एक चिट्ठी

मेरे प्यारे,

कल तुम फ़ोन पर कह रहे थे कि तुम्हें मेरे पास आना है । मुझे थोड़ा दुःख हुआ कि तुम दूर होकर दुखी हो, और मैं अपने मम्मी पापा के पास मजे में थी । तुमसे दूर होकर भी दूरियों का एहसास नहीं होता मुझे, हर पल तुम्हें अपने साथ और अपने आप में महसूस करती हूँ तुम्हें । जब मैं तुमसे बहुत दूर थी, एक दूसरे ही देश में, तब भी कभी मुझे दूरियों से कोई ख़ास शिकायत नहीं हुआ करती थी । दूरियों वाले एहसास से तो हॉस्टल के दिनों में ही दोस्ती हो गयी थी मेरी । पहले भी तो तुमसे दूर तीन साल बिताये थे मैंने । और सच कहूँ तो वो तीन साल ज्यादा दर्द और बेबसी भरे थे । तब यह जानती ही नहीं थी कि दिल जिसपे हार आई हूँ वो मेरा है भी या नहीं । कन्फ्यूज्ड हूँ कि तुम्हें कभी न पा सकने का जो डर था वो सबसे भारी था या फ़िर तुम्हें छोड़ किसी और की हो जाने का ख्याल सबसे डरावना था । कुल मिलाकर कहें तो उन तीन सालों में दर्द, आँसुओं और तड़प की इन्तहां से हम दो चार हो चुके थे । तोड़-तोड़कर कुछ इस तरह जोड़ा उस दर्द ने मुझे कि अब जो भी होता है वो काबिलेबर्दाश्त ही होता है । तुम मिल गए तो हमने कभी जिक्र भी नहीं किया तुमसे उन तीन सालों की तड़प का । शायद हम नयी मिली ख़ुशियों में उसे भूल ही गए थे । मगर जो एहसास इतनी गहराई से जिया हो उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता । तो क्यूँ नहीं कहा ? हाँ याद आया, जताने की दिक्कत हमेशा से साथ रही । प्यार हुआ तो जताना मुश्किल लगा, तड़पे तो तड़प छुपाना आसान लगा । तुम मिल गए तो लगा कि सिला मिल गया हर आँसू का । बिना मांगे तुम मिल गए अब क्या मरी भैंस की पूंछ फाड़ना ?

अब तो हम एक ही शहर में रहते थे और हर वीकेन्ड पर मिलना होता था, तुम्हारे साथ खाना खाते थे, और वो पार्क में घंटो चलने का सिलसिला । याद ही नहीं आता कि हमेशा से इतना स्टैमिना था क्या मुझमे कि घंटा भर चलती रहूँ, बिना रुके ! रहा होगा क्यूंकि कभी पैर दुखे नहीं तुम्हारे साथ चलते हुए । याद है, एक बार तुम्हारा एक दोस्त भी आया था और उसने अगली बार आने से मना कर दिया ‘अबे, तुम दोनों चलाते बहुत हो यार’ यह कहकर । कितनी ही बातें करते थे हम, दरअसल हम नहीं तुम । हमेशा से हैरान होती थी मैं कि कितना बोल लेते हो तुम ! कितना अच्छा, कितना मीठा और कितना बेजोड़ बोल लेते हो तुम ! मैं तो अक्सर चुप ही रहती थी और चुपचाप देखती थी दिल हाथों से निकलते हुए । ऐसा लगता था चहचाहट चिड़ियों को छोड़ तुम्हारी हो गयी है । इन्द्रधनुष नहीं दिखा दो बरसात तलक तब कन्फर्म हुआ कि रंग उसे छोड़ तुम्हारी बातों में घुल गए थे । एक बच्चे सा रूहानी बालपन है तुम्हारी शख्शियत में, बहुत मासूमियत है तुम्हारे एहसासों में । आँखों में नादान सी शैतानियाँ चमकती रहती हैं । और पैरों में तो जैसे लहरें बाँधी हो कभी थमते ही नहीं और लहरों सी सहजता से बढ़ते हैं तुम्हारे कदम । दिमाग में तो शायद पूरा ब्रहमाण्ड सिमटा है तुम्हारे, तुम्हारी समझ की कायल हूँ, बहुत बहुत बहुत बड़ी । तुम्हारे सामने क्या राजू श्रीवास्तव और क्या आइन्सटीन – सब फेल ।

पता है, तुम्हारा बाइक स्टार्ट करना मुझे बेहद पसंद है- वो तुम्हारा सबसे पहले बायें हाथ से चश्मा उतारकर दायें हाथ से हेलमेट को सर पे सेट करना और फ़िर बायें हाथ से दोबारा चश्मा आँखों पर चढ़ाना और अब उसे सेट करना । इतनी सेटिंग के बाद खटाक से हेलमेट का शीशा नीचे करना और दस्ताने पहनना, पक्के astronaut लगने लगते हो । फ़िर पैर घुमाकर बाइक पर सवार हो जाना, हाथों से कुछ खटर-पटर करना, किक मरना और हाथों से बाइक के कान उमेठना । फ़िर पैरों से और भी कुछ हरकत करते हो बाइक में, और मेरी तरफ मुड़कर कहते हो ‘बैठो’ । तुम्हारे पीछे बैठे मैं तब बहुत ही खुश हो जाती हूँ जब सफ़र के दौरान तुम्हारे पैर के पंजों को उपर नीचे होते हुए देखती हूँ । सच कहूँ तो कई बार मैं रास्ते पर कोई ध्यान ही नहीं देती और मन पूरी तरह से तुम्हारी छोटी-छोटी हरकतें जो तुम बाइक के साथ करते रहते हो, उसी में लगा रहता है । और इसीलिए मैंने तुमसे कहती हूँ ‘बाइक चलाते समय बात मत किया करो, मुझे सुनाई नहीं देता’ । लेकिन तुम इतने बतोले, चुप कैसे रह सकते हो !! तो बीच-बीच में हेलमेट का शीशा उपर कर कुछ कहते हो और मेरी हाँ सुनकर एक बार फ़िर खटाक से शीशा गिरा लेते हो । मैं तुम्हारे पीछे बैठी हँस देती हूँ और तुम्हारे कुछ और पास  खिसक आती हूँ । बाइक से उतरने पर लगता है कि तुमसे अच्छी बाइक और कोई नहीं चलाता । क्या सही चलाते हो ! कितना भी ट्रैफिक हो कहीं से भी चढ़ाके , कूदाके बिना रुके, चलते ही चले जाते हो अपना रास्ता बनाते हुए । उफ़्फ़!! बस गहरी सांस भरकर रह जाती हूँ । फ़िर तुम्हारे सारे बाइक आभूषण उतारने की प्रक्रिया भी बेहद दिलकश होती है और अंत में तुम्हारा अपने बाल ठीक करना मीठी मुस्कुराहट ले आता है चेहरे पर ।

सुबह जब घर से चलते हो तो तुम्हारा शर्ट को कलाईयों से थोड़ा ऊपर फ़ोल्ड करके समेटना, मुझे बहुत पसंद है । इसलिए अक्सर ढूँढती हूँ ऐसी शर्ट्स जिसमे Collar और cuff सफ़ेद रंग के हों और बाकि शर्ट किसी दूसरे रंग की हो । तुम्हारी हर बात में, हर काम में एक कला है जो दिल को तुम्हारी ओर खींचती है । मैं बिना कुछ बोले तुम्हें तुम्हारी दिनचर्या जीते हुए पूरे दिन देख सकती हूँ । तुम्हारी कलाई पर घड़ी देखती हूँ तो ईजाद करने वाले को सलाम करती हूँ- क्या सही चीज बनायी है !! तुम्हारी सिमटी हुई आस्तीन और खुली कलाई पर घड़ी………कैसे कोई इतना इतना अच्छा लग सकता है !!

हाँ, तुम्हारा तरह-तरह के मुहं बनाकर कंप्यूटर पर गेम खेलना, बच्चों की तरह खुश होकर हा हा हा हा करना और ग़लती कर देने पर मुहं से चिक्क की आवाज़ निकालना और दोनो हाथ सर के पीछे रखकर कुर्सी पर टिक कर बैठ जाना । लेकिन अगले ही पल फ़िर मुस्तैदी से गेम में लग जाना और जीतने पर ‘येस्स’ कहना । कभी तुम्हें तुम्हारे कोड में डूब जाते हुए देखना । कितने प्यार से लिखते हो अपना कोड और तरह तरह की फाइल्स को ऐसे प्यार से मैनेज करते हो जैसे कोड नहीं बच्चा है तुम्हारा, न सिर्फ उसके बाहरी रंग रूप बल्कि उसकी अंदरूनी खूबसूरती का भी ख्याल रखते हो । कितनी ईमानदार कोशिशें ! तुम्हें बंटते हुए देखती हूँ मगर न जलन होती है और न कोई दुःख । बल्कि एक सन्तुष्टि का एहसास होता है तुम्हें तुम्हारे हर पहलू के साथ पा लेने का । ऐसे हो तुम और ऐसे भी हो तुम, वैसे हो तुम और वैसे भी हो तुम, कैसे कैसे हो तुम मगर जैसे भी हो तुम, तुमसे बेहतर और कोई नहीं ।

जब हम अलग अलग ऑफिस में काम करते थे तो अक्सर मन होता था तुम्हें तुम्हारे ऑफिस में देखने का, काम करते हुए देखने का और दोस्तों के साथ खिलखिलाते हुए देखने का । ख़ुशनसीब हूँ कि यह इच्छा भी पूरी हो गयी । तुम्हारे साथ बाइक पर बैठकर ऑफिस जाती, तुम्हारे साथ कैंटीन जाती, लंच के बाद, सर्दियों में, बाहर टहलती और इन सबके बीच कभी कभी तुम्हारी सीट के पास आके तुम्हें काम में डूबे देखती । तुम्हारे दोस्त आवाज़ लगाते ‘पंडित’ तो दिल मेरा बल्लियों उछल जाता । तुम्हें उनके साथ हंसी ठठ्ठा करते देखती और हाँ मेरे पर्सनल राजू श्रीवास्तव लड़कियों को तुमसे इम्प्रेस होते भी देखती थी । सब कुछ बहुत बहुत बहुत ही अच्छा था । तुम्हारी एक फ्रेंड का कहना कि ‘मिश्रा जी attitude बहुत दिखाते हैं, आपने इन्हें बिगाड़ दिया है’, मुझे किसी गोल्ड मैडल से कम नहीं लगता ।

एक ही कसक रह गयी थी दिल में कि तुम्हारा बचपन नहीं देखा मैंने । जब हमारी बेटी हुई और तुमने मुझे अपने बचपन की फोटो दिखाई तो यह कसक भी दूर हो गयी । अब भी जब कभी वो कुछ नया करती है और कोई मुझे बताता है कि तुम भी बचपन में ऐसा करते थे तो मन बहुत खुश हो जाता है । हमारी बेटी में मुझे तुम्हारा बचपन भी मिल जाता है कभी-कभी । तुमसे दूर कभी नहीं हो सकती जब तक यह फ़ैसला मेरे हाथ में है, तो इंतज़ार कर रही हूँ तुम्हें सफ़ेद बालों में देखने का । न जाने तब तक तुम खडूसियत की किस मंजिल पे होगे !!! अपने आस पास के बुढ्ढों को देख कर कह रही हूँ कि तुम भी खडूस हो ही जाओगे शायद । हो जाना न प्लीज़, मेरे लिए, मुझे देखना है तुम्हें खडूस होते हुए । ऐसी और भी इच्छाएं हैं मेरे दिल में । जैसे आजतक हर इच्छा पूरी हुई है आगे भी होती रहेगी ऐसी उम्मींद है मुझे ।

बस इतना ही ।

Image credit : http://maxpixel.freegreatpicture.com

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