कि कुण्डली में 32 गुणों का मिलान भी हो गया, अब कोई बाधा न थी।

आनंदी को उसके मेहनती और खुशमिज़ाज़ होने की वजह से गोपाल जैसा अनन्य वर मिल रहा था जिसके जैसा आस पास के गाँवों में कोई न था। आनंदी मात्र 17 साल की थी तब। दुनियादारी से बेख़बर और शादी ..इसके बारे में तो सोचा ही नहीं कभी। लेकिन जब बात चली शादी की तो उसके किशोर मन में प्रेम के बीज अंकुरित होने लगे। गोपाल में उसे अपना प्रेम दिखने लगा हालाँकि यह बात और है कि अब तब उसने गोपाल को बस कानों से ही देखा था। यूँ तो गोपाल को भी एक ऐसी लड़की मिल रही थी जिसकी कामना न जाने कितने कर रहे थे। यह दोनों ही अपनी-अपनी दुनिया के सेलेब्रिटी थे और इन दोनों की दुनिया में कोई तालमेल नहीं था। कैसी अजब विडम्बना थी यह कि इस विवाह से जहाँ आनंदी के मन में कोमलता बढ़ रही थी वहीँ गोपाल के मन में निर्ममता घर कर रही थी। एक घटना आनंदी को और भी ज्यादा खुशनुमा और जीवंत बना रही थी वही घटना गोपाल को हिंसक और लाश बना रही थी।

आनंदी ढेरों सपनों की डोली में सवार गोपाल की ज़िंदगी में आई और आँसुओ में डूबा गोपाल अपने सपनों की लाश पर खड़ा आनंदी को देख ही नहीं सका। विवाह के फ़ौरन बाद नौकरी की बात पर आनंदी को अपने माँ पापा के पास छोड़कर शहर चला गया। और जो कुछ घट चुका था शायद उससे समझौता करने की कोशिश कर रहा था या फ़िर उसे भूलने की कोशिश करने लगा। इधर आनंदी ने पूरी खेतीबाड़ी संभाल ली। आनंदी नवयौवना थी उसने कभी काम से जी चुराने की कोशिश नहीं की और न कभी बहुत सा काम होने की शिकायत की। वो काम काज करते हुए बस यही सोचती कि गोपाल की नौकरी लग जाये तो वो गोपाल को देख सकेगी और शायद उसके साथ कुछ समय के लिए रह भी पायेगी। उसकी सुबह शाम की पूजा में बस एक ही प्रार्थना होती कि, ‘हे शिव शंभू! गोपाल को नौकरी दिला दो’। एक दिन माँ पापा का त्याग, आनंदी की प्रार्थना और गोपाल की मेहनत रंग लायी। गोपाल को नौकरी मिल गयी थी वो भी सरकारी नौकरी। आनंदी का मन झूम उठा और गोपाल से मिलने की कल्पना से वो खिलती ही जा रही थी।

गोपाल को जब तक नौकरी नहीं मिली थी तब तक वो अपना सारा मन और मेहनत नौकरी ढूँढने में खपा रहा था। इसका एक फायदा था कि उसे एक बुरे सपने सी हुई अपनी शादी इतनी याद नहीं आती थी। अब नौकरी लग जाने के बाद यह बुरा सपना उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। वो गाँव कभी लौटकर जाना ही नहीं चाहता था। मिटा देना चाहता था अपना अतीत। एक पल में उसने निर्णय तो कर लिया शहीद होने का मगर यह न समझ पाया कि शहादत जान ले ले तो आसान होती है, कम से कम शहीद के लिए। लेकिन ऐसी शहादत जो जान भी न ले और जीने भी न दे वो भयावह होती है। शहीद का गुणगान होता है लेकिन जो जीता जगाता शहीद हो उसका क्या गुणगान ? कई बार तो लोगो को पता ही नहीं होता कि सामने एक शहीद है वो तो उसे अपने जैसा साधारण व्यक्ति समझकर ही व्यवहार करते हैं। तो हमारा गोपाल शहीद भी हुआ और किसी ने न तो शहादत को श्रद्धा सुमन ही न चढ़ाये और न ही कोई जिक्र किया उसकी महानता का। गोपाल को दुनिया की यह उदासीनता और भी चिढ़ा गयी और हँसता खेलता गोपाल पहले शहीद गोपाल और फ़िर चिढ़ा हुआ हिंसक गोपाल बन गया।

आनंदी जीवन में आये इन अजीबोगरीब घटनाक्रमों को समझ नहीं पा रही थी। क्यूँ नौकरी लग जाने के बाद भी गोपाल उसे अपने साथ कुछ दिनों के लिए ले नहीं जाता है? क्यूँ वो कई कई बुलावों के बाद गाँव आता है? उसने कभी कामना न की थी कि उसे ऐसा विरला गुणवान पति मिले। जब नियति से उसे ऐसा पति मिला तो उसने प्रभु को धन्यवाद किया और उसे गोपाल से प्रेम हो गया। ससुराल में सबकी इच्छाओं का मान किया। फ़िर क्यूँ उसके साथ ऐसा हो रहा है? क्यूँ गोपाल के साथ उसे ऐसा लगता है जैसे गोपाल उससे नफरत करता है? क्यूँ गोपाल उसे उसके अनपढ़ होने से अलावा भी कुछ नहीं समझ पाता है? यदि इतनी ही चाह थी पढ़ी लिखी लड़की की, तो आनंदी से शादी करने की क्या मजबूरी थी? क्यूँ गोपाल ने अपनी ज़िन्दगी बर्बाद का कारण आनंदी को समझ लिया है? इन सवालों के दंश आनंदी को घायल करने लगे। वो किससे अपनी व्यथा कहे और किसको जिम्मेदार ठहराये अपनी इस हालत के लिए? आनंदी धीरे-धीरे भीतर ही भीतर घुट रही थी कि एक दिन माता पिता के जोर देने पर गोपाल आनंदी को शहर साथ ले गया। आनंदी को लगा कि अब उसे पति के साथ समय बिताने का अवसर मिलेगा तो वो दोनों एक दूसरे को समझ पाएंगे और सब कुछ ठीक हो जायेगा।

क्या सब कुछ ठीक हो पाया ? जानने के लिए पढ़े अगला भाग.

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