आज़ाद कश्मीर !!! कर दें ?????

कैसा होता है जब कुछ लोगों की झक्क बाकी सब की देशभक्ति का जामा पहन लेती है ? मुझे अंदाज़ा लगाने में मुश्किल होती है कि यदि कश्मीर का मुद्दा न होता तो हमारे जवानों की देश में प्रासंगिकता और सम्मान कितना होता ? दरअसल मेरे लिए यह कल्पना भी बड़ी दुष्कर है कि जिन देशों में ऐसे लहूलूहान मुद्दे नहीं होते वहाँ उनकी सैन्य शक्ति किस बिनाह पर सराही और सम्मानित की जाती होगी ? वो किस प्रकार अपने अस्तित्व के लिए प्रासंगिकता तलाशते होंगे ? क्या उनके प्रति उनके देशवासियों का उतना ही प्रेम और आदर भाव होता होगा जितना हमारे यहाँ है ?

१९९१ (1991) में एक शक्तिशाली राष्ट्र USSR ने खुद को पुनः संगठित किया और अपने साथ जुड़े उन तमाम स्टेट्स को आज़ाद कर दिया जिन्हें खुद को USSR का हिस्सा मानने में कष्ट था । यह बहुत ही कष्टकर और साहसिक कदम था USSR का- अपने अस्तित्व के विघटन का कदम । अपने ही अस्तित्व के कुछ हिस्सों को स्वतंत्र कर देना और उनसे अपनी प्रभुता हटा लेना और दूसरों की इच्छाओं का सम्मान करना, शांति का चयन करना। जब-जब कश्मीर के बम बारूद समाचारों में अपना दखल देते हैं, तब-तब मैं सोचती हूँ कि क्यूँ हम उसे जबरन अपना हिस्सा बनाकर बैठे हैं जिसने शुरू से ही अलग प्रभुता चाही ? महाराजा हरी सिंह का पत्र संलग्न कर रही हूँ प्रमाण के लिए महाराजा हरी सिंह का पत्र

यदि जम्मू-कश्मीर का इतिहास देखें तो पता चलता है कि इस राज्य ने आज़ादी के समय भारत और पाकिस्तान दोनों की ही प्रभुता मानने से इन्कार कर दिया था । १९४७ (1947) में इस राज्य ने अपनी स्वतंत्रता की माँग की थी और भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही ने न सिर्फ़ उसके मत को, उसके चयन को प्रभावित करने की कोशिश की अपितु स्वयं को उस पर थोपने का भी प्रयास किया । इस राज्य की विडम्बना यह थी कि यहाँ जन साधारण में मुसलमानों का बाहुल्य था और उसका शासक हिन्दू था । जब धर्मं के आधार पर राष्ट्र विघटन या यह कहें कि नए राष्ट्रों का सृजन हो रहा था तो इस राज्य की पशोपेस जायज़ है । अगर जनसाधारण की गणना को आंकें तो पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए और यदि शासक के सत्ताप्रेम और उसके धर्म को आंकें तो भारत का हिस्सा होना चाहिए । इसलिए बीच का रास्ता लेने की कोशिश की इस राज्य ने और पूर्ण स्वतंत्रता का बिगुल बजाया । लेकिन पाकिस्तान ने इस राज्य की जनता का साथ देने और उन्हें अपने साथ करने के लिए घुसपैठ का सहारा लेना शुरू किया और आतंकवाद के जरिये इस राज्य पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहा । राज्य की बिगड़ती स्थिति देखकर राजा ने भारत से सहायता माँगी और भारत ने अपनी शर्त रख दी कि मदद के बदले राज्य को भारत की प्रभुता स्वीकार करनी होगी ।

आश्चर्यजनक है कि राष्ट्र चाहे भारत जैसा महान क्यूँ न हो सियासत के खेल गंदे ही खेलता है । सत्ता और राज्य विस्तार का मद है ही कुछ ऐसा । और जब तब कहते रहते हैं कि भारत ने कभी किसी दूसरे पर आक्रमण या अतिक्रमण नहीं किया, उसे तथाकथित विजय अभियानों में और दूसरों की स्वत्नत्रता को निगल जाने में कभी कोई रूचि नहीं रही !!!

मेरी समझ से कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाना किसी देशप्रेम से प्रेरित था ही नहीं, यह मात्र राजनैतिक आकांक्षाओं का, सत्ता विस्तार के लोभ का मुद्दा था । भारत हो या पाकिस्तान दोनों ने ही कश्मीर को अपने अहम् का हिस्सा बना लिया, न भारत ने वहाँ की साधारण जनता की इच्छाओं का सम्मान किया और न ही पाकिस्तान ने । सैन्य बल में भारत भारी पड़ा और कश्मीर की स्वत्नत्रता को सहायता के चोले में डकार गया । जो राज्य ‘आज़ाद कश्मीर’ का सपना देख रहा था उसे ‘अभिन्न अंग’ का नाम देकर उसकी मंशाओं पर ज़ोरदार तमाचा मारा । आजतक भारत यही कोशिश कर रहा है कि कश्मीर न छूटे, भले ही वहाँ का ध्वज अलग करना पड़े, वहाँ अलग तरह की क़ानून व्यवस्था करनी पड़े और उसे देश से अलग ट्रीट करना पड़े । कैसी हठधर्मिता है यह !!!!

इस हठ का खामियाज़ा कश्मीर और शेष भारत दोनों भर रहे हैं । कभी कभी सोचती हूँ कि हमारे जवान घाटी में आतंकवाद से जूझ रहे हैं या फ़िर शीत युद्ध से ? हमारी रंगी हुई सियार वाली देशभक्ति हमे सोचने ही नहीं देती कि क्यूँ न उसे जाने दें जो रुकना ही नहीं चाहता ? किसी को अपना अपना बार-बार कहने से वो अपना नहीं हो जाता । देशभक्ति के नाम पर हम सालों से देश के बहादुर सैनिकों को बस बहादुरी पदक देने के लिए कुर्बान करते जा रहे हैं । कैसा देशप्रेम है यह !!!!

हम शुरू तो २५ (25) राज्यों से हुए थे आज गिनती २९ (29) कैसे हो गयी ? हम क्यूँ किसी राज्य के एक हिस्से को अलग राज्य होने देते हैं, जब वो हिस्सा अपने राज्य में नहीं रहना चाहता तो ? मात्र इसलिए कि- हो लो अलग, मगर रहोगे तो भारत में ही । यही वह विचार है, मुखौटा है, जिसके तहत हम किसी राज्य में चल रहे शीत युद्ध को स्वीकार करते हैं और उसे अलग राज्य बनाकर अपनी मान्यता और स्वीकृति देते हैं वहाँ के लोगो को । लेकिन अगर वही हिस्सा  देश से अलग होने की माँग करे तो ??? सत्ता का असली चेहरा सामने आ जाता है । देश के अन्दर ही रहो चाहे आने वाले समय में हमे ७० राज्य बनाने पड़े तो भी । इसलिए कश्मीर मुझे मात्र राष्ट्रीय अहम् का मुद्दा लगता है । और अहम् को सुरक्षित करने के लिए हम कितनी भी शहादत दे सकते हैं ।

बहुत समय पहले पंडित नेहरू को एक बात समझ आई थी कि जम्मू कश्मीर की आज़ादी ही भारत-पाकिस्तान के इस द्वन्द का अंत है, जिसे बाद में माननीय अटल बिहारी वाजपेयी जी ने भी स्वीकार किया । मगर फ़िर भी हम देशवासी इस विकल्प के मूल्यांकन के बारे में नहीं सोचते क्यूंकि हमारी देशभक्ति परिभाषित ही कश्मीर को अभिन्न अंग बनाये रखने में होती है । हमारे नेता अपने निजी स्वार्थों से उपर नहीं उठ पाते और हम अपनी आँखों पर लगे चश्मे नहीं बदलना चाहते । हाँ, लेकिन विश्व गुरु और शांतिदूत कहलाने का गौरव हम सभी पाना चाहते हैं । हमारा व्यवहारिक आचरण चाहे जो कहता हो हमारे बारे में लेकिन हमारी जिह्वा निःसंदेह यही कहती है-

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,

पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,

सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

Image credit : kashmeer ka dhwaj

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