उड़ान की तैयारी

“माँ, जब मैं ऑस्ट्रेलिया, चाइना या मैनहेटन या कहीं भी बाहर जाऊँगी, तब तुम मुझे टीवी पर देखना ।”
“क्यूँ ? मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगी। मैं कौन सा जॉब करती हूँ जो तुम्हारे साथ न जा सकूँ? मैं भी साथ चलूँगी ।“
“नहीं, मॉम, तुम नहीं चल सकती । एलावुड नहीं है ।”
“क्यूँ? कौन रोकेगा?”
“ओहो! देखा है न तुमने ‘चक दे’ मूवी में, पेरेंट्स एलावुड नहीं होते । अकेले ही जाना पड़ता है और अकेले रहना पड़ता है । हॉस्टल टाइप से ।“
आजकल चिया का मन बस एक ही धुन पर नाच रहा है, ‘चक दे, चक दे, चक दे इंडिया’ । स्कूल से आते ही हॉकी दौड़कर उसके हाथों को ऐसे थाम लेती है, जैसे शिक़ायत कर रही हो कि ‘तुम्हारे जाने के बाद कोई मुझे पूछता भी नहीं ‘।
माँ ने एक गहरी साँस छोड़ते हुए बनावटी दुःख में होठों को भींचते हुए सर झुका लिया । छः वर्षीया चिया बहुत गम्भीर बात कह रही थी और उसे दूर दूर तक अंदेशा नहीं था कि माँ के लिए उसकी बातें बाल-लीला का बहता हुआ निर्मल झरना है और माँ की यह मुद्रा बस छलावा भर है । फ़िर चिया तनिक ठहरकर बोली
“अच्छा, तुम मेरे जाने के नेक्स्ट डे आ जाना और मेरा मैच देखना, स्टेडियम में । मैं तुम्हें एड्रेस वगैरह बता दूँगी । ठीक है?”
माँ ने ख़ुशी से चहकते हुए कहा
“ठीक है ।“
बेटी माँ से लिपट गयी लेकिन आज वो माँ के आँचल में नहीं छुपी बल्कि उसने माँ को अपने अंक में भर लिया । माँ हैरान हो गयी, इस लिपटने के अंदाज़ से नहीं, यह तो चितपरिचित पुनरावृति थी । माँ हैरान हुई बेटी में जागे इस नए साहस, नयी स्वछन्द उड़ान और नयी उमंग से । जो बेटी बीते कुछ दिनों पहले माँ से ज़रा भी दूर नहीं रहना चाहती थी वो नए सपने बुन रही है और पूरे आत्मविश्वास के साथ, पूरी आत्मनिर्भरता के साथ । समय कैसे पंख लगाये उड़ जाता है !

बेटी धीरे धीरे बड़ी हो रही है, यह एहसास माँ को ख़ुशी भी देता है और थोड़ी सी नमी भी । बेटी से लिपटी माँ खुश भी है और आँखों में बादल भी घुमड़ रहे हैं । आज तक बेटी के कोमल ह्रदय पर मुझसे ज्यादा अधिकार किसी का न था लेकिन अब धीरे-धीरे पतंग को आसमान बुला रहा है । वैसे तो अभी कई वर्षों तक माँ अपनी इस आत्मविश्वास और उमंगों से भरी पतंग की उड़ान देख सकेगी । फ़िर वो समय भी आयेगा जब पतंग नया असमान चुन लेगी अपनी नयी उड़ान का हाथ थामे । जब उसकी पतंग हवाओं से बात कर रही होगी तब माँ हवाओं से कहेगी ‘मेरी पतंग का साथ देना’ । माँ को यह भी विश्वास है कि पतंग जब नयी-नयी ऊँचाइयों को छूकर मस्त लहरा रही होगी तब भी प्रीत की डोर यूँही उन दोनों को बांधे रहेगी । माँ-पापा उन दिनों के इंतज़ार में पलकें बिछाये रहेंगे जब उनकी चिया बीच-बीच में अपने पुराने घोंसले पर आया करेगी ।

इमेज क्रेडिट : पतंग

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2 Comments Add yours

  1. Deepak Bisht says:

    Beautiful, liked it

    Liked by 1 person

    1. hemasha says:

      Thank you 🙂

      Like

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