आनंदी और गोपाल- भाग १

आनंदी, जैसा नाम वैसा स्वभाव। हमेशा आनन्द में रहने वाली आनंदी। उसके पिता दूध का कारोबार करते थे। गाँव भर में दूध बाटना और पास की हाट के दुकानदारों को दूध, दही और घर का बना शुद्ध घी मुहय्या कराना उनका काम था। इसमें आनंदी के दोनों बड़े भाई भी उसके पिता का हाथ बटाते। वैसे भी गाँव में पढ़ाई-लिखाई को कोई खास महत्ता नहीं दी जाती। जिसकी कई वजहों में से एक वजह है कि कई गाँवों के बीच एक स्कूल है वो भी २५ किलोमीटर दूर। दूसरी वजह यह कि पढ़े लिखे नवयुवक गाँव छोड़कर जीविका के लिए शहर चले जाते हैं और इसकी वजह से परिवार का कुटीर उद्योग, खेतीबाड़ी सब चौपट से हो जाते हैं। तीसरी वजह यह है कि खेतीबाड़ी, दूसरे लघु उद्योग ग्रामीणों को स्वावलंबी बनाने में सक्षम हैं और गाँव वालों की जो छोटी-छोटी ज़रूरतें हैं वो उससे बखूबी पूरी हो जाती हैं । किसी को नौकरी से मिलने वाली आय का कोई लोभ नहीं है। यह मानसिकता वैसे शहरों में भी देखने को मिलती है, लोग ज्ञानार्जन के लिए बच्चों को स्कूल नहीं भेजते बल्कि नौकरी करनी है आगे चलकर ऐसा सोचकर भेजते हैं। तो भई जिसकी मजबूरी हो वो भेजे स्कूल बच्चों को और जिसका काम बिना नौकरी चल रहा हो वो इसे एक गैरजरूरी विकल्प मान ले। गाँव के बाकी परिवारों की तरह आनंदी और उसके भाई बहनों ने कभी स्कूल का मुँह न देखा था। और यह बहुत ही सहज, समझदारी भरी बात थी, किसी विस्मय का कारण नहीं। आनंदी के पिता और भाई दूध व्यवसाय संभाल रहे थे और घर की औरतें खेतीबाड़ी संभाल रही थीं। लडकियाँ नदी से पानी लाने, मवेशियों की रहने की जगह व्यवस्थित करने, उनके चारे का प्रबन्ध करने, चूल्हे के लिए लकड़ी लाना और परिवारजनों के लिए खाना बनाने का काम संभालती थीं। इतने काम होते हैं गाँव में कि कितने भी हाथ हों करने वाले, कम पड़ जाते हैं और शायद इसीलिए गाँव वाले परिवार नियोजन को भी कोई महत्तव नहीं देते। हमारी आनंदी भी कुल मिलाकर 8 भाई बहन थे।

जब आनंदी की बड़ी बहन की शादी हुई तो मवेशियों के खाने पीने का प्रबन्ध और लकडियाँ लाने का काम आनंदी को हस्तांतरित हो गया। १४ वर्ष की आनंदी सुबह ५ बजे दराती, रस्सी, सर पर रखने वाली एक छोटी सी गद्दी, बासी रोटी और रात की बची सब्जी लेकर जंगल की ओर चल पड़ती। जंगल गाँव से तकरीबन २० किलोमीटर की दूरी पर था। आनंदी दिन में दो चक्कर लगाती घर से जंगल तक। पहली बार में ताज़ी, रसीली हरी-हरी घास लाती और दूसरी बार में लकडियाँ लाती। यूँ तो गाँव वालों ने उसकी बहन की भी यही दिनचर्या देखी थी मगर आनंदी के इतने बड़े गट्ठर को देख सबकी आँखें हैरत से फैल जाती थी। ऐसा आश्चर्य कि आस पास के गाँवों में भी आनंदी की चर्चा होने लगी। जिन घरों में विवाह योग्य पुत्र थे वो सब आनंदी को अपने घर ब्याह के लाना चाहते थे। आनंदी बहुत जी लगाकर काम करती और आते जाते कुछ गाती रहती। आस-पास के कई गाँव मिलकर फसल काटने के बाद सालाना जलसा करते थे। उस मेले में अक्सर आनंदी गाना गाती या डांस करती थी। इस वजह से वो ज्यादातर युवको की नज़र में भी थी। सबको उसका मेहनती और खुशनुमा मिजाज़ लुभाता था।

आनंदी के हुनर की चर्चा पास के गाँव में गोपाल के घर तक पहुँच गयी। गोपाल की बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी और वो अपनी गृहस्थी संभाल रही थीं। गोपाल के बड़े भाई फ़ौज में थे और शादी करके अपनी पत्नी को अपने साथ ही ले गए थे। गोपाल जाने कैसे सबसे विरला था! उसे पढ़ने का कीड़ा लग गया था। माता पिता ने शुरू में न करी तो गोपाल भूख हड़ताल पर बैठ गया। माँ से बेटे की भूख कब बर्दाश्त हुई है तो उन्होंने अपने गहने गोपाल के पिता के हाथों में रखे और कहा ‘कैसे भी हो मेरे बेटे को पढ़ाओ’। गोपाल के पिता अपने ही घर में हार गए और उन्होंने गहने गिरवी रखकर गोपाल की पढाई ज़ारी रखी। और पैसों के लिए जंगल में लड़की काटने का काम ले लिया। खेतीबाड़ी की पूरी जिम्मेदारी गोपाल की माँ पर आ गयी। ऐसे में आनंदी में उन्हें अपना सहारा दिखा। उन्हें इंतज़ार था गोपाल के ग्रेजुएशन पूरी होने का। पैसों से कहीं ज्यादा उन्हें पुश्तैनी खेतीबाड़ी के चौपट होने का दुःख था। और हो भी क्यूँ न ? हर अगली पीढ़ी से अनकही अपेक्षा होती है कि वह उसे मिली विरासत को बढ़ाये। मगर जीवन में परिस्थितियाँ हर किसी को इस उमींद पर खरे उतरने का मौका शायद नहीं देती। और इसलिए गोपाल के माता पिता दुखी थे कि खेतीबाड़ी बढ़ा तो न सके, जितनी मिली उसे भी ठीक से सहेज नहीं पा रहे हैं। गोपाल की नौकरी पैसों की कमी पूरी कर सकती थी मगर खेतीबाड़ी बचाने के लिए तो गोपाल की बीवी ही काम आयेगी।

गोपाल देखने में आकर्षक था, अच्छी बांसुरी बजा लेता था और आस पास के कई गाँवों में अकेला ग्रेजुएट था। जहाँ बच्चे स्कूल की दहलीज भी बामुश्किल पार कर पाते हों वहाँ ग्रेजुएशन कोई क्या समझेगा ! तो गाँव के लोगों के लिए यह बस हैरत की बात थी। और वो ऐसे समझते थे कि अब गोपाल खूब कमाएगा, अपनी पत्नी को शहर ले जायेगा और घर की पुश्तैनी खेती खत्म। तो सुख और दुःख का मिलाजुला सा भाव था गोपाल की ग्रेजुएशन को लेकर। लेकिन एक बात पक्के तौर पर कही जा सकती है कि गोपाल सेलेब्रिटी बन चुका था। गोपाल के बड़े भाई भी मानो उसके ग्रेजुएट होने का इंतज़ार कर रहे थे और उन्होंने भी अपने एक फौजी दोस्त की खूबसूरत, स्मार्ट बहन से गोपाल की शादी के मंसूबे बाँध रखे थे। शहर में रहने के कारण शायद वो समझते थे कि गोपाल अब जो बन चुका है उसके लिए योग्य लड़की गाँव में मिलना संभव नहीं है। माता पिता तो गाँव में ही ढूंढ सकते हैं। इसलिए बड़े भाई का फ़र्ज़ निभाते हुए उन्होंने ऐसा कार्य अपने हाथ लिया। बस ग़लती यह हुई कि माता पिता को यह समझाने से पहले ही उन्होंने गोपाल पर यह बात खोल दी। वैसे ग़लती भी क्या कहें, आज भी परिवारों में कहाँ बच्चे माता पिता से शादी जैसे मुद्दे पर खुलकर बात कर पाते हैं। कुछ मर्यादा के बंधन होते हैं और कुछ शर्म के। गोपाल भाई के प्रस्ताव पर बहुत खुश हुआ। वैसे उसने अब तक ऐसा कुछ सोचा नहीं था मगर नयी नयी जवानी में कोई यह बीज डाल भर दे तो मन न जाने कितने मीठे-मीठे फलों तक जा पहुंचता है। गोपाल के मन में भी शादी के लड्डू फूटने लगे कि उसकी शादी ऐसी लड़की से होगी जो पढ़ी लिखी, ख़ूबसूरत और स्मार्ट शहरी होगी।

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जानने के लिए पढ़े अगला भाग. आनंदी और गोपाल- भाग २

इमेज क्रेडिट : https://www.google.co.in/imgres  एंड सस्पेंस

 

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