उलझने..बेसब्रियाँ

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हम क्यूँ किसी बात की बाल की खाल निकालते हैं ? शायद इसलिए कि उस बात को समझ सकें । शायद इसलिए कि वो बात जब दोबारा हमारे सामने आये तो हम नौसिखिया की तरह उससे न मिलें, बल्कि एक उस्ताद की तरह उस बात और खुद को डील करें । शायद इसलिए कि हम अपने मन को किसी दुःख से बचाना चाहते हैं । या फ़िर शायद हम खुद को किसी हार से बचाना चाहते हैं ।

हार और दुःख को खुद से दूर रखने के लिए हम कितने जतन करते हैं ! और फ़िर भी यह हमारा घेराव कहीं न कहीं कर ही लेते हैं । क्या कोई रास्ता नहीं इनसे पार पाने का ? लेकिन इनसे पार पाना क्यूँ चाहते हैं हम ? क्या दुःख में बस दुखी हो जाना और हार में बस हारा हुआ सा महसूस करना कमज़ोरी होती है ?

ज़रूर होती होगी तभी तो हम उन बातों और उन लोगों का विश्लेषण करने में लग जाते हैं जिनसे हम दुखी हुए या हार गए । ज़रूर होती होगी तभी तो हम अपना दिल कड़ा करने लगते हैं ऐसे वाकयों और ऐसे लोगों के लिए । ज़रूर होती होगी तभी तो हम अगले आने वाले मोड़पर मिलने वाले हर वाक़ये और हर इंसान को एक बार तौल लेते हैं अपने अनुभवों की कसौटी पर । और ज़रा सा बुरा अंदाज़ा होते ही कन्नी काटने की भरसक कोशिश करते हैं । अपने आप को रोकने लगते हैं महसूस करने से और खुलकर जीने से । अपने आप में सिमटे चले जाते हैं ताकि कोई बाहर वाला हमे दुःख या हार न दे सके । अपने ही कैदी हो जाते हैं और बस एक खिड़की भर की जगह से पूरी दुनिया को ताकने लगते हैं ।

लेकिन क्या ऐसा करके हम खुद को जीता हुआ महसूस करते हैं ? क्या हम दुखी नहीं होते अपने अकेलेपन से ? क्या हम हारे हुए नहीं होते अपनी ही सोच से ? क्या हारने का और दुखी होने का एहसास कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा ?

कभी हमे दुनिया तो कभी हम खुद को ही हराते और दुखी करते रहते हैं । इन सब में खुश कौन होता है – दुःख ? जीतता कौन है – हार ?

अगर यह एहसास इंसान के लिए इतने ज़रूरी ही हैं तो यह ऐसे ग़ैर-ज़रूरी क्यूँ लगते हैं ? डरावने क्यूँ लगते हैं ? किसके लिए अच्छी है हार ? किसको सुहाता है दुःख ?

इस हद्द तक झकझोर देता है यह कि कभी इंसान जीती जागती लाश बन जाता है तो कभी खुद ही अपनी साँसों की डोर तोड़ देता है । कभी इससे डरते हुए कोई इंसान उदासीन हो जाता है तो कभी कोई इंसान से हैवान बन जाता है । कोई क्यूँ किसी हारने वाले से कहता है “हार जीत बड़ी बात नहीं, खेलना बड़ी बात है “ । बस उसके दुःख को कम करने के लिए ही ना ? क्यूंकि अगर यह सचमुच ही सच होता तो जीतने वाले को भी यही कहते । मगर ऐसा आजतक नहीं देखा सुना मैंने इसलिए यह बात फ़िर एक कोशिश सी लगती है हार और दुःख को झुठलाने की ।

यह कैसा चक्रव्यूह है ? अर्जुन कौन ? जो कहे कि “ये ना सोचो इसमें अपनी हार है कि जीत है, उसे अपना लो जो भी
जीवन की रीत है” । क्यूंकि ऐसी सोच के साथ ही इस चक्रव्यूह को भेदना मुमकिन है । अभिमन्यु कौन ? जो हार को हारने की कोशिश में दम तोड़ दे, शहीद हो जाये ।

शहादत को दुनिया में इतनी मशहूरियत, इज्ज़त और प्यार मिला हुआ है कि हम सब अभिमन्यु होने को बेताब हैं । जीते जी न सही मरके तो विजेता का दर्जा मिलेगा । विधाता ने हमे जन्म क्यूँ दिया था ? जीने को या विजेता होने को ? ख़ैर, किसी विधाता के उद्देश्य के लिए अपना जीवन दर्शन क्यूँ व्यर्थ करें ? हर किसी को खुद ही खुद को बताना होगा कि जीवन में जीवन से ज्यादा ज़रूरी क्या है ? जीवन की गरिमा से ज्यादा ज़रूरी क्या है ?

एक मामूली इंसान बनकर जीना इतना कठिन क्यूँ है ? इसमे कोई आकर्षण क्यूँ नहीं है ? राजा होना कितना विराट है और एक सैनिक होना कितना नगण्य । यह फ़र्क ही हार और दुःख का कारण है । क्यूँ बनाये हमने यह फ़र्क ? यह फ़र्क के उतार चढ़ाव से भरी तस्वीर एक दर्शक की तरह तो सुन्दर लगती है मगर खुद को उस तस्वीर का हिस्सा बना लेने पर हर कोई चढ़ाव पर ही होना चाहता है, उस्ताद होना चाहता है बस इसीलिए दुःख और हार में फसा रहता है ।

मैं भी ऐसी ही एक हार और एक दुःख में खुद को पिछले कुछ समय से ढूंढ रही हूँ । आज तक अभिमन्यु ही बनी रही, जूझती रही । पर अब लगता है प्रमोशन की अर्ज़ी डाल दूं और पूरे विश्वास से  गाऊँ….

ये ना सोचो इसमें अपनी
हार है कि जीत है
उसे अपना लो जो भी
जीवन की रीत है
ये ज़िद छोड़ो, यूँ ना तोड़ो
हर पल एक दर्पण है ….
ये जीवन है ….

image credit : https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Death_of_Abhimanyu.jpg

 

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