बचपन का किस्सा – प्रभु दर्शन

बाल्यावस्था से ही गीत संगीत में मेरी रूचि रही । आते-जाते, खेलते-कूदते गीत मेरे होंठो पर बसे ही रहते थे । अच्छा, मेरा बाल्यकाल जिस पौराणिक काल का है, उस समय काल में बालिकाओं का गीत संगीत में अधिक रूचि लेना प्रायः माता-पिता को न सुहाता था । उस समय आज की तरह ‘सा-रे-गा-मा- पा’ या और विविध तरह के मंच नहीं होते थे, किसी प्रोत्साहन के लिए । और ना ही गाना व्यक्तित्व की प्रतिभा की तरह देखा जाता था । महज़ शौक हो सकता था, गाना सुनना और गाना । तो हम भी शौकिया तानसेन थे ।

बड़ी ही निपुणता की दरकार हुआ करती थी उन दिनों यूँ हर पल रियाज़ के बहाने ढूँढने और रियाज़ करने के लिए । मैंने भक्ति मार्ग का चयन किया । जब ‘मेरा बलमा छैल छबीला मैं तो नाचूँगी’ गाने का रियाज़ करना चाहा तो पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ शुरू किया ‘माँ मुरादें पूरी कर दे हलवा बाटूँगी’ । अब भला माता रानी, राम, श्याम और उनके सहचरों के नाम स्मरण करने वाले गीतों के विरुद्ध कोई बोले भी तो क्या ? तो हमारे गीत संगीत माता पिता के प्रेम निरीक्षण परीक्षण में अपना राह बनाते चले जा रहे थे ।

यह बात उन दिनों की है जब हम सातवीं कक्षा में आये और नए स्कूल में दाखिला लिया । कई परिवर्तनों में एक परिवर्तन बहुत ही रोचक रहा और वह था कि इस स्कूल में एक साप्ताहिक संगीत कक्षा भी होती थी । और उसमे भी प्रभु वंदना के ही गीत होते थे । हालाँकि ठीक-ठीक कह नहीं सकती कि वह स्वैच्छिक चयन था या मेरी तरह स्कूल की कोई मजबूरी । जो भी हो, मुझे कई नए गीत मिल गए थे और गाने के नए अवसर भी ।

उन दिनों स्कूल में एक गीत सिखाया जा रहा था ‘हे प्रभु दर्शन दो, मेरे दिल में आओ’ ।इधर स्कूल में यह गीत सीखना शुरू किया ही किया था कि एक दिन माँ की तबियत कुछ गड़बड़ हो गयी । उस दिन मुझे बर्तन धोने का कार्यभार दिया गया । उन दिनों रसोईघर में सिंक की व्यवस्था नहीं हुआ करती थी ।और रसोईघर के एक कोने में, जहाँ से जल निकास की व्यवस्था दुरुस्त हो, वहीँ फ़र्श पर बैठकर इस काम को अंजाम दिया जाता था । तो हम भी बैठ गए उकडू पोज़ में और बर्तन धोना शुरू किया ।

तुरंत ही माँ सरस्वती मेरे कंठ में जाग उठी और वातावरण में स्वर लहरी तैरने लगी  ‘हे प्रभु दर्शन दो’ । मेरा निष्पाप, निर्दोष, निर्विकार और अबोध मन साक्षी है कि मैं केवल गीत संगीत का रस लेने के उद्देश से गा रही थी । मुझे तनिक सा भी बोध न था कि प्रभु वाक़ई सीरियस हो जायेंगे और आनन-फानन दर्शन की योजना भी बना लेंगे ।

वैसे तो अनुश्रुति है कि भक्त के बुलावे पे प्रभु नंगे पैर ही दौड़े चले आते हैं । किन्तु अपने प्रभु की योजना से सर्वथा अनभिज्ञ मैंने उन दो नंगे पैरों पर, जो अभी-अभी रसोईघर में भागते चले आये थे, कोई ध्यान ही न दिया । और यह समझी कि मेरी छोटी बहन आई है जिसे माँ ने रसोईघर से दूध का भरा भगोना लेने भेजा है । मैं अपने कार्यकलाप में लिप्त रही और अचानक प्रभु प्रेम की बदरी गरम-गरम दूध का रूप लेकर मेरी पीठ पर बरस पड़ी । ऐसी अनल क्षीर वर्षा से मैं कुछ पल तो अवाक् हुई और फ़िर पूरी शक्ति से चीखकर भागने को हुई ।

किन्तु ऐसे कैसे ? जब तक प्रभु प्रेम में सर से पैर तक न भीगे तो क्या ख़ाक भीगे ? अब आप मेरी परिस्थिति समझने का प्रयास करें, फ़र्श पर आस पास दूध ही दूध है और सोने पे सुहागा मेरे हाथ बर्तन धोने की टिकिया से पूरी तरह सने हुए हैं । ऐसे में फिसल जाना कोई अनहोनी नहीं है । तो मैं फिसलकर फ़िर वहीँ जहाँ मुझ पर प्रेम वर्षा हुई थी । पिछली बार दूध पीठ से बहता हुआ फ़र्श पर आ गिरा था और इस बार मैं चारों खाने चित्त उस पर लेटी थी ।

बिहारी जी की पंक्तियाँ याद आ गयी “बरस्या बादल प्रेम का भीज गया सब अंग”

यह सब जो भी हुआ हो लेकिन समझदार मैं बचपन से ही रही । तो अगली बार मैं ऐसे संयम और सावधानी से एक-एक पग बढ़ाते , चुपचाप रसोईघर के दरवाज़े तक पहुँची मानो कुछ हुआ ही नहीं, मानो मुझे कोई जल्दबाजी भी नहीं । और दरवाज़े पर रखे पावंदान पर पैर पोछने के बाद जिस दामिनी की गति और बादलों की सी गर्जना से मैं अपनी माँ की तरफ लपकी वो बस मैं  ही जानती हूँ या मेंरी माँ । आकुलता में मरे नैन जल-जल होकर बरस रहे थे और मुझे लगा ड्रेस के साथ आज पीठ की खाल भी विदा ले लेगी । तब माँ ने जो कहा उसके बाद यही कहना ज्यादा उचित होगा कि माँ ने मुझे उस दिन दूसरी बार जीवन दिया । माँ ने कहा “दूध गुनगुना हो चुका था, रोना बंद करो, जाओ ड्रेस बदलो कुछ नहीं हुआ तुम्हें” ।

तब सहसा मेरा ध्यान गया कि हाँ कोई जलन तो हो ही नहीं रही है, सब ठीक ही लग रहा है । ओह! बेकार ही शंका में इतना व्याकुल हो उठी , चलो अब सारे बर्तन धोकर ही कपडे बदलूंगी । ऐसा सोचते हुए मैं वापस रसोईघर में पहुँची और छोटी बहन को एक अट्टहास उपहार में देकर बैठ गयी यथास्थान । जैसे ही हाथ चलने शुरू हुए गीत भी चल पड़ा “हे प्रभु दर्श” मगर तुरंत ही मैंने रोक दिया और चुपचाप बर्तन धोने लगी ।

Image credit : barish

 

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2 Comments Add yours

  1. Deepak says:

    Hahaha very very hilarious writing.

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      Thank you 🙂

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