शिव के साथ वार्तालाप -२

पिछली बातचीत : शिव के साथ वार्तालाप -१

तुम चुप क्यूँ हो ? कुछ तो कहो । कैसे मुस्कुराते पाते हो, शांत रह पाते हो ? क्या ताण्डव भूल चुके हो ? समझाओ मुझे कि क्यूँ नहीं आते तुम दुनिया से बुराईयों और पापियों का नाश करने ? क्या तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि आज यहाँ हर एक अकेली औरत किस मुश्किल में है ? क्या तुम्हें दर्द नहीं होता जब कोई अबोध बच्चियों को अपनी वासना का शिकार बनाता है ? क्या एक ईमानदार आदमी की व्यथा और बेबसी से तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता? एक बार हलाहल पिया तुमने, यह ग्रीवा नीली क्या बस उसी के प्रचार के लिए की है तुमने ?

उफ़्फ़!!! इतने सवाल !!, इतनी पीड़ा !! तुम मुझे झुठलाना चाहती हो, अपने मन का वहम समझकर किनारे कर देना चाहती हो, क्यूंकि मैं तुम्हारी इन इच्छाओं को पूरा नहीं करता ? क्यूंकि मैं तुम्हारे जीवन का विष पीने नहीं आता ?

नहीं ! नहीं ! नहीं ! इसलिए क्यूंकि तुम मुझे मेरे इन सवालों का जवाब नहीं देते । मैं यह कैसे मान लूँ कि मेरे सवालों का जवाब नहीं है तुम्हारे पास ? इन सवालों का बिच्छू मुझे हर बार काट जाता है जब-जब मैं किसी निरीह को तड़पते हुए देखती हूँ । जब-जब देखती हूँ कि उसका आर्तनाद तुम्हें स्पर्श तक नहीं कर पाता । जब-जब देखती हूँ कि सुख दुष्ट की दासता कर रहा है और कुटिलता उसके अधरों पर सजी है ।

मेरी प्रेयसी सुनो और बताओ कि किसका नाश कर दूँ मैं ? मैंने बड़ी नृशंसता के बाद जाना है कि मेरा अवतार लेकर तथाकथित पापियों का विनाश करना कितना दोषपूर्ण था ! तुम ही कहो प्रिये, किसी एक को चिन्हित करो आस-पास, जो शत प्रतिशत दोषी हो । बताओ किस मानव में आज राक्षसी प्रवत्ति का वास नहीं है ? खुद ही देखो प्रिये क्या तुम पूरी तरह दोषमुक्त हो ? नहीं ना ? तो क्या मैं तुम्हारी साँसे छीन लूँ ? नहीं ना ? फ़िर तुम किसी और के लिए कैसे निर्णय ले लेती हो कि वह पूरी तरह राक्षस है ? तुम नहीं जानती कि जिसे तुम दानव कह रही हो वो उसके अपनो के लिए शायद देव से कम नहीं है । मैं महादेव हूँ, अपनी प्रेयसी की बात सुनूँगा मगर उनकी बातों को भी अनसुना तो नहीं कर सकता । क्या तुम मुझपर पक्षपाती होने का आक्षेप लगवाना चाहती हो ? ओहो! तुम्हारे माथे पे इतनी शिकन अच्छी नहीं लगती । चलो, तुम्हारी बेटी के बारे में बात करते हैं । बहुत ही भोली और प्यारी है तुम्हारी बेटी । और साफ है एकदम दर्पण की तरह । तुम उसे बहुत प्यार करती हो न ?

हाँ । वो मुझे प्राणों से भी ज्यादा प्यारी है और उसे कहीं किसी की बुरी नज़र न लग जाये, यही सोचकर तुम्हें प्रतिपल यहाँ बुलाती रहती हूँ । जिस तरह से अपराध समाज में बढ़ रहे हैं और पापी खुले घूम रहे हैं, मुझे तुम्हारे सिवा किसी और से आस नहीं है स्थिति के सुधार के । इसलिए आओ भोले , कुछ करो ।

तुम इतनी स्वार्थी कैसे हो सकती हो ?

जब मुझे बना रहे थे तब तुम्ही ने ध्यान नहीं रखा ।

हा ! हा ! हा ! हा ! अच्छा एक बात बताओ मेरी प्रेयसी, तुम्हारी बेटी तो अभी छोटी सी है । बहुत सी बातें नहीं समझती और अनुभव में तो तुमसे बहुत ही कम है । मैं कल देख रहा था कि वो अपना होमवर्क नहीं कर रही थी तो तुमने उसे समझाया काम न करने की वजह से उसे स्कूल में डांट पड़ेगी और जब वो नहीं समझ पायी तो तुमने भी छोड़ दिया । ऐसा क्यूँ प्रेयसी ? सोचो, आज अभी उसे स्कूल में शायद डांट पड़ रही होगी या कोई सजा मिल रही होगी । शायद वो रो भी रही होगी । अगर तुमने कल उसे डांटकर जबरदस्ती अपने बल का प्रयोगकर काम करवा दिया होता तो आज स्कूल में न सबके सामने उसका अपमान होता और न सजा मिलती । इतना प्यार करती हो अपनी बेटी से फ़िर भी ऐसी निष्ठुरता क्यूँ की उसके साथ ?

हाँ, यह सोचकर थोड़ा दुःख तो हो रहा है मुझे लेकिन यह निष्ठुरता मुझे उसी के हित के लिए करनी पड़ती है । मैं उसके निर्णय स्वयं ले लूँ तो फ़िर उसमे कैसे क्षमता आएगी परिस्थितियों को मापने की और यह समझने की कि हर निर्णय (decision) और उसके पश्चातकालीन प्रभावों (consequences)के लिए उत्तरदायी वो खुद है । कैसे मजबूत बना पाऊंगी उसे अगर इस तरह बचाती रही तो ? और सबके सामने अपमान की क्या बात ? सभी बच्चे हैं और कभी न कभी सब ग़लती करते हैं । ग़लती करने में मान अपमान का क्या स्थान है ? वहाँ तो बस अनुभव और सीख का स्थान होना चाहिए ।

हम्म्म, कैसा लगता है प्रिये, जब तुम समर्थ होते हुए भी अपने असर्मथ बच्चे की सहायता न करके उसे उसके हाल और उसके निर्णय पर छोड़ देती हो ?

कभी कभी तो अपनी समर्थता के मद में उसपे जबरदस्ती करने का बहुत मन होता है । यह आसान भी लगता है । समर्थ होते हुए भी असमर्थ के हाथों निर्णय की शक्ति देना, दूसरों को नियंत्रित करने वाले स्थान से दूसरों को स्वतंत्रता देना बहुत कठिन है । थोड़ा बुरा लगता है और एक विश्वास होता है कि इस बुरे से उसके साथ कुछ अच्छा ही होगा । उसे मज़बूत बनाने के लिए कुछ पीड़ा सहनी पड़े तो मैं बिना उसे पीड़ा जताए सह जाऊँगी ।

मैं भी तो उसी स्थान पर हूँ मेरी प्रेयसी । फ़िर मुझे उलाहना क्यूँ ताण्डव भूलने का और नीली ग्रीवा का ??

#शिव_के_साथ

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