इमली और अमरख

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अहा, बचपन की यादें! बचपन की वो छोटी-छोटी बातें जैसा लुत्फ़ और रोमांच देती हैं वैसा अब कहीं ढूँढने से भी कहीं मयस्सर नहीं है। मन अक्सर टहलता हुआ बचपन के मेरे स्कूल के सामने जा खड़ा होता है। खूब बड़ा स्कूल और उससे भी बड़ा उसका खेल मैदान। पर मेरा चोटरा मन स्कूल के गेट के बाहर ही रुक जाता है। किसी चलचित्र की तरह बीते दिन एक बार फ़िर पटल पर तैरने लगते हैं अपनी ही रवानी में। स्कूल की छुट्टी होने का समय होने वाला है। सभी बच्चे इस इंतज़ार में हैं कि घंटी बजे और वो छूटते ही टूट पड़ें उस टोकरी वाली अम्मा के टोकरी पर। अम्मा की उम्र का ठीक ठीक अंदाज़ा तो नहीं। लेकिन हाँ, उनके बाल अधपके से हैं, दुबली काया, श्याम वर्ण और तन पर सूती साड़ी है। दरअसल उनसे ज्यादा ध्यान बच्चे उनकी टोकरी पर देते हैं। टोकरी में हरी कच्ची इमली, पकी लाल इमली, चटपटी गोलियाँ, अमरख, मसालेदार चूरन और एक खास आकार में फटे हुए कागज़ के कई टुकड़े हैं। वास्तव में यह कागज़ डिस्पोजेबल प्लेट हैं जिनमे बच्चों को अतिशय तृप्तिदायक सामान रख कर दिया जाता है।

ओ हो हो!!! कैसा सस्ता समय था वह! २५ पैसे में मुट्ठी भर इमली आ जाती थी और पूरा रास्ता चटकारे लेते हुए मस्ती में कट जाता था। अम्मा हर चीज़ के साथ चूरन ज़रूर देती थी। बहुत ही स्वादिष्ट चूरन। ऐसा चमत्कारी चूरन कि मुर्दे की जुबां पर रख दो तो वो दोबारा जी उठे और अचकचा कर कहे ‘ई का था हो?’ २५ पैसे में दो अमरख भी मिल जाते थे।

यूँ तो समय सस्ता था मगर सस्ते समय में भी ग़रीब और गरीबी तो होते ही हैं। बच्चों को हर दिन २५ पैसे मिलना बड़ा मुश्किल था और स्वाद का चस्का भारी था। अच्छा, जमाना सस्ता हो या महँगा, व्यवसायी तो व्यवसायी। उसे किसी भी युक्ति से ग्राहक को पकड़े रहना आता है। अम्मा भी यह बखूबी जानती थी और उन्होंने एक एक्सचेंज ऑफर निकाल रखा था।

ऑफर कुछ ऐसा था कि कॉपी के पाँच पन्ने दो और बदले में इमली, अमरख, चटपटी गोलियाँ जो चाहे वो ले लो। बच्चों के लिए तो यह अम्मा की ऐसी अपार अनुकम्पा थी कि सभी उनके उदारह्रदय के उपासक हो गए। बच्चे दिल खोलकर इस ऑफर का लुत्फ़ उठाते। सच कहूँ जब कभी मुझे इस ऑफर का लाभ उठाने का अवसर मिलता तो बड़े यत्नों से मैं खुद को अम्मा की चरणधूलि लेने से रोक पाती थी। ऐसा लगता था बिना मोल दिए ही विश्व का सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ और अद्भुत कुछ पा लिया हो। आनन्द का कोई ओर छोर ही न होता था। उस ऑफर के सामने आजकल मॉल में चलने वाले एक्सचेंज ऑफर- अजी लानत भेजिए, जिक्र करना भी नावाजिब लगता है।

बच्चे बिना एक भी पल गवाएँ अम्मा के ऑफर से अनुग्रहित होते। गरीब माता पिता बच्चों को प्रतिदिन भले ही २५ पैसे देने से इन्कार कर दें, लेकिन नयी कॉपी खरीदने के लिए, कैसे भी हो, पैसे ढीले कर ही देते हैं। बच्चे माता पिता की रग-रग से बखूबी वाकिफ़ होते हैं और एक माता पिता हैं कि उन्हें नासमझ समझते हैं! अब यह तो विवादास्पद है कि नासमझ कौन और बच्चा कौन। लेकिन जो बात सभी विवादों से परे हैं वो यह कि खुश रहने में, जुगाड़ निकालने में और कहानियाँ बनाने में बचपन का कोई सानी नहीं। और इसीलिए मन बार-बार उन गलियों में घूमने निकल पड़ता है जहाँ का वो सिकंदर है और जहाँ इमली और अमरख का स्वाद है।

Image credit  Imali

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