कहानी किश्तों में – १

जब उन्होंने मुझे तुम्हारे बारे में बताया कि तुम्हारे सारे दोस्त जानते थे तुम्हारी फीलिंग्स के बारे में । और तुम्हारे दोस्त तुमसे मेरे बर्थडे की पार्टी भी ले लिया करते थे । तो मुझे मन ही मन बहुत गुस्सा आया और शर्मिन्दगी भी महसूस हुई । लडके होते ही हैं छिछोरे ! यही सोचा मैंने मन ही मन । माफ़ करना मेरे दोस्त, उस दिन भी मैंने अपने बारे में सोचा और दुनिया के दूसरे लड़कों के बारे में सोचा मगर तुम्हारे बारे में नहीं सोच पायी । शायद तुम्हें नज़रंदाज़ करने की आदत हो गयी थी मुझे ।

मगर आज जब वो सब कुछ मेरी आँखों के सामने मेरे किसी बहुत अपने के साथ हो रहा है, तो उसमे हर पल मुझे तुम्हारा अक्स दिखाई देता है । तुम्हारी बेबसी, तुम्हारे ज़ख़्म और तुम्हारी उलझन दिखाई देती है । दोस्त, आज याद आ रहा है कि तुम्हें नज़रंदाज़ करने का सिलसिला शुरू कब हुआ ।

तुम मेरे सामने बैठे और अजीब सी नज़रों से मुझे देख रहे थे । कुछ सवाल थे उन नज़रों में या कुछ कशमकश थी । दोस्त थे मेरे , पूछना चाहिए था मुझे, लेकिन न जाने क्यूँ मैंने इंतेज़ार करना बेहतर समझा । न जाने क्यूँ ऐसा लगा कि दोस्त की आँखों से कोई अजनबी झाँक रहा है और मैंने नज़रें दूसरी तरफ घुमा ली ।

इतने में छोटू ने पूछा – ‘हाँ’ ? हम दोनों उसकी तरफ मुड़े और एक साथ बोले – ‘चाय’ । चाय ईजाद करने वालों ने नाम भी ऐसा जादुई रखा कि बोलने से ही माहौल बदल जाता है – ‘चाय’ ।

और माहौल के बदलते ही हम दोनों मुस्कुरा दिए  ।

गला साफ़ करते हुए तुमने पूछा ‘कैसी है ?’

मैंने कहा ‘बिंदास’ और पूछा ‘तुम कैसे हो ?’

जवाब में तुम पहले हँसे फ़िर सर हिलाते हुए बोले  ‘बढ़िया’ ।

फ़िर तुमने पूछा ‘गुस्सा उतर गया?’

मैं हँस दी । शायद मेरी हँसी ने तुम्हें हिम्मत दिला दी और तुमने कहा ‘जानती है, आज कितने दिन, कितने घंटे और (अपनी घड़ी की तरफ देखकर) कितने मिनट बाद तू मुझसे बात कर रही है?’

मेरी हँसी काफूर हो गयी और दिल में एक ज्वालामुखी दहक गया । किसी तरह मैंने उसकी तपिश अपने चहरे तक आने से रोकी । मेरे दायें हाथ के दो नाखूनआपस में एक दूसरे को खरोंच रहे थे, बाएं हाथ की दो उँगलियाँ माथे पे जा पहुँची और मेरी नज़रें कैंटीन काउंटर पर टिक गयी ।

मैं अपने ही सवाल में उलझ गयी ‘रुकूँ या उठकर चल दूँ ?’

दोस्ती का लिहाज़ था या मेरा दिमाग सुस्त चलता है, वजह जो भी रही हो, मैं बैठी रही । चाय भी आ गयी थी । शायद तुम मेरी तरफ देख भी रहे होगे । दहकते लावे की चिंगारियाँ आँखों में झलक उठेंगी यह जानकर मैं सर झुकाए चाय घूरती रही और चाय की चुस्कियाँ लेती रही । उस दिन चाय के गिलास की गरमी न उँगलियों ने महसूस की और न होंठों ने । इस बीच तुमने कुछ आकड़े बताये भी अपने सवाल के जवाब में, लेकिन मैं तुम्हें नज़रंदाज़ करने का फ़ैसला ले रही थी ।

चाय खत्म हुई और मैंने हॉस्टल की राह पकड़ी । तुमने कहा-  ‘मैं छोड़ देता हूँ’ मगर तब तक मैं तुम्हें छोड़ चुकी थी, मेरे दोस्त । तुम अपने हॉस्टल की तरफ़ चले और मैं मन में ढेर सारा बारूद और कुछ इल्ज़ाम लेके अपने हॉस्टल की तरफ़ । कई सवाल थे मेरे पास तुम्हारे लिए : तुम कैसे ऐसा सोच सकते हो ? मैंने तुम्हें दोस्त समझा और तुम…. ? हिम्मत कैसे हुई ऐसा कहने की ? मुझे अच्छा लगेगा, ऐसा सोचा भी कैसे तुमने ? क्या कभी मेरी बातों या मेरे बर्ताव से ऐसा लगा तुम्हें कि… ? गुस्सा इतना था तुम्हारे अतिक्रमण का, तुम्हारा दोस्ती की हद को लाँघ जाने का कि मैं हाँफते हुए चल रही थी । और हर कदम के साथ तुम्हें नज़रंदाज़ करने का फ़ैसला मज़बूत होता जा रहा था ।

मैंने कभी तुमसे सवाल नहीं किये और न जाने तुमने मेरी ख़ामोशी और मेरी दूरियों को क्या समझा होगा ? तब मैं गुस्से में थी और मुझे कोई लेना देना नहीं था इस बात से कि तुम्हें कैसा लग रहा होगा । शायद, तुमने जो चोट मुझे पहुंचाई थी मैं उसका बदला ले रही थी । कुछ महीनों में ही हम दोस्त से अजनबी हो गए । न मैंने सुलह की कोई कोशिश की और न तुमने । महीनों बाद जब मेरा गुस्सा उतरा तो मैंने तुमसे बात करनी चाही तब तुमने बेरुखी जताई । शायद तुम तब भी गुस्सा थे । शायद !

तुमने बेरुखी दिखाई और मैंने उसे भी नज़रंदाज़ कर दिया । तुम्हारे बर्थडे का टाइम पास आ रहा था, शायद तुम्हें उम्मींद होगी मगर मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं सोचा था । तुम्हारे बर्थडे से दो दिन पहले तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड मुझसे मिलने आई। तुम्हारे पिछले कॉलेज की दोस्त थी, पहली बार मिल रही थी उससे । उसने मुझे बताया कि तुम सबसे दोस्ती नहीं करते और बहुत कम लोग हैं जो अहमियत रखते हैं तुम्हारी दुनिया में । उनमे से मैं एक हूँ और मेरा तुम्हें नज़रंदाज़ करना, तुम्हें बेहद बुरा लग रहा है । और भी कुछ ऐसी ही बातें करी उसने, मगर मैं पक रही थी उसकी बातों से और लग रहा था कि तुम्हारी दोस्त नहीं तुम्हारी वक़ील आई है मिलने । न जाने तुमने क्या सोचकर उसे मेरे पास भेजा होगा ! शायद फडफडाहट में गलतियाँ कर बैठना इसी को कहते हैं ।

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